पैगंबर हज़रत मुहम्मद के समर्थन की वेबसाइट - हज़रत पैगंबर -उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-न



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---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? ---उस पर व्यभिचार का आरोप लगाया गया जबकि वह बेगुनाह है, और उसके पास अपनी बेगुनाही का कोई सबूत व प्रमाण नहीं है। तो वह क्या करे? ---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? ---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? --- नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का वुज़ू नींद से नहीं टूटता है। ---उस पर व्यभिचार का आरोप लगाया गया जबकि वह बेगुनाह है, और उसके पास अपनी बेगुनाही का कोई सबूत व प्रमाण नहीं है। तो वह क्या करे? ---वादा-ख़िलाफ़ी सख़्ती से मना ---दुश्मन की लाशें उसके हवाले करना ---दुश्मन की लाशों पर गु़स्सा न निकाला जाए ---दुश्मन की लाशों पर गु़स्सा न निकाला जाए

   

 

हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने पुरुषों को अपनी पत्नियों के साथ अच्छा बर्ताव करने की सलाह दी 

हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने अपने शब्द और कर्म द्वारा अपने लोगों को अपनी अपनी पत्नियों के साथ भलाई करने और अच्छा बर्ताव रखने के बारे में निर्देशित किया और इस विषय में हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-से बहुत सारी हदीसें कथित हैं और सही हैं , उन हदीसों में से कुछ मैं यहाँ उल्लेख करता हूँl

१-बुखारी और मुस्लिम ने हज़रत अबू-हुरैरा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे- से उल्लेख किया है कि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने कहा:"महिलाओं के साथ भलाई करने की सलाह दिया करो, क्योंकि वे एक पसली से बनाई गई हैं और पसलियों में सब से टेढ़ी तो ऊपर वाली पसली ही होती हैं तो यदि तुम उसे सीधी करने जाओगे तो तोड़ दोगे, और यदि छोड़ दोगे तो टेढ़ी रहेंगी, इसलिए महिलाओं के साथ भलाई की सलाह दिया करो l"यह हदीस हज़रत अबू-हुरैरा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे-के द्वारा कथित की गई , और यह हदीस सही है, इसे इमाम बुखारी ने उल्लेख किया है, देखिए बुखारी शरीफ पेज नंबर या संख्या: ३३३१l

और इमाम मुस्लिम के एक कथन में है: "महिला एक पसली से बनाई गई है वह कभी भी तुम्हारे लिए एक रास्ते पर सीधी नहीं होगी इसलिए यदि तुम उससे लाभ लोगे तो टेढ़े रहते पर ही लाभ ले लोगे और यदि तुम उसे सीधा करने जाओगे तो तुम तोड़ कर रख दोगे, उसके तोड़ने का मतलब यह है कि आप उसे तलाक़ दे देंगेl" यह हदीस हज़रत अबू-हुरैरा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे-के द्वारा कथित की गई , और यह हदीस सही है, इसे इमाम मुस्लिम ने उल्लेख किया है, देखिए मुस्लिम शरीफ पेज नंबर या संख्या: ३३३१l

तो देख लिया आपने कि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने किस तरह महिलाओं के साथ मेहरबानी करने की सलाह दी और साथ ही उनके स्वभाव को भी स्पष्ट शब्द में बयान किया ताकि उनकी सलाह को स्वीकार करने में कोई परेशानी न हो इसलिए कि जब यह पता चल गया कि टेढ़ापन उनके स्वभाव का एक भाग है तो मर्द को उस पर सब्र करना चाहिए और उसे बिल्कल सीधा करने की कोशिश नहीं करना चाहिए क्योंकि वह ज़रूर अपनी प्रकृति पर ही चलेगी और घूम फिर कर उसी पर वापिस होगी जिस सवभाव पर पैदा की गई है, यही कारण है कि एक कवि ने उस आदमी से आश्चर्य प्रकट किया जो महिला को बिल्कुल सीधा करना चाहते है lउनका कहना है:

