पैगंबर हज़रत मुहम्मद के समर्थन की वेबसाइट - हज़रत ज़ैनब बिनते जहश –अल्लाह उनसे खुश रहे-



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---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? ---उस पर व्यभिचार का आरोप लगाया गया जबकि वह बेगुनाह है, और उसके पास अपनी बेगुनाही का कोई सबूत व प्रमाण नहीं है। तो वह क्या करे? ---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? ---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? --- नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का वुज़ू नींद से नहीं टूटता है। ---उस पर व्यभिचार का आरोप लगाया गया जबकि वह बेगुनाह है, और उसके पास अपनी बेगुनाही का कोई सबूत व प्रमाण नहीं है। तो वह क्या करे? ---वादा-ख़िलाफ़ी सख़्ती से मना ---दुश्मन की लाशें उसके हवाले करना ---दुश्मन की लाशों पर गु़स्सा न निकाला जाए ---दुश्मन की लाशों पर गु़स्सा न निकाला जाए

Under category हज़रत पैगंबर की पवित्र पत्नियां
Creation date 2007-11-02 14:13:05
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हज़रत ज़ैनब बिनते जहश –अल्लाह उनसे खुश रहे-


 हज़रत ज़ैनब बिनते जहश–अल्लाह उनसे खुश रहे-कुरैश के बड़े खानदान की महिला थीं, इस्लामने उनकी आत्मा को शुद्ध कर दिया था,और उनके हृदय को अपने प्रकाश और अपनी रौशनी से प्रकाशित कर दिया था, और उन्हें  धार्मिकता और शिष्टाचार की सुंदरता से सजा दिया थाl
इसके कारण वह दुर्लभ रत्नों की तरह हो गईं थीं, औरधार्मिकता धर्मपरायणता, उदारता और दान में पूरी दुनिया की महिलाओं में उनका बड़ा मक़ाम रहा, इस तरह वह विश्वासियों की मां और हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- की पत्नी बन गईं, और जो बात अधिक सम्मान और मान्यता का कारण बनीं और जिस से उनका मक़ाम इतिहासकारों की नज़र में और भी ऊँचा हो गया इसलिए कि उनकी शादी की कहानी का उल्लेख शुभ क़ुरआन में किया गया, और उनकी वजह से हिजाब की आयत उतरी,और सदा के लिए उनका नाम और मक़ाम मस्जिदों में भी ऊँचा हो गया l

वह अल्लाह को बहुत याद करनेवाली थीं, और अल्लाह से बहुत नज़दीक थीं, दिन में रोज़े रखती थीं और रात में नमाज़ पढ़ती थीं, वह एक उदार हाथ की मालिक थीं, अपनी सारी चीजों को गरीबों और लाचारों में बाँट देती थीं उनकी सहायता से कभी पीछे नहीं हटती थीं, यहाँ तक कि वह उदारता और शिष्टाचार का एक बड़ा उदाहरण बन गई थीं, उनकी उदारता के कारण उनको कई नाम और ख़िताब मिले थे, जैसे: “उम्मुल-मसाकीन” (गरीबों की मां) और “मफज़उल-एैताम”(अनाथों का सहारा) और “मलजउल-अरामिल”(विधवाओं की शरण)lवास्तव में वहअच्छे कर्म करने में बहुत आगे आगे रहनेवाली महिला थीं, उनकी सुगंधित जीवनी से पूरे इस्लामी इतिहाससुवासितहै, हज़रत ज़ैनब की जीवनी प्रत्येक मुस्लिम महिला के लिए ज़बरदस्त उदाहरण है और उनके ऊँचे शिष्टाचार और नीति का अनुकरण होना चाहिए, मुस्लिम महिला के लिए उनके तरीके और रास्ते पर चलना ज़रूरी है, इस से अल्लाह और उसके पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की प्रसन्नता प्राप्त हो सकती हैl
उनका नाम और वंश
उनका पूरा नाम इस तरह है: ज़ैनब बिनते-जहाश बिन रियाब बिन यअमुर बिन मुर्राह बिन कसीर बिन गुनम बिन दौरान बिन असद बिन खुज़ैमा , और उनको “उम्मुल-हकम”का भी खिताब दिया गया था, उनके मामुओं में हज़रत हम्ज़ा बिन अब्दुल-मुत्तलिब का नाम आता है, जो “असदुल्लाह”(यानी अल्लाह के शेर) और “सय्यिदुश-शुहदा” (यानी शहीदों के सरदार) के नामों से याद किए जाते थे, जंगे उहुद में शहीद हुए थे, उसी तरह उनके मामुओं में हज़रत अब्बास बिन अब्दुल-मुत्तलिब भी शामिल थे, जो उदारता और मुसीबतों के समय में लोगों पर अपना धन लुटाने में बहुत मश्हूर थे, और उनकी मौसी हज़रत सफिय्या बिनते अब्दुल-मुत्तलिब थीं जो हाशिमी खानदान से थीं, और हज़रत ज़ैनब हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के चहीते साथी हज़रत ज़ुबैर बिन अव्वाम अल-असदी की मां थीं, और उनके दो भाई थे: अब्द बिन जहश अल-असदी जिनके लिए इस्लाम में सब से पहला झंडा बनाया गया था, और वह शहीदों में शामिल थे, और दूसरा भाई अबू-अहमद अब्द बिन जहश अल-अअमा थे, जो पहले पहल इस्लाम लानेवालों से थे और शुभ मदीना की ओर पहला स्थलांतर करनेवालों में से थेlऔर उनकी दो बहनें थीं: उमैमा बिनते अब्दुल-मुत्तलिब जो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- की फूफी थीं, और दूसरी बहन हमना बिनते जहश थीं जो पुराने ईमान लानेवालों में शामिल थीं, हज़रत ज़ैनब-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे- हिजरत से तीस साल पहले मक्का शरीफ में पैदा हुई थीं lऔर यह भी कहा गया है कि हजरत से १७ से पहले पैदा हुई थींl

