पैगंबर हज़रत मुहम्मद के समर्थन की वेबसाइट - आप यह दर्जा कैसे प्राप्त कर सकते हैं कि परमे&



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Knowing Allah
  
  
---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? ---उस पर व्यभिचार का आरोप लगाया गया जबकि वह बेगुनाह है, और उसके पास अपनी बेगुनाही का कोई सबूत व प्रमाण नहीं है। तो वह क्या करे? ---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? ---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? --- नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का वुज़ू नींद से नहीं टूटता है। ---उस पर व्यभिचार का आरोप लगाया गया जबकि वह बेगुनाह है, और उसके पास अपनी बेगुनाही का कोई सबूत व प्रमाण नहीं है। तो वह क्या करे? ---वादा-ख़िलाफ़ी सख़्ती से मना ---दुश्मन की लाशें उसके हवाले करना ---दुश्मन की लाशों पर गु़स्सा न निकाला जाए ---दुश्मन की लाशों पर गु़स्सा न निकाला जाए

   

आप यह दर्जा कैसे प्राप्त कर सकते हैं कि परमेश्वर सर्वशक्तिमान खुद आप से  प्यार करने लगे?


सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जो दयालु बहुत माफ करनेवाला, अत्यंत उदार सर्वशक्तिमान, दिलों और आंखों को जैसा चाहे बदलनेवाला, खुली और छिपी को जाननेवला है, मैं सदा और लगातार शाम और सुबह उसकी बड़ाई बोलता हूँ , और मैं गवाही देता हूँ कि सिवाय अल्लाह के और कोई पूजनीय नहीं है, अकेला है कोई उसका साझी नहीं, एक ऐसी गवाही देता हूँ जो अपने कहनेवाले को नर्क की यातना से मुक्त करदे, और मैं गवाही  देता हूँ कि हज़रत मुहम्मद-उन पर इश्वर की कृपा और सलाम हो-उसका चुना हुआ पैगंबर है, उनके परिवार पर और उनकी पवित्र पत्नियों और उनके सम्मान, और आदर के लायक़ साथियोँ पर इश्वर की कृपा और सलाम हो, यह सलाम और दया लगातार उस समय तक होते रहें जब तक रात और दिन बाक़ी हैं.
प्रशंसा और सलाम के बाद.....

 


जानना चाहिए कि एक मुसलमान के लिए अपने दैनिक जीवन में जो बात अधिक से अधिक ख्याल रखने के योग्य और अत्यंत महत्वपूर्ण है वह यही है कि चलते-फिरते, अपने शब्दों और अपने कर्मों में हज़रत पैगंबर-उन पर इश्वर की कृपा और सलाम हो- की सुन्नत(या मार्ग) पर चले, और सुबह से लेकर शाम तक अपनी पूरी जीवन को हज़रत पैगंबर-उन पर इश्वर की कृपा और सलाम हो-के तरीक़े के अनुसार बनाए.


ज़ुन-नून अल-मिस्री ने कहा: अल्लाह सर्वशक्तिमान से प्यार की निशानी यह है कि अपने प्रिय पैगंबर-उन पर इश्वर की कृपा और सलाम हो- का अनुसरण करे, उनकी नैतिकता, कार्यों, आदेश और तरीक़ों में. अल्लाह ने कहा:
 ( قُلْ إِنْ كُنْتُمْ تُحِبُّونَ اللَّهَ فَاتَّبِعُونِي يُحْبِبْكُمُ اللَّهُ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ذُنُوبَكُمْ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَحِيمٌ ) [آل عمران:31]
कह दो: "यदि तुम अल्लाह से प्रेम करते हो तो मेरा अनुसरण करो, अल्लाह भी तुम से प्रेम करेगा और तुम्हारे गुनाहों को क्षमा कर देगा.अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है.( आले-इमरान:३१) 


और हसन अल-बसरी ने कहा: दरअसल अल्लाह से प्यार उसके पैगंबर  के अनुसरण करने में छिपा है.
एक मोमिन की स्थिति हज़रत पैगंबर-उन पर इश्वर की कृपा और सलाम हो-के तारीक़े के अनुसरण करने के हिसाब से नापी जाती है, जितना अधिक उनके तरीक़े पर चलनेवाला होगा उतना ही अधिक अल्लाह के पास ऊँचा और ज़ियादा सम्मानवाला होगा.  

