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---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? ---उस पर व्यभिचार का आरोप लगाया गया जबकि वह बेगुनाह है, और उसके पास अपनी बेगुनाही का कोई सबूत व प्रमाण नहीं है। तो वह क्या करे? ---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? ---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? --- नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का वुज़ू नींद से नहीं टूटता है। ---उस पर व्यभिचार का आरोप लगाया गया जबकि वह बेगुनाह है, और उसके पास अपनी बेगुनाही का कोई सबूत व प्रमाण नहीं है। तो वह क्या करे? ---वादा-ख़िलाफ़ी सख़्ती से मना ---दुश्मन की लाशें उसके हवाले करना ---दुश्मन की लाशों पर गु़स्सा न निकाला जाए ---दुश्मन की लाशों पर गु़स्सा न निकाला जाए

Under category हज़रत पैगंबर की पवित्र पत्नियां
Creation date 2007-11-02 14:11:48
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हज़रत ज़ैनब बिन्त खुज़ैमा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे-

उनका नाम और खि़ताब:


वह ज़ैनब पुत्री खुज़ैमा अल-हारिस बिन अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन अब्दे मनाफ बिन हिलाल बिन आमिर बिन सअसआ अल-हिलाली थींl
इतिहासकारों के बीच उनके पिता की तरफ के पूर्वजों पर सहमति है, जैसा कि इब्न अब्दुल-बर्र ने अपनी “अल-इस्तीआब”नामक पुस्तक में उनकी जीवनी के विषय में बात करते हुए कहा है, और इसी पर हमारे सामने उपलब्ध सभी स्रोतों में भी सहमति दिखाई दे रही है, लेकिन उनकी माँ की ओर के पूर्वजों के नामों के बारे में हमारे सूत्रों में खामुशी दिखाई दे रही है, इब्न अब्दुल-बर्र ने उसके बारे में अरब जातियों के मूल के माहिर अबुल-हसन जुर्जानी का बयान कथित किया है जिस में आया है कि:हज़रत ज़ैनब बिनते खुज़ैमा हज़रत मैमूना बिनते हारिस(जो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की पवित्र पत्नियों में शामिल हैं)की सौतेली बहन थीं और इस्लाम से पहले उनको “उम्मुल-मसाकीन”(यानी ग़रीबों की मां) का नाम दिया जाता था lवह बहुत दानशील थीं और भली महिला थीं, इस्लाम से पहले और इस्लाम के समय दोनों में वह ग़रोबों और बेसहारों की सहायता करती थीं, और किसी भी पुस्तक में उनका नाम“उम्मुल-मसाकीन”(यानी ग़रीबों की मां) के बिना नहीं मिलता है l
 
हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के साथ उनकी शादी
ज़ैनब बिनते खुज़ैमा हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की पवित्र पत्नियों में से एक थीं, और हज़रत हफ्सा के हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के घर में आने के थोड़े दिनों के बाद उनके साथ विवाह हुआ, वह एक पुराने कुरैशी मुहाजिर की विधवा थीं जो एक जंग में शहीद हो गए थे और हज़रत ज़ैनब हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की पवित्र पत्नियों में चौथी थीं lयाद रहे कि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के घर में उनके ठहरने से संबंधित बहुत कम जानकारी उपलब्ध है, हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की जीवनी लेखकों और इतिहासकारों ने इस विषय में ज़ियादा जानकारी नहीं दिए, उनके बारे में कुछ कथन हैं जो गड़बड़ी से खाली नहीं है, हज़रत ज़ैनब हज़रत ओबैदा बिन हारिस बिन अब्दुल-मुत्तलिब की पत्नी थीं जो जंगे बद्र में शहीद हो गए थे तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने तीन हिजरी में उनके साथ विवाह कर लिया, यह बात भी कही गई है कि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-का उनके साथ विवाह केवल मेहरबानी के मक़सद से थाl
इस बात में भी मतभेद हैकि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के साथ उनके विवाह की जिम्मेदारी किसने अंजाम दी थी, इस बारे में “अल-इसाबा”नामक पुस्तक में अल-कलबी से कथित है कि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के साथ उनकी शादी हज़रत हफ्सा के साथ उनकी शादी के बाद हुई, और केवल दो तीन महीने उनके घर में रहीं और फिर उनका निधन हो गया l
और कलबी से ही एक दूसरे कथन में है कि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने उनके साथ तीन हिजरी में रमज़ान के महीने शादी की थीं और उनके साथ आठ महीने ठहरीं और फिर उनका चार हिजरी रबीउल आखिर में निधन हो गयाl
और “शाज़रात अज़-ज़हब”में उल्लेख है कि:हिजरत के तीसरे साल में हज़रत ज़ैनब बिनते खुज़ैमा अल-आमिरिया“उम्मुल-मसाकीन”(यानी ग़रीबों की मां) के साथ शादी हुई, उनके साथ तीन महीने रहीं और फिर उनका देहान्त हो गया l

 

उनका निधन:
लेकिन ज़ियादा सही बात यही है कि उनका निधन अपनी उम्र के तीसवें साल में  हुआ, जैसा कि वाक़दी ने उल्लेख किया और इब्ने हजर ने “अल-इसाबा”नामक पुस्तक में लिखा है, वह शांति के साथ ज़िन्दगी गुज़ारी और शांति के साथ इस दुनिया से गईं, औरहज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने उनकी नमाज़े जनाज़ा पढ़ाई, और जन्नतुल बक़ीअ में दफन की गईं, और यह घटना चार हिजरी में घटी थी, इस तरह वह हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की पवित्र पत्नियों में से सब से पहली थीं जो जन्नतुल बकीअ में दफ़न हुईं, और शादी के आठ महीने बाद ही उनका निधन होगया, उनकी जिंदगी में हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की पवित्र पत्नियों में से किसी का भी निधन नहीं हुआ था सिवाय हज़रत खदीजा-अल्लाह उनसे प्रस्सन रहे- क्योंकि वह मक्का शरीफ में जुहून नामक स्थान में दफन हुईं,  याद रहे कि वहहज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की पवित्रपत्नियों में शामिल थीं और विश्वासियों की माँ थीं, और “उम्मुल-मसाकीन”(यानी ग़रीबों की मां) थीं l




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