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---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? ---उस पर व्यभिचार का आरोप लगाया गया जबकि वह बेगुनाह है, और उसके पास अपनी बेगुनाही का कोई सबूत व प्रमाण नहीं है। तो वह क्या करे? ---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? ---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? --- नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का वुज़ू नींद से नहीं टूटता है। ---उस पर व्यभिचार का आरोप लगाया गया जबकि वह बेगुनाह है, और उसके पास अपनी बेगुनाही का कोई सबूत व प्रमाण नहीं है। तो वह क्या करे? ---वादा-ख़िलाफ़ी सख़्ती से मना ---दुश्मन की लाशें उसके हवाले करना ---दुश्मन की लाशों पर गु़स्सा न निकाला जाए ---दुश्मन की लाशों पर गु़स्सा न निकाला जाए

Under category संदेह और उनके उत्तर
Creation date 2011-04-12 05:03:34
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महिलाओं का उत्तराधिकार (विरासत) इस्लाम और दूसरे धर्मों में

 

इस्लाम के दुश्मनों को पता है कि देश की वास्तविकता में और धर्म की सेवा में मुस्लिम महिलाओं का महान भूमिका हैlइसलिए वे मुस्लिम महिलाओं को तबाह करने और उनकी भूमिका को प्रभावित करने के लिए  सदा से युद्ध लड़ रहे हैं lवे अच्छी तरह जानते हैं कि यदि एक पुरूष ख़राब हो जाए तो एक आदमी ही प्रभावित होगा लेकिन यदि एक स्त्री ख़राब हो जाएगी तो पूरा परिवार ख़राब हो जाएगा lऔर इस युद्ध के सबसे महत्वपूर्ण विषयों में यह शामिल है कि मुस्लिम महिला को इस्लाम के क़ानून से दूर कर दिया जाए और उसके दिल में नफरत बैठा दी जाए lऔर वे महिलाओं को यह विश्वास दिलाते हैं कि इस्लामी क़ानून ने उनकी स्थिति को घटा दिया और उनके अधिकार में ज़ुल्म से काम  कियाlइसी तरह उनका कहना है कि इस्लामी क़ानून ने उत्तराधिकार में भी महिलाओं का हिस्सा पुरूषों की तुलना में कम रखा है lऔर स्त्री को सदा पुरूषों की तुलना में आधा भाग दिया है lवास्तव में इस्लाम के विषय में यह बात बिल्कुल झूठ पर आधारित है lसच तो यही है कि इस्लाम ने अपने सारे व्यवहार में न्याय के नियमों का निर्माण किया  l

 


याद रहे कि इस्लाम सदा समानता में बराबरी करता है और असमानता में फ़र्क़ करता है lऔर यही न्याय का सही तराज़ू है जिसकी मानव को ज़रूरत है, ताकि उसे  उसकी आत्मा और उसके जीवन का आनंद मिल सके और जीवन की गाड़ी सही पटरी पर चल सके l
विरासत के क्षेत्र में इस्लाम ने वारिस के प्रकार और स्त्री पुरूष भेद को असल नहीं बनाया lहाँ इस्लाम ने इस विषय में तीन विषयों को ध्यान में रखा और उसी की बुनियाद पर विरासत को बांटा l

 

 


पहला विषय:
पुरूष या महिला से हट कर इस्लाम ने यह ध्यान में रखा कि मृतक और वारिस के बीच खूनी संबंध की नज़दीकी या दूरी कितनी है lसंबंध जितना नज़दीक का होगा विरासत में भाग भी उतना ही बड़ा होगा और यह संबंध जितना दूर होगा विरासत में भाग भी उसी हिसाब से कम होगा lउत्तराधिकार में उत्तराधिकारियों के बीच स्त्री पुरूष भेद को महत्व नहीं दिया गया है lइसीलिए मृतक की बेटी को मृतक के पिता या उसकी माँ की तुलना में अधिक भाग मिलेगा l

 