हज़रत ज़ैनब का पालनपोषण सम्मान, इज़्ज़त और बड़े खानदानी के घर में हुआ था, उन्हें अपने बड़े घर के होने का इहसास भी था, और अपने परिवार के सम्मान पर उन्हें गर्व भी था, एक बार वह बोलीं: मैं अब्दे-शम्स के खानदान की महिला हूँl

उनका इस्लाम स्वीकार करना
हज़रत ज़ैनब उन महिलाओं में शामिल थीं जो पहले अवसर में इस्लाम में प्रवेश हुईं थीं, वास्तव में वह अपने सीने में एक साफ सुथरा और अल्लाह व रसूल के लिए पवित्र दिल रखती थीं, वह अपने धर्म में पक्की और सच्ची थीं,इसलिए वह कुरैश के दुखों को सह सकीं, और जब आदेश मिला तो लोगों के साथ शुभ मदीना को स्थलांतर कर गईं, और मदीनावाले अनसार अपने घर अपने धन सब कुछ मुहाजिरों के लिए आधा आधा करके बाँट

दिए l
उनकी ज़बरदस्त नैतिकता और शानदार कारनामे
विश्वासियों की मां हज़रत ज़ैनब बहुत महान मकाम और शानदार दर्जे की मालिक थीं, खासकर जब विश्वासियों की मां और हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- की पत्नी बन गईlअधिक से अधिक नमाज़ पढ़ती थी रोज़ा रखती थीं, और बहुत शुद्ध आत्मा रखती थीं, जो कुछ भी उनके पास होता था सब ग़रीबों और बेचारों पर खर्च करती थीं,  काम काज करके कमाती थीं घरेलू इस्तेमाल की चीजें बनाती थीं और बेचती थीं और उसके पैसों को दान करती थीं, वास्तव में वह एक ईमानदार, पवित्र, शुद्ध और रिश्तेदारों पर खर्च करती थींl