(औरत एक टेढ़ी पसली ही तो है आप उसे सीधा नहीं कर सकते , पसलियों को सीधा करने का मतलब ही उसका टूट जाना हैl)

और एक दूसरे कवि ने स्वभाव को बदलने के विषय में कहा:

(जो भी किसी चीज के स्वभाव का उल्टा करना चाहता है तो वास्तव में वह पानी से आग लेने की कोशिश करता हैl)

२- हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने इस सलाह को कई अवसरों पर दुहराया बल्कि जब जब भी उनको कोई अवसर हाथ आया तो उन्होंने इस बात की ओर ध्यान दिलाया, उन्होंने अपने आखरी हज यात्रा के अवसर पर अपने अंतिम संबोधन में धर्मोपदेश के बड़े भाग को इसी विषय के लिए ख़ास किया थाlउस में हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने कहा था:" महिलाओं के साथ भलाई की सलाह दिया करो, वे तुम्हारे बंधन में हैं, इस के अलावा तुम कुछ कर भी नहीं सकते हो, लेकिन यदि वे स्पष्ट घृणा के काम में पड़ जाएं और यदि वे ऐसा कुछ करलें तो उनको बिस्तरों पर अलग रखो, (और यदि इस से भी कोई काम न बने तो )उनको बिल्कुल हलकी फुल्की मार मारो, और यदि वे बात मान लें तो फिर उनके खिलाफ रास्ता न ढूँढो, तुम्हारी अपनी पत्नियों पर अधिकार है और तुम्हारी पत्नियों के भी तुम पर अधिकार हैं , उन पर तुम्हारा अधिकार यह है कि वे तुम्हारे बिस्तरों पर किसी ऐसे को सोने की अनुमति न दें जिनको तुम नहीं चाहते हो, और न तुम्हारे घरों में ऐसे लोगों को अनुमति दें जिनको आप नहीं चाहते हो और उनके तुम पर यह अधिकार हैं कि तुम उनके साथ मेहरबानी करो उनके कपड़े में और उनके भोजन में l"

यह हदीस अम्र बिन अहवस से कथित है, और विश्वसनीय है , इसे अल्बानी ने उल्लेख किया है, देखिए 'सहीह इब्न माजा'पेज नंबर या संख्या: १५१३l

हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने औरतों के साथ भलाई से संबंधित सलाह को बार बार इसलिए दुहराया क्योंकि वह महिलाओं के सवभाव को अच्छी तरह जानते थे जैसा कि अभी अभी हदीस शरीफ में उल्लेख किया गया, और इस प्रकृति को कुछ पुरुष सह नहीं पाते हैं और गुस्सा के समय खुद पर नियंत्रण खो बैठते हैं और महिला के टेढ़ेपन के कारण उनसे जुदा हो जाते हैं और पूरा घर परिवार तितरबितर हो जाता है और आपस में फूट पड़ जाता है l

इसलिए, हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने एक दूसरी हदीस में पतियों को निर्देशित किया जिस से परिवार के बीच भलाई का वातावरण बना रहता हैl

३- कोई मोमिन पति मोमिन पत्नी से नफरत न रखे, क्योंकि अगर वह उसके किसी चरित्र को नापसंद करता है,  तो वह उसके किसी दूसरे चरित्र को पसंद भी करता हैlयह हदीस हज़रत अबू-हुरैरा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे-के द्वारा कथित की गई , और यह हदीस सही है, इसे इमाम मुस्लिम ने उल्लेख किया है, देखिए मुस्लिम शरीफ पेज नंबर या संख्या: १४६९l

४- और हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने फ़रमाया:" मोमिनों में सबसे पक्का ईमान वाला वह है जो उनके बीच सब से अच्छा शिष्टाचार का मालिक है और अपने परिवार के लिए सबसे नरम है l"  यह हदीस हज़रत आइशा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे-से कथित है, और यह हदीस विश्वसनीय है, इमाम तिरमिज़ी ने कहा:अबू-किलाबा के हज़रत आइशा से हादीस सुनने के विषय मुझे पता नहीं lइसे मुनज़िरी ने उल्लेख किया है देखिए 'तरगीब व तरहीब'पेज नंबर ३/९५l 

