पैगंबर हज़रत मुहम्मद के समर्थन की वेबसाइट - हज़रत आइशा पुत्री हज़रत सिद्दीक़- अल्लाह उ



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---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? ---उस पर व्यभिचार का आरोप लगाया गया जबकि वह बेगुनाह है, और उसके पास अपनी बेगुनाही का कोई सबूत व प्रमाण नहीं है। तो वह क्या करे? ---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? ---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? --- नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का वुज़ू नींद से नहीं टूटता है। ---उस पर व्यभिचार का आरोप लगाया गया जबकि वह बेगुनाह है, और उसके पास अपनी बेगुनाही का कोई सबूत व प्रमाण नहीं है। तो वह क्या करे? ---वादा-ख़िलाफ़ी सख़्ती से मना ---दुश्मन की लाशें उसके हवाले करना ---दुश्मन की लाशों पर गु़स्सा न निकाला जाए ---दुश्मन की लाशों पर गु़स्सा न निकाला जाए

   

 

part -1



हज़रत आइशा क़ुरआन की व्याख्या और हदीस की एक माहिर महिला   
हज़रत आइशा-अल्लाह उनसे खुश रहे- एक कुशल वैज्ञानिक,क़ुरआन की व्याख्या और हदीस की माहिर थीं, वह विश्वासियों की महिलाओं को शिक्षण दिया करती थीं और हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के बहुत सारे साथी धर्म के मुद्दों में उनसे पूछताछ करते थे क्योंकि अल्लाह सर्वशक्तिमान ने उनमें वह सारे गुण रखे थे जिनके द्वारा वह हदीस और तफसीर के माहिरों में शामिल हो गईं l
अगर हम व्याख्या में उनके महान भूमिका के बारे में सोंचते हैं एक बात यह भी सामने आती है कि वह हज़रत अबू-बक्र सिद्दीक़-अल्लाह उनसे खुश रहे- की पुत्री थीं और यह उनके तफसीर में माहिर होने का क्योंकि वह अपने बचपन से ही अपने पिता अबू-बक्र सिद्दीक़ के मुंह से क़ृरआन सुना करती थी, इसके अलावा वह बहुत तेज़ दिमाग़ की मालिक थीं, इस बारे में हज़रत आइशा खुद कहती हैं : जब हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-पर यह आयत उतरी थीं :

 

 (سورة القمر:46)(بل الساعة موعدهم والساعة أدهى وأمر)

(नहीं, बल्कि वह उनकी घड़ी है, जिसका समय उनके लिए बड़ी आपदावाली और कटु घड़ी हैl) तो उस समय मैं छोटी बच्ची थी और मक्का में खेलती कूदती थी और जब सूरह अल-बक़रा और सूरह अन-निसा उन पर उतरी तो मैं उनके पास थीl  

कई महत्वपूर्ण कारणों में से एक यह भी है कि वह अल्लाह के पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-पर ईशवाणी उतरने को देखती थीं और क़ृरआन की आयतों के अर्थों और उनके पीछे छिपे रहस्यों के बारे में उनसेपूछती थीं इस से उनको दो बातें एक साथ प्राप्त हो गईं: एक तो उतरते ही  क़ृरआन की आयतों को सुनती थीं और फिर उसके अर्थ को भी हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-से प्राप्त कर लेती थीं, इसके साथ ही उनको अरबी भाषाकी बारीकियां भी उनपर प्रकाशित होती गईं जिनका जानना किसी भी मुफस्सिर (क़ृरआन के अर्थ के माहिर) के लिए बहुत ज़रूरी है l

हज़रत आइशा सदा इस बात का ख्याल रखती थीं कि पवित्र क़ृरआन की व्याख्या सावधानीसे की जाए ताकि उनकी व्याख्या धर्म के सिद्धांतों औरइस्लामी परम्परा के मुताबिक रहे, और यही बात हज़रत उरवा की बात से समझ में आती है, हज़रत उरवा ने एक बार हज़रत आइशा से इस आयत के विषय में पूछा:

    (حتى إذا استيأس الرسل و ظنوا أنهم قد كُذِبُوا جاءهم نصرنا)(سورة يوسف :110)

(यहाँ तक कि जब वे रसूल निराश होने लगे और वे समझने लगे कि उनसे झूट कहा गया था कि हमारी सहायता पहुँच गईl)(सूरह यूसुफ:११०)