दूसरा विषय:
वारिस के जीवन का दर्जा .. वह पीढ़ियां जो अभी जिंदगी शुरू कर रही हैं और जीवन की ज़िम्मेदारियों के बोझ उठाने के लिए पर तौल रही है उनका भाग आमतौर पर उन पीढ़ियों की तुलना में अधिक होता है जो जीवन गुज़ार कर इस दुनिया से चल-बसने की तैयारी कर रही है और जिनकी पीठ पर से ज़िम्मेदारियों का बोझ हल्का हने लगा है या जिनकी ज़िम्मेदारियां दूसरों के सरों पर पड़ चुकी हैं lऔर इस विषय में उत्तराधिकारियों के बीच मर्दानगी और स्त्रीत्व के फ़र्क़ को बिल्कल नहीं देखा गया l
इस लिए मृतक की बेटी मृतक की मां की तुलना में उसकी विरासत में अधिक भाग पाएगी हालांकि दोनों स्त्री हैं lयाद रहे कि मृतक की बेटी मृतक के बाप की तुलना में अधिक भाग पाएगी भले ही लड़की अभी इतनी छोटी है कि दूध पीती है और अपने बाप को भी पहचानने की आयु को न पहुंची हो यहां तक ​​कि अगर मृतक के धनदौलत बनाने में उसके बाप की सहायता भी शामिल रही हो तब भी बाप को बेटी की तुलना कम भाग ही मिलेगा lकेवल यही नहीं बल्कि उस समय बेटी अकेले आधे धन का अधिकार होगी lइसी तरह कभी कभी पुत्र पिता की तुलना में अधिक भाग पाता है जबकि दोनों भी पुरूष हैं l

 


तीसरा विषय:
वे वित्तीय ज़िम्मेदारियां जो दूसरों के लिए वारिस पर इस्लामी क़ानून की ओर से रखी गई lऔर यही एक स्तिथि है जिसमें पुरूष और महिला के बीच विरासत के विषय में फ़र्क़ किया गया है लेकिन यह भी स्त्री-पुरूष भेद पर आधारित नहीं है बल्कि वित्तीय ज़िम्मेदारियों के बोझ के अनुसार  हैl
अगर वारिस लोग रिश्तेदारी में बराबर हैं, और उनके जीवन के दर्जे में या पीढ़ी में सामान हैं जैसे : भाइयां, बहनें इस स्तिथि में इस्लामी क़ानून वित्तीय ज़िम्मेदारियों के बोझ को हिसाब में रखता है l
जैसे एक विवाहित लड़की जो अपने पति के देखरेख में रहती है और उनका सारा ख़र्च उनके पति के ज़िम्मे होता है वह कुछ ख़र्च करने के उत्तरदायी नहीं रहती है लेकिन फिर भी अपने भाई की तुलना में वह आधे भाग का अधिकार होती है जबकि उसके भाई को अपने बच्चों और परिवार को भी पालना है lऔर यदि उसकी बहन अविवाहिता
है तो भाई ही उसपर ख़र्च करेगा और फिर भी वह अपने भाई की तुलना में आधे भाग का अधिकार होगी, आर बहन का माल बहन का ही रहेगा, भाई का उसपर कोई अधिकार नहीं होगा, हालांकि भाई अपने माल से उसके देखरेख का ज़िम्मेदार रहेगा lऔर यही बात बेटे बेटियों के विषय में भी लागू होगीl  इसीलिए अल्लाह सर्वशक्तिमान ने फ़रमाया :"

 

)يُوصِيكُمُ اللَّهُ فِي أَوْلادِكُمْ لِلذَّكَرِ مِثْلُ حَظِّ الأُنْثَيَيْنِ) (النساء: 11(

 

(अल्लाह तुम्हारी संतान के विषय में तुम्हें आदेश देता है कि दो बेटियों के बराबर एक बेटे का हिस्सा होगा l)(अन-निसा:१३)
यहाँ जो इस्लामी क़ानून ने फ़र्क़ किया है वह सामानों के बीच नहीं बल्कि आसमानों के बीच और असमानों के बीच सामान हुक्म देना तो ज़ुल्म है  l
फिर इस्लामी क़ानून पुरूषों को शादी के समय पत्नी को पैसे देने का पाबंद किया है हालांकि महिलाओं को पुरूषों को कुछ देना नहीं है l

 

 