 ५-और उन्होंने फ़रमाया:"तुम्हारे बीच सबसे अच्छा वह है जो अपने परिवार के लिए अच्छा है और मैं अपने परिवार के लिए आप सब की तुलना में सबसे अच्छा हूँ l" यह हदीस हज़रत आइशा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे-से कथित है, और यह हदीस विश्वसनीय है, इसे इब्ने जरीर तबरी ने उल्लेख किया देखिए 'मुस्नद उमर'पेज नंबर या संख्या१/४०८l 

"

६-हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने कहा:" हर वह चीज़ जिस में अल्लाह सर्वशक्तिमान की याद शामिल न हो वह खेल या भूल है लेकिन चार बातें इस से अतिरिक्त हैं : एक आदमी का दो निशानों के बीच चलना (तीरंदाजी सीखना) और अपने घोड़े को सिधाना , और अपनी पत्नी के साथ दिल्लगी करना, और तैराकी सिखाना lयह हदीस हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह अनसारी या जाबिर बिन उमैर से कथित है, इसके कथावाचक ठीक हैं , इसे मुनज़िरी ने उल्लेख किया है, देखिए 'तरगीब व तरहीब'पेज नंबर या संख्या२/२४८l 

इस के इलावा और भी बहुत सारी हदीसें हैं जो बहुत मशहूर हैं और जिनमें परिवारों और रिश्तेदारों के साथ अच्छा व्यवहार करने का आदेश दिया गया है l 

हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-का अपनी पत्नियों को ज़रूरत पड़ने के समय अदब सिखाना

हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-अपने परिवार और अपनी सभी पत्नियों के साथ सुंदर बर्ताव करते ही थे , मेहरबानी, कृपा, नरमी और दया उनकी पहचान थी लेकिन वह सदा ऐसा ही नरम नहीं रहते थे क्योंकि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-एक बहुत बड़े बुद्धिमान थे सब काम अवसर और समय और सही परिस्थितियोंके हिसाब से करते थे जब दया और नरमी का अवसर होता था तो उसी के अनुसार चलते थे और जब डांटने, सिखाने बात बंद करने का अवसर होता था और उसी में लाभ दिखता था तो उसी के अनुसार काम करते थे, जैसा कि एक कवि का कहना है:                   (उस सब्र और सहनशीलता में कोई भलाई नहीं है यदि उसके साथ थोड़ा गुस्सा न हो ताकि सहनशीलता की सफाई को मैली पड़ने से बचा सके)  

और क्योंकि महिलाएं कुटिल स्वभाव और तेज़ भावनाओं पर पैदा की गई हैं इसलिए कभी कभी उनको डांटने, सधानेऔर उनको शिक्षित  करने की भी ज़रूरत पड़ती है, इसलिए अल्लाह सर्वशक्तिमान ने यह जिम्मेदारी पुरुषों को सोंपी है , अल्लाह सर्वशक्तिमान का फरमान है:

 

  الرِّجَالُ قَوَّامُونَ عَلَى النِّسَاء بِمَا فَضَّلَ اللَّهُ بَعْضَهُمْ عَلَى بَعْضٍ وَبِمَا أَنفَقُواْ مِنْ أَمْوَالِهِمْ فَالصَّالِحَاتُ قَانِتَاتٌ حَافِظَاتٌ لِّلْغَيْبِ بِمَا حَفِظَ اللَّهُ وَالَّلاتِي تَخَافُونَ نُشُوزَهُنَّ فَعِظُوهُنَّ وَاهْجُرُوهُنَّ فِي الْمَضَاجِعِ وَاضْرِبُوهُنَّ فَإِنْ أَطَعْنَكُمْ فَلاَ تَبْغُواْ عَلَيْهِنَّ سَبِيلاً إِنَّ اللَّهَ كَانَ عَلِيًّا كَبِيرًا (النساء:34).

