पैगंबर हज़रत मुहम्मद के समर्थन की वेबसाइट - सुबह में पढ़ी जाने वाली सुन्नतें



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Knowing Allah
  
  
---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? ---उस पर व्यभिचार का आरोप लगाया गया जबकि वह बेगुनाह है, और उसके पास अपनी बेगुनाही का कोई सबूत व प्रमाण नहीं है। तो वह क्या करे? ---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? ---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? --- नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का वुज़ू नींद से नहीं टूटता है। ---उस पर व्यभिचार का आरोप लगाया गया जबकि वह बेगुनाह है, और उसके पास अपनी बेगुनाही का कोई सबूत व प्रमाण नहीं है। तो वह क्या करे? ---वादा-ख़िलाफ़ी सख़्ती से मना ---दुश्मन की लाशें उसके हवाले करना ---दुश्मन की लाशों पर गु़स्सा न निकाला जाए ---दुश्मन की लाशों पर गु़स्सा न निकाला जाए

   

सुबह में पढ़ी जाने वाली सुन्नतें:

1 -सुबह में"आयतल-कुर्सी" यानी (अल्लाहु ला इलाहा इल्ला हुवल- हय्युल-क़य्यूम) पढ़ना सुन्नत है l
उसका फल वही है जो शुभ हदीस में उल्लेखित है:" जिसने सुबह होते समय इसे पढ़ा तो वह शाम होने तक के लिए भूत-प्रेत से मुक्त रहेगा, और जिसने शाम होते समय इसे पढ़ा तो वह सुबह होने तक के लिए भूत-प्रेत से मुक्त रहेगा l"  इसे नसाई ने उल्लेख किया है, और अल्बानी ने इसे विश्वसनीय बताया है l
2 –"अल-मुअव्वज़ात" पढ़ना यानी : सूरह" क़ुल हुवल्लाहु अहद" और क़ुल अऊज़ु बिरब्बिल- फलक़ " और " क़ुल अऊज़ु बिरब्बिन-नास" पढ़ना l"  इसे अबू- दाऊद और तिरमिज़ी ने उल्लेख किया है l

इसका फल यह है कि जो इन्हें तीन बार सुबह होते और शाम होते पढ़ेगा तो यह उसके लिए सब चीज़ के लिए काफी है lजैसा कि