साथ ही पुरूषों को ही वैवाहिक घरका बंदोबस्त करना है और उसके साज़ोसामान लाना है lऔर फिर महिलाओं और उनके बच्चों पर ख़र्च करना भी पुरूषों की ही ज़िम्मेदारी है lइसी तरह जुर्मानों को भरने का काम भी पुरूषों का है lजैसे किसी की हत्या करने के कांड में या इस तरह के दूसरे कांडों में  यहां तक ​​कि तलाक़ की घटना में भी इस्लामी क़ानून महिलाओं को अकेले जीवन के बोझ का सामना करने के लिए नहीं छोड़ता है बल्कि पुरूष को पाबंद किया है कि उसे कुछ दिन गुज़र-बसर करने का ख़र्च दे जब तक महिला की दूसरी शादी न हो जाएlरिश्तेदारी और जीवन के दर्जे में बराबर होने की स्तिथि में इन्हीं ज़िम्मेदारियों और वित्तीय बोझ के कारण इस्लाम ने पुरूष को स्त्री के हिस्से की तुलना में दोगुना अधिक दिया है और साथ ही उसे स्त्री पर ख़र्च करने और उसकी देखरेख का पाबंद किया है lइस से पता चला कि   इस्लामी क़ानून ने महिलाओं को एक विशेष जगह और ख़ास महत्व दिया है l
और यह विषय केवल चार मामलों तक ही सीमित है:
१) मृतक के दोनों प्रकार स्त्री पुरूष बच्चों के रहने की स्तिथि में जैसा कि पवित्र क़ुरआन में आदेश है:"

) يُوصِيكُمُ اللَّهُ فِي أَوْلادِكُمْ لِلذَّكَرِ مِثْلُ حَظِّ الأُنْثَيَيْنِ) (النساء: 11(

 

 

 

(अल्लाह तुम्हारी संतान के विषय में तुम्हें आदेश देता है कि दो बेटियों के बराबर एक बेटे का हिस्सा होगा l)(अन-निसा:१३)
२) विरासत में पति या पत्नी होने की स्तिथि में, यदि पत्नी मृतक है तो पति को पत्नी के धन से उसका दुगुना भाग मिलेगा जितना कि पति मृतक होने की स्तिथि में एक पत्नी को मिलता हैl
अल्लाह सर्वशक्तिमान शुभ क़ुरआनमें फरमाता है:"

)وَلَكُمْ نِصْفُ مَا تَرَكَ أَزْوَاجُكُمْ إِنْ لَمْ يَكُنْ لَهُنَّ وَلَدٌ فَإِنْ كَانَ لَهُنَّ وَلَدٌ فَلَكُمُ الرُّبُعُ مِمَّا تَرَكْنَ مِنْ بَعْدِ وَصِيَّةٍ يُوصِينَ بِهَا أَوْ دَيْنٍ وَلَهُنَّ الرُّبُعُ مِمَّا تَرَكْتُمْ إِنْ لَمْ يَكُنْ لَكُمْ وَلَدٌ فَإِنْ كَانَ لَكُمْ وَلَدٌ فَلَهُنَّ الثُّمُنُ مِمَّا تَرَكْتُمْ مِنْ بَعْدِ وَصِيَّةٍ تُوصُونَ بِهَا أَوْ دَيْنٍ) (النساء: 12(

 

 

(और तुम्हारी पालियों ने जो कुछ छोड़ा हो, उसमें तुम्हारा आधा है, यदि उनकी संतान न हों lलेकिन यदि उनकी संतान हों तो वे जो छोड़ें उसमें तुम्हारा चौथाई होगा इसके पश्चात कि जो वसीयत वे कर जाएँ वह पूरी कर दी जाए, या जो ऋण (उनपर) हो वह चुका दिया जाएlऔर जो कुछ तुम छोड़ जाओ, उसमें उनका (पलियों का) चौथाई हिस्सा होगा, यदि तुम्हारी कोई संतान न हो lलेकिन यदि तुम्हारी संतान हो, तो जो कुछ तुम छोड़ोगे, उसमें से उनका (पलियों का) आठवाँ हिस्सा होगा, इसके पश्चात कि जो वसीयत तुमने की हो वह पूरी कर दी जाए या जोऋणहो उसे चुका दिया जाएl)(अन-निसा :१२)