(पति पत्नियों के संरक्षक और निगरां हैं, क्योंकि अल्लाह ने उनमें से कुछ को कुछ के मुक़ाबले में आगे रखा है, और इसलिए भी कि पतियों ने अपने माल ख़र्च किये हैं, तो नेक पत्नियां तो आज्ञापालन करनेवाली होती हैं और गुप्त बातों की रक्षा करती हैं क्योंकि अल्लाह ने उनकी रक्षा की है, और जो पत्नियां ऐसी हों जिनकी सरकशी का तुम्हें भय हो उन्हें समझाओ और बिस्तरों पर उन्हें अकेली छोड़ दो और(अति आवश्यक हो तो) उन्हें मारो भी, फिर यदि वे तुम्हारी बात मानने लगें तो उनके विरूद्ध कोई रास्ता न ढूंढों अल्लाह सबसे उच्च, सबसे बड़ा हैl

 (पवित्र कुरान, अन-निसा: 4:34) 
वास्तव में हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने अपने परिवार के साथ इस तरह का तरीक़ा इसलिए अपनाया था ताकि मुसलमानों को शिक्षा मिले और अपने परिवारों को सुधारने और शिक्षा देने में उनका अनुशासन कर सकें l

जब हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की पत्नियों ने सामान्य सीमा से अधिक खर्च की मांग की इस क्षणभंगुर जीवन में सुख और प्रसन्न के आनंद की इच्छा उनके सामने रखीं -जबकि वह खुद दुनिया में काम चलाव मिल जाने के सिद्धांत पर चलते थे- इस पर हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने उनको छोड़ दिया और एक महीना तक उनके पास न जाने की क़सम खाली, यहाँ तक कि अल्लाह सर्वशक्तिमान पवित्र क़ुरआन की यह आयतें उतारी:

( يأيها النبي قل لأزواجك إن كنتن تردن الحياة الدنيا وزينتها فتعالين أمتعكن وأسرحكن سراحا جميلا * وإن كنتن تردن الله ورسوله والدار الآخرة فإن الله أعد للمحسنات منكن أجراً عظيما ) الأحزاب : 28 - 29 )

(ऐ नबी! अपनी पलियों से कह दो कि "यदि तुम सांसारिक जीवन और उसकी शोभा चाहती हो तो आओ, मैं तुम्हें कुछ दे-दिलाकर भली रीति से विदा कर दूँlकिन्तु यदि तुम अल्लाह और उसके रसूल और आखिरत के घर को चाहती हो तो निश्चय ही अल्लाह ने तुम में से उत्तमकार स्त्रियों के लिए बड़ा प्रतिदान रख छोड़ा है l (अल-अहज़ाब:२८-२९)

इस पर हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने उन्हें दो विकल्प के बीच इख्तियार दिया या तो उनके साथ रहें और सूखी रूखी पर काम चलाएं या फिर उनसे जुदा हो जाएं तो उन सब ने अल्लाह और उसके रसूल वाले विकल्प को चुन लिया जैसा कि हज़रत अनस , उम्मे सलमा और इब्ने अब्बास से कथित हदीसों में उल्लेख है जो बुखारी और मुस्लिम में है l 

जी हाँ तो आपने देख लिया कि जब समस्या गंभीर होती थी तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-को कोई डर नहीं होता था और उनको डांटने और सुझाव देने में किसी निंदा करने वाले की निंदा से बिल्कुल नहीं डरते थे l जी हाँ यदि उनसे कोई धार्मिक गलती हो जाती या कोई ऐसी गलती हो जाती जिसको अन्देखी नहीं किया जा सकता तो वह ज़रूर सलाह देते थे , सुझाव पेश करते थे, डराते थे , गुस्सा करते थे समझाते थे लेकिन अवसर को देख कर और समय के अनुसार , जैसा कि उनके बारे में सभी को ज्ञान हैं और मशहूर है l

इस का साफ़ मतलब यही है कि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के शिष्टाचार बिल्कुलसंतुलित थे हर हर चीज़ को अपनी अपनी उचित जगह पर रखते थे l 




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