मैंने कहा: كُذِبُوا  (कुज़िबू) या كُذِّبُوا(कुज्ज़िबू) तो हज़रत आइशा ने कहा:كُذِّبُوا(कुज्ज़िबू) तो मैंने कहा: मतलब यह है कि रसूलों को विश्वास हो गया था कि उनकी जाति ने उनको झुटला दिया तो यह तो विश्वास हुआ न कि गुमान, तो उन्होंने उत्तर दिया: निस्संदेह उनको विश्वास हो गया था तो मैंने कहा:و ظنوا أنهم قد كُذِبُوا(उनको गुमान हुआ कि उनको झूट कहा गया)इस पर उन्होंने कहा: मैं अल्लाह की पनाह में आती हूँ, रसूलों के लिए यह उचित नहीं होता है कि वे अपने मालिक पर गुमान या शक करें तो फिर मैंने कहा: फिर इस आयत का क्या अर्थ होगा? तो वह बोलीं: वास्तव में उन रसूलों के माननेवालों के बारे में है, जो उन पर विश्वास कर चुके थे और उनको सच मान चुके थे लेकिन जब ज़ियादा दिनों तक वे परीक्षण में पड़े रहे और अल्लाह की सहायता के आने में देरी हुई यहां तक कि रसूल अपनी जाति से बिल्कुल निराश हो गए और रसूलों को लगा कि उनके माननेवाले भी उनको झुटा समझने लगे तो उस समय अल्लाह की सहायता आ गईl

इसके अलावा, हज़रत आइशा सदा यह कोशिश करती थीं कि क़ृरआन की आयतों के बीच संबंध स्पष्ट हो और क़ृरआन की व्याख्या क़ृरआन के माध्यम से करती थीं, उनकी इस नियमितता से बाद में आनेवाले लोगों के लिए रास्ता बन गया था बल्कि क़ृरआन को समझने के लिए एक बड़े सिद्धांत की बुनियाद पड़ गई, वास्तव में वह सहाबा के बीच हदीस की याद में बहुत माहिर थीं , बल्कि हदीस के याद करने में उनका मकाम पाँचवाँ था, पहला नंबर अबू-हुरैरा का था फिर इब्न उमर का फिर अनस बिन मालिक का और फिर इब्न अब्बास का –अल्लाह उन सब से खुश रहे-l

फिर भी, वह उन में प्रतिष्ठित थीं क्योंकि अक्सर बातें वह दिरेक्ट खुदहज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-से सुन कर कथित करती थीं, इसके अलावा, उनकी अक्सर हदीसों वे हैं जो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की प्रक्टिकल सुन्नतों से संबंधित हैं, इस तरह उनका कमरा हदीस का पहला स्कूल था जहां विद्वान आते थे और हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के शुभ क़ब्र की ज़ियारत करते थे, और हज़रत आइशा-अल्लाह उनसे खुश रहे-से हदीस भी सुन लेते थे जो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के सब से नज़दीक रहने वाली पत्नी थीं, और वह ज्ञान फैलाने में कभी किसी के साथ कंजूसी नहीं करती थीं,और उनके कथावाचकों की संख्या भी बड़ी है l

हज़रत आइशा-अल्लाह उनसे खुश रहे- यह मानती थीं और महत्व देती थीं कि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की हदीसों के शब्दों को जूं की तूं कथित किया जाए, जैसा कि उरवह बिन जुबैर के कथन से स्पष्ट है, एक बार हज़रत आइशा ज़ुबैर को बोलीं:''ऐ मेरी बहन का बेटा! मुझे जानकारी मिली है कि अब्दुल्ला बिन अम्र हमारी ओर से गुज़र कर हज को जाने वाले हैं तो उनसे मिलो और उनसे पूछो, क्योंकि उनके पास हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-से सुना हुआ महान ज्ञान है तो मैं उनसे मिला और उनसे बहुत सारी बातों के बारे में पूछा जिनको वह हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-से सुने थे उरवह ने कहा: उसी में उन्होंने इस हदीस को भी उल्लेख किया:हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने फ़रमाया:निस्संदेह लोगों से ज्ञान एक दम नहीं छीना जाएगा बल्कि विद्वान उठा लिए जाएंगे तो ज्ञान भी उनके साथ उठ जाएगा,फिर लोगों के बीच मूर्ख लोग बड़े बन जाएँगे और वे बिना ज्ञान के फतवा(धर्म का हुक्म) देंगे, वे खुद भी भटकेंगे और दूसरों को भी भटकाएंगेlउरवह कहते हैं जब मैंने यह हदीस हज़रत आइशा को सुनाईं तो उन्होंने इसे बहुत महत्व दिया लेकिन अनजानापन दिखाई और बोलीं: क्या उन्होंने यह कहा है कि उन्होंने इसेहज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-से सुना है? उरवह कहते हैं जब वह आगए तो हज़रत आइशा ने कहा: देखो वह अब्दुल्लाह बिन अम्र आए हैं उनसे मिलो और ज्ञान के विषय में जो हदीस उन्होंने कथित की हैं उनके बारे में बात निकाल कर पूछो, तो मैं उनसे मिला और उनसे पूछा तो उन्होंने फिर उसी तरह उल्लेख किया जैसा पहली बार उल्लेख किया था, आगे उरवह कहते है:तो जब मैंने उनको फिर से बताया तो हज़रत आइशा बोलीं: मेरा ख्याल है कि उसने सही कहा, और उस में कुछ कमी बेशी नहीं कीl    