३) यदि मृतक बेटा हो तो उसका पिता उसकी मां के हिस्से की तुलना में दोगुना लेगा यदि उस मृतक बेटे की संतान न हो और इस स्तिथि में बाप दो तिहाई लेगा और मां एक तिहाई लेगी l
४) यदि मृतक बेटा हो तो उसका पिता उसकी मां के हिस्से की तुलना में दुगुना लेगा यदि मृतक बेटे की एक बेटी हो, क्योंकि इस स्तिथि में बेटी को उसके धन का आधा हिस्सा मिले गा और मृतक की मां को छठा हिस्सा मिलेगा और बाप को छठा हिस्सा के साथ सब बांटने के बाद का बचा हुआ भी मिलेगा l 
इसके विपरीत में, इस्लाम ने कई स्तिथियों में महिलाओं को पुरूषों  के बरारबर भाग दिया है:
१) यदि मृतक भाई हो और उसकी कोई संतान न हो लेकिन सौतेले भाई और बहन हों तो भाई बहन को भाई की विरासत में से छठा हिस्सा मिलेगा lक्योंकि शुभ क़ुरआन में है :"

) وَإِنْ كَانَ رَجُلٌ يُورَثُ كَلالَةً أَوِ امْرَأَةٌ فَلِكُلِّ وَاحِدٍ مِنْهُمَا السُّدُسُ فَإِنْ كَانُوا أَكْثَرَ مِنْ ذَلِكَ فَهُمْ شُرَكَاءُ فِي الثُّلُثِ مِنْ بَعْدِ وَصِيَّةٍ يُوصَى بِهَا أَوْ دَيْنٍ غَيْرَ مُضَارٍّ وَصِيَّةً مِنَ اللَّهِ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَلِيمٌ(النساء: 12)

 

 

(और यदि किसी पुरूष या स्त्री के न तो कोई संतान हो और न उसके मां-बाप ही जीवित हों और उसके एक भाई या बहन हो तो उन दोनों में से प्रत्येक के लिए छठा हिस्सा होगा लेकिन यदि वे इससे अधिक हों तो फिर एक तिहाई में वे सब शरीक होंगे, इसके पश्चात कि जो वसीयत उसने की वह पूरी कर दी जाए या जो ऋण (उसपर) हो वह चुका दिया जाए, शर्त यह है कि वह हानिकर न ह lयह अल्लाह की ओर से ताकीदी आदेश है और अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, अत्यन्त सहनशील है l) (अन-निसा:१२)
२) यदि एक आदमी मर जाता है और उसके एक से अधिक यानी दो या दो से ज़ियादा भाई और बहनें हों तो वे सब एक तिहाई को आपस में बराबरी से बाटेंगे l
३) इसी तरह मां और बाप अपने बेटे की विरासत में बरारब रहेंगे यदि मृतक को एक बेटा हो या दो या दो से अधिक बेटियां हों lजैसा कि अल्लाह सर्वशक्तिमान ने फरमाया :"

(وَلأَبَوَيْهِ لِكُلِّ وَاحِدٍ مِنْهُمَا السُّدُسُ مِمَّا تَرَكَ إِنْ كَانَ لَهُ وَلَدٌ) (النساء: 11(

 

 

 

(और यदि मरनेवाले की संतान हो, तो उसके माँ-बाप में से प्रत्येक का उसके छोड़े हुए माल का छठा हिस्सा है l)(अन-निसा:११)
४) यदि एक महिला की मृत्यु हो गई और वह पति और एक अपनी बहन को छोड़ी तो दोनों को आधा आधा हिस्सा मिलेगा l
५) और यदि एक महिला की मृत्यु हो गई और पति, पिता में शरीक एक बहन छोड़ी तो भी दोनों को आधा आधा हिस्सा मिलेगा l

६) यदि एक औरत की मृत्यु हो गई और वह पति और माँ और एक अपनी बहन को छोड़ी तो आधा पति को , और आधा मां को और हज़रत इब्न अब्बास के ख़याल में बहन को कोई हिस्सा नहीं है l
७) यदि एक औरत की मृत्यु हो गई और वह पति, एक अपनी बहन और एक बाप शरीक बहन और एक मां शरीक बहन छोड़ी तो आधा पति को मिलेगा और आधा अपनी बहन को और बाप शरीक बहन और भाई को कुछ नहीं मिलेगा l 
८) यदि एक आदमी की मृत्यु हो गई और वह दो बेटियां और माता पिता को छोड़ा तो बाप को छठा हिस्सा मिलेगा और माँ को भी छठा हिस्सा मिलेगा और प्रत्येक बेटी के लिए एक तिहाई हैl