 


 यही कारण है कि मैंने इस संक्षिप्त अध्ययन को इकठ्ठा किया है, और इसका लक्ष्य यह है कि मुसलमानों की दैनिक जीवन में हज़रत पैगंबर-उन पर इश्वर की कृपा और सलाम हो-के तारीक़े को जीवित किया जाए,  इबादत, सोने-जागने, खाने-पीने उठने-बैठने, लोगों के साथ बर्ताव करने, नहाने-धोने, निकलने और प्रवेश करने में और पहनने-ओढ़ने में बल्कि हर हर बात में उनकी सुन्नत को जिंदा किया जाए.
ज़रा सोचीये कि यदि हम में से किसी का कुछ पैसा खो जाए तो हम  कितना उसका ख्याल करेंगे और हम कितना दुखी होंगे, और उसको खोजने केलिए हम कितना प्रयास करेंगे बल्कि खोजे बिना हम सांस न लेंगे, हालांकि हमारी जीवन में कितनी सुन्नत हम से छूटती जाती है, लेकिन क्या हम उस केलिए कभी दुखी हुए? क्या हमने उसे अपनी जीवन पर लागू करने का प्रयास किया?


 हमारी जीवन की सब से बड़ी मुसीबत जिसको हमें झेलना पड़ रहा है यही है कि हम पैसे और धनदौलत को सुन्नत से भी बढ़कर सम्मान और महत्व देने लगे, यदि लोगों से यह कहा जाए कि जो सुन्नतों में किसी भी एक सुन्नत पर अमल करेगा तो उसे इतना पैसा दिया जाएगा, तो आप देखेंगे कि लोग अपनी जीवन के सारे कार्यों में सुबह से शाम तक सुन्नत को लागू करने के लिए उत्सुक हो जाएंगे, क्योंकि  प्रत्येक उन्नत पर कुछ पैसे कमाएंगे. लेकिन क्या यह पैसे उस समय आपको कुछ लाभ दे सकेंगे जब आप क़ब्र में उतारे जाएंगे और आप पर मिटटी डाले जाएंगे?

 

"بَلْ تُؤْثِرُونَ الْحَيَاةَ الدُّنْيَا وَالْآخِرَةُ خَيْرٌ وَأَبْقَى "   [الأعلى:16-17]  .

"नहीं, बल्कि तुम तो सांसारिक जीवन को प्राथमिकता देते हो, हालांकि आखिरत अधिक उत्तम और शेष रहनेवाली है." [अल-आला:16-17].


इस अध्ययन में उल्लेखित सुन्नतों का मतलब ऐसे तरीक़े हैं जिनके करनेवाले को पुण्य मिलता है, लेकिन छोड़ने वाले को गुनाह नहीं होता है, और जो दिन और रात में बार बार आते रहते हैं, और हम में से प्रत्येक आदमी उस पर अमल कर सकता है.

मुझे इस अध्धयन के द्वारा पता चला कि प्रत्येक आदमी  यदि दैनिक सुन्नत पर ध्यान दे तो जीवन के सारे कार्यों से संबंधित कम से कम एक हज़ार सुन्नत को लागू कर सकता है, और इस पुस्तिका का मक़सद यही है कि इन दैनिक हज़ार से अधिक सुन्नतों को लागू करने का आसान से आसान तरीक़ा बयान कर दिया जाए.

 

 यदि एक मुस्लिम इन दैनिक और रात-दिन की हज़ार सुन्नतों को लागू करने का प्रयास करे तो एक महीना में तीस हजार सुन्नत हो जाएगी, इसलिए यदि आदमी इन सुन्नतों को नहीं जानता है, या जानता है लेकिन उसपर अमल नहीं करता है तो फिर सोचिए कि उसने कितने पुण्यों और दर्जों को गंवां दिया, निसंदेह ऐसा आदमी सही मायनों में वंचित है.

 सुन्नत पर अम्ल करने के बहुत सारे लाभ हैं: जिन मेंसे कुछ इस तरह  हैं: 
१ - परमेश्वर के प्रेम का दर्जा पाना यहाँ तक कि परमेश्वर खुद अपने मोमिन भक्त को चाहने लगे.
२ – फ़र्ज़ इबादतों में हुई कमियों का भुगतान.
३ – सुन्नत के खिलाफ कामों से सुरक्षा प्राप्त होना.
४ – सुन्नत पर अमल करना दरअसल अल्लाह की निशानियों का सम्मान करना है.

हे इस्लाम धर्म की जनता! अपने पैगंबर-उन पर इश्वर की कृपा और सलाम हो- की सुन्नतों के विषय में परमेश्वर से डरो! परमेश्वर से डरो! उन्हें अपनी जीवन की वास्तविकता में जिवित करो! तुम नहीं करोगे तो फिर कौन करेगा? यही तो हज़रत पैगंबर-उन पर इश्वर की कृपा और सलाम हो- से सच्चे और पक्के प्रेम का प्रमाण है, यही तो हज़रत पैगंबर-उन पर इश्वर की कृपा और सलाम हो- के सच्चे अनुसरण की निशानी है.




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