इस हदीस को हज़रत आइशा ने कथित किया और यह हदीस सही है, इसे इमाम मुस्लिम ने उल्लेख किया है, देखिए मुस्लिम शरीफ हदीस नंबर :२६७३l

 

यही कारण है कि बहुत सारे कथावाचक उनके पास आकर उनको हदीस सुनाते थे और प्रमाणित कर लेते थे , इसी तरह जब उनमें कोई इख्तेलाफ़ हो जाता था तो उनके पास आते थे और इसकी प्रामाणिकता की पुष्टि करते थे lइन सारी बातों से हमारे लिए यह स्पष्ट होजाता है कि हज़रत आइशा का हदीस के कथन और लोगों में उनको फैलाने में उनकी बड़ी भूमिका थी अगर अल्लाह सर्वशक्तिमान उनको तैयार न किया होता तो घर से संबंधित प्रेक्टिकल सुन्नत का एक बड़ा हिस्सा इधरउधर हो गया होता l
हज़रत आइशा फिक़ह (न्यायशास्त्र के अध्य्यन) की माहिर
हज़रत आइशा -अल्लाह उनसे खुश रहे- पूरी दुनिया की महिलाओं में ज्ञान और न्यायशास्त्र में सब से अधिक जानकारी रखतीं थीं, सहाबा के बड़े बड़े विद्वान बल्कि आमतौरपर सारे सहाबा उनसे धर्म से संबंधित प्रश्न करते थे तो वह उनके प्रश्नों का उत्तर देती थीं, कासिम बिन मुहम्मद ने उल्लेख किया कि हज़रत आइशा हज़रत अबू-बक्र के राज्य के समय से ही फतवा देने का काम करती थीं और अपने निधन तक यह काम अंजाम देती रहीं, उन्होंने हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-से सुनी हुई हदीसों के कथन पर ही बस नहीं किया बल्कि वह तो जो धर्म से संबंधित नईसमस्याएं पैदा होती थी और जिनका समाधान क़ुरआन और हदीस में स्पष्ट रूप में नहीं मिल पाता था तो वह उनका समाधान क़ुरआन और हदीस के प्रकाश में तलाश करती थीं, उनका तरीका यह था कि जब उनसे कोई प्रश्न पूछा जाता था तो सब से पहले उसका उत्तर क़ुरआन और हदीस में तलाश करती थीं यदि उन दोनों में नहीं मिल पाता था तो वह क़ुरआन और हदीस के सिद्धांतों की रौशनी में उनका समाधान खोजती थीं, और यहाँ तक कहा गया है कि इस्लामी कानून का एक चौथाई उन्हीं के फैसलों पर आधारित है, इस विषय में एक उदाहरण यह है कि वह “मुतअह”(सदा के लिए नहीं बल्कि कुछ समय के लिए शादी करना)की शादी को हराम बताती थीं और अल्लाह सर्वशक्तिमान के इस फरमान से सबूत देती थीं :

 

(والذين هم لفروجهم حافظون.إلا على أزواجهم أو ما ملكت أيمانهم فإنهم غير ملومين.فمن ابتغى وراء ذلك فأولئك هم العادون) (سورة المؤمنون:5)

 

(और जो अपने गुप्तांगों की रक्षा करते हैं, सिवाय इस सूरत के कि अपनी पलियों या लौण्डियों के पास जाएँ कि इसपर वे निन्दनीय नहीं हैं, परंतु जो कोई इसके अतिरिक्त कुछ और चाहे तो ऐसे ही लोग सीमोल्लंघन करनेवाले हैं l)(सूरह अल-मोमिनून:५) 
हज़रत आइशा इस्लामी न्यायशास्त्र के कुछ मुद्दों पर अपनी राय रखती थीं , और सहाबा के विचारों से उनको इख्तिलाफ था lउन में से कुछ इस तरह हैं:
१-असर के बाद दो रक्अत पढ़ना: हज़रत आइशा का कहना है कि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने असर के बाद दो रक्अत कभी नहीं छोड़ी, और हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की यह हदीस सुनाईं:“सूरज के उगते समय और उसके डूबते समय नमाज़ पढ़ने का प्रयास मत करोl” 

 

इस हदीस को हज़रत आइशा ने कथित किया और यह हदीस सही है, देखिए मुस्लिम शरीफ हदीस नंबर:८३३l