 
हज़रत ज़ैनब बिनते जहश की उदारता और उनका दिल खोल खर्च करना

हमें यहाँ कई कहानियाँ मिलती हैं जिनसे हज़रत बिनते जहश-अल्लाह उनसे खुश रहे-की उदारता स्पष्ट होती है, और जिनसे यह पता चलता है कि वह बहुत उदार और दानशील थीं बल्कि गरीबों पर बेहद खर्च करती थीं, इस विषय में बुखारी और मुस्लिम ने उल्लेख किया है, यहाँ इमाम मुस्लिम के शब्द लिखे जा रहे हैं, हज़रत आइशा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे से कथित है, वह कहती हैं: हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- ने फ़रमाया: तुम में सब से पहले(निधन के बाद) मुझ से मिलने वाली वह होगी, जो तुम्हारे बीच सब से लंबे हाथों वाली हैं(यानी जो सब से अधिक उदार हैं), इसके बाद हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- की पवित्र पत्नियां आपस में एक दूसरे के हाथों को नापकर देखती थीं और फिर तुलना करती थीं कि सब से लंबे हाथ किनके हैं, और फिर हज़रत ज़ैनब के ही हाथ ज़ियादा लंबे निकलते थे, क्योंकि वह बहुत कामकाज करती थीं, और दान करती थींl
और एक दूसरे कथन में है, हज़रत आइशा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे- कहती हैं:और हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- के निधन के बाद जब हम किसी के घर में जमा होते थे तो दीवार की ओर हम अपने अपने हाथों को लंबा करके देखते थे कि सब से लंबा हाथ किसका है l
हम इस तरह करके देखते थे यहाँ तक कि हज़रत ज़ैनब बिनते जह्श का निधन हो गया, वह उतनी लंबी तो नहीं थी बल्कि छोटे कद की थींl
लेकिन जब हज़रत ज़ैनब का निधन हो गया तो हमें पता चला कि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- का मकसद यह था कि वह बहुत उदार और दानशील है, क्योंकि वह हस्तरचित में बहुत माहिर थीं, और सीने-पिरोने का काम करके कमाती थीं और अल्लाह के रास्ते में दान करती थींlहज़रत आइशा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे-आगे उनके विषय में कहती हैं: ज़ैनब रूई धुनकती(या सूत कातती) थीं, और हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के फौजियों को देती थीं तो वे उसे अपने जंगों में सीने-पिरोने में इस्तेमाल करते थेl
उनकी उदारता और दानशीलता के विषय में बरज़ा बिनते राफेअ कहती हैं: हज़रत उमर हज़रत ज़ैनब के पास बहुत सारा धन भिजाए, जब धन उनके पास लाया गया तो वह बोलीं: मेरे पास क्या ज़रूरत थी? मेरी दूसरी बहनें इसको बांटने में अधिक शक्तिशाली थीं, तो लोगों ने उनको कहा:यह सब आपके लिए हैं, तो वह एक कपड़े से परदह करके बोलीं “सुबहानल्लाह”(अल्लाह को पवित्रता हो) लाओ सबको एक कपड़े पर निकालो और फिर मुझको बोलीं: उसमें अपने दोनों हाथों को डालो और भर कर ले लो और बनी-फुलान जाति और बनी-फुलान जाति के पास जा कर दे दो खासतौर पर जो उनके रिश्तेदारों में लाचार थे और जिनके पास अनाथ पलते थे, इस तरह उन्होंने सारे धन को वहीँ बाँट दिया, और कुछ कपड़े में बच कर रह गया था तो बरजा उनको बोलीं : हे मोमिनों की मां! अल्लाह आपको माफ करे, इस धन में मेरा भी कुछ हक मिलना चाहिए, तो हज़रत ज़ैनब बोलीं ठीक है, अब जो कपड़े पर पड़ा है वह तुम्हारा है, तो उस कपड़े से ५८० दिरहम निकले, इसके बाद वह अपने हाथों को उठाइं और यह दुआ कीं: ऐ अल्लाह इस साल के बाद उमर के दान मुझको न पहुंचें l
और हज़रत आइशा-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे-कहती हैं: ज़ैनब बिनते जहश हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के पास मेरे दर्जे पर मुक़ाबला करती थीं, और मैंधर्म के संबंध मेंज़ैनब से बढकर अच्छी औरत किसी को नहीं देखि, वह अल्लाह का बहुत डर अपने दिल में रखती थीं और सदा सच बोलती थीं, रिश्तेदारों पर दया करती थीं और बहुत ज़ियादा दान दिया करती थीं lअल्लाह-उनसे प्रसन्न रहे-और अब्दुल्ला बिन श्द्दाद से कथित है कि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने हज़रत उमर से कहा:"निस्संदेह ज़ैनब बिनते जहश “अव्वाहह”(अल्लाह के सामने रोने वाली) है, इस पर उनसे पूछा गया: “अव्वाहह” का मतलब क्या है तो उन्होंने फरमाया:(अल्लाह के लिए) बहुत रोने-धोने वाली " जैसा कि शुभ क़ुरआन में हज़रत इबराहीम-सलाम हो उनपर- के विषय में आया है:

إن ابراهيم لحليم أواه منيب

(निसंदेह इबराहीम बड़ा ही सहनशील,कोमल ह्र्दय,हमारी ओर रुजू (प्रवर्त्त) होनेवाला था l) इस आयत में भी “अव्वाहह” का शब्द आया है जिसका अर्थ है (कोमल ह्र्दय)l
और हज़रत आइशा ने उनके विषय में कहा: "निस्संदेह सराहनीय शिष्टाचार वाली, लगन से इबादत करनेवाली, अनाथों और विधवाओं का सहारा दुनिया से उठ गईं l”
 और इब्ने-सअद ने कहा: हज़रत ज़ैनब बिनते जहश-अल्लाह उनसे खुश रहे- न दीनार छोड़ीं और न दिरहम छोडीं, बल्कि जो भी उनके हाथ लगता था सबको दान में लुटा देती थीं, क्योंकि वह तो “बेसहारों का सहारा”थीं l

हज़रत ज़ैनब से कथित शुभ हदीसें
हज़रत ज़ैनब-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे- उन महिलाओं में शामिल थीं जिन्होंने हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की हदीसों को याद कीं थीं और कथित कींl

हज़रत ज़ैनब-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे- से ११ हदीसें कथित हैं, जिनमेंसे दो पर बुखारी और मुस्लिम सहमत हैंlउनसे कई सहाबा ने हदीस सुनी, उनमें कुछ के नाम इस तरह हैं:उनका भतीजा  मुहम्मद बिन अब्दुल्ला बिन जहश, और क़ासिम इब्न मुहम्मद इब्नअबू-बक्र, और उनके आज़ाद किया हुआ गुलाम मज़्कूर, और सहाबी महिलाओं ने भी उनसे हदीस सुनी थीं जिनमें से कुछ के नाम इस तरह हैं: ज़ैनब बिनते अबू-सलमा , और उनकी मां, मोमिनों की मां हज़रत उम्मे-सलमा,  और मोमिनों की मां हज़रत रमला बिनते अबू-सुफ़यान जिनको उम्मे-हबीबा भी कहा जाता है, और उम्मे-कुलसूम बिनते मुस्तालिकl
वह हदीसें जो उनसे कथित हुईं, हज़रत ज़ैनब कहती हैं मैं हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की पत्नी उम्मे-हबीबा के पास आई जब उनके पिता अबू-सुफ़यान बिन हरब का निधन हुआ था, तो उम्मे-हबीबा खुशबू मंगाई, और एक लड़की को उसमें से लगाईं और फिर अपने गालों पर लगा लीं, और बोलीं, अल्लाह की क़सम मुझे खुशबू की कोई इच्छा नहीं हैं, लेकिन मैं हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-को फरमाते सुनी: जो महिला अल्लाह और आखिरत के दिन विश्वास रखती है, उसके लिए यह जायज़ नहीं है कि किसी मृतक पर तीन रात से अधिक शोक मनाए, लेकिन पति पर चार महीने दस दिनlयह हदीस हज़रत उम्मे-हबीबा रमला बिनते अबू-सुफ़यान से कथित है और सही है, इसे बुखारी ने उल्लेख किया है देखिए बुखारी शरीफ हदीस नंबर५३३४l   

और बुखारी द्वारा सुनाई गई है कि उम्मे-हबीबा बिनते अबू-सूफीयान से हज़रत ज़ैनब बिनते जह्श से कथित है, कि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-एक बार उनके पास घबराए हुए आए और कह रहे थे :अल्लाह को छोड़ कर और कोई पूजनीय नहीं है, अरबों की खराबी है उस बुराई से जो नज़दीक हो चुकी है, याजूज और माजूज के बाँध में से इतना खुल चुका है, और उन्होंने शहादत की उंगली और अंगूठे के बीच गोल घेरा बना कर बताया: ज़ैनब बिनते जहश कहती हैं इस पर मैं पूछी ऐ अल्लाह के दूत ! क्या अच्छे लोगों की हमारे बीच उपस्थिति के बावजूद हम नष्ट हो सकते हैं? तो उन्होंने फरमाया : हाँ जब बुराई ज़ियादा हो जाए l

यह हदीस हज़रत ज़ैनब बिनते जह्श से कथित है और सही है, इसे बुखारी ने उल्लेख किया है देखिए बुखारी शरीफ हदीस नंबर:३३४६l     




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