 

 


इसी तरह कई मामलों में इस्लाम ने स्त्रियों को पुरूषों की तुलना में अधिक हिस्सा दिया:
१) यदि एक आदमी मर जाता हैऔर माँ, दो बेटियां और एक भाई छोड़ जाता है तो इस स्तिथि में बेटी को भाई की तुलना में डेढ़ गुना अधिक हिस्सा मिलेगाl 
२) यदि पिता की मृत्यु हो गई और मृतक ने एक बेटी और माँ-पिताको छोड़ तो भी बेटी को मृतक के पिता की तुलना में डेढ़ गुना अधिक हिस्सा मिलेगा l 
३) यदि एक आदमी की मृत्यु हुई और दो बेटियों एक बाप-शरीक भाई और एक बाप-शरीक बहन को छोड़ा तो इस स्तिथि में बेटी को बाप की तुलना में दोगुना अधिक हिस्सा मिलेगा l 
४) और यही हुक्म है यदि एक महिला की मृत्यु हुई और पति, मां, दादा और दो माँ-शरीक भाई और दो बाप शरीक भाई को छोड़ गईl
५) यदि एक आदमी मर गया और दो बेटियां और एक बाप-शरीक भाई और एक बाप-शरीक बहन को छोड़ गया तो दोनों बेटियों के लिए एक तिहाई है और बाक़ी में से दो तिहाई भाइयोँ के लिए है और एक तिहाई उसकी बहन को मिलेगा l
और कुछ मामलों में तो महिलाओं को हिस्सा मिलता है और पुरूषों को बिल्कुल कुछ नहीं मिलता है l
१) यदि एक आदमी की मृत्यु हो जाए और एक बेटी, एक बहनएक फूफी को छोड़ जाए तो बेटी को आधा और बहन को आधामिलेगाऔर चाचा को कुछ नहीं मिलेगा l

 


२) यदि एक महिला की मृत्यु हो जाए और पति, एक अपनी बहन और एक बाप-शरीक बहन और एक मां-शरीक बहन छोड़े तो पिता को आधा मिलेगा और अपनी बहन को आधा और बाप-शरीक बहन और भाई को कुछ नहीं मिलेगा l
३) यदि एक महिला का निधन हो जाए और पति, पिता, माँ, बेटी, और एक पोता और एक पोती छोड़ जाए तो पति को एक चौथाई मिलेगा और माता पिता में से प्रत्येक को एक छठा हिस्सा मिलेगा और बेटी को आधा मिलेगा जबकि पोता और पोती को कुछ नहीं मिलेगा lयाद रहे कि यहाँ बेटी को पोते की तुलना में छे गुना अधिक हिस्सा मिला l
४) और यदि एक महिला की मृत्यु हो जाए और पति, मां, दो माँ-शरीक भाई, और एक या एक से अधिक अपना भाई छोड़ जाए तो पति को आधा है और माँ को एक छठा है और माँ-शरीक भईयों को एक तिहाई है और हज़रत उमर-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे-के ख़याल के अनुसार अपने भाईयों को कुछ नहीं मिलेगा l

 


५) यदि एक महिला की मृत्यु हो जाए और पति, दादा, माँ, अपने भाई और माँ-शरीक भाई छोड़ जाए तो पति को आधा है और दादा को एक छठा और मांको भी एक छठा मिलेगा और बाक़ी अपने भाइयों को मिलेगा जबकि माँ-शरीक भाईयों को कुछ नहीं मिलेगा l 

 


इसके बाद मैं इतनी बात ज़रूर कहूँगा कि इस्लामी विरासत के विज्ञान को पढ़नेवाला अच्छी तरह जानता है कि इस्लामी विरासत में तीस अधिक स्तिथि ऐसी हैं जिन में स्त्री पुरूष के बराबर या उससे बढ़कर हिस्सा लेती है, या फिर स्त्री तो हिस्सा पाती है लेकिन पुरूष वंचित रहता है जबकि केवल चार ही ऐसे विशिष्ट मामले हैं जहां स्त्री को पुरूष कì




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