 

इस तथ्य के बावजूद कि असर के बाद न्फ्ल नमाज़ अवैध है कुछ विद्वानों ने कहा है कि असर के बाद की नमाज़ केवल उनके साथ खास थी l
२-इसी तरह उनका ख्याल था कि रमदान की तरावीह की रक्अतों की  संख्या वितर के साथ ग्यारह है, और उसके सबूत में हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की नमाज़ का हवाला देती हैं, कथित है कि    अबू-सलमा बिन अब्दुर रहमान ने उनसे पूछा कि रमजान के दौरानहज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की नमाज़ की क्या स्तिथि थी? तो उन्होंने उत्तर दिया कि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- कभी भी ग्यारह रक्अत से बढ़ कर नहीं पढते थे, न रमज़ान न गैर रमज़ान में, वह चार रक्अत पढ़ते थे जिनकी अच्छाई और लंबाई का क्या कहना? उसके बाद चार रक्अत पढ़ते जिनकी अच्छाई और लंबाई का क्या कहना, उसके बाद चार रक्अत पढ़ते जिनकी अच्छाई और लंबाई का क्या कहना, उसके बाद तीन रक्अत पढ़ते थे, आगे हज़रत आइशा कहती हैं : मैं पूछी : ऐ अल्लाह के दूत ! क्या आप वितर से पहले सोते हैं ? तो उन्होंने फ़रमाया: “ऐ आइशा मेरी दोनों आँखें सोती हैं लेकिन मेरा दिल नहीं सोता हैl”

 

यह हदीस हज़रत आइशा से कथित है, और सही है, देखिए बुखारी शरीफ हदीस नंबर:११४७, और २०१३l

 

इस के बावजूद सहाबा २० रक्अत पढ़ते थे क्योंकि १३ रक्अत का मतलब यह नहीं है कि उस से बढ़ कर पढ़ना नहीं हैl
इस प्रकार, यह बात स्पष्ट हो गई कि हज़रत आइशा में दोनों बातें एक साथ इकठ्ठा थीं: पक्का विचार और स्पष्ट करने का गुण, हज़रत अता ने उनके विषय में कहा: हज़रत आइशा लोगों के बीच सब से अधिक समझवाली और आम मुद्दों में सब से अच्छा विचार रखती थीं l

 

 

निष्कर्ष
हज़रत आइशा-अल्लाह उनसे खुश रहे-का ६६ छियासठ साल की उम्र में निधनहो गया ,लेकिन इस्लामी न्यायशास्त्र, मुसलमानों की सामाजिक और राजनीतिक जीवन पर उनका गहरा प्रभाव रहा, और हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- के कई हज़ार सुन्नत सुरक्षित करके मुसलमानों तक पहुँचा दीं l
वास्तव में हज़रत आइशा-अल्लाह उनसे खुश रहे- हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- के निधन के बाद अरबी महिला को सिखाने के लिए जिंदा रहीं, और जैसा कि हमने अभी अभी उल्लेख किया है कि वह इस्लामी ज्ञान के सारे क्षेत्रों में माहिर थीं, वह क़ुरआन कि व्याख्या, इस्लामी ज्ञान, हदीस, न्यायशास्त्र में बेमिसाल थीं lजैसा कि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- ने उनके बारे में फ़रमाया:आइशा की बुलंदी सारी महिलाओं पर ऐसी ही जैसी “सरीद”(एक प्रकार का अरबी स्वादिष्ट खाना) की बुलंदी सारे भोजनों पर है lवास्तव में वह सारी महिलाओं पर बुलंदी रखती थींl
हज़रत उरवा ने उनके विषय में कहा:.''मैंने न्यायशास्त्र चिकित्साऔर कविता में हज़रत आइशा से अधिक जानकार किसी को नहीं देखा l”और अबू-उमर बिन अब्दुल-बर्र ने कहा:''हज़रत आइशा अपने समय में ज्ञान के तीन क्षेत्रों में बेमिसाल थीं, न्यायशास्त्र, चिकित्साऔर कविता के ज्ञान मेंl

 

निस्संदेह, हज़रत आइशा का इस्लामी ज्ञान में बड़ा योगदान रहा, जो छात्रों और विद्वानों के लिए एक चमकदार सूर्य साझी जाती थीं, और ऐसा क्यों न हो वह तो पूरी दुनिया के शिक्षक और सबसे प्यारे पैगंबर हज़रत मुहम्मद-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की सब से प्रिय और उनके नज़दीक रहने वाली थीं, वह उनसे बहुत कुछ सीखीं थीं और फिर इस्लामी समुदाय को पहूँचाईंlवास्तव में वह तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- के मिशन के ज़ंजीर की एक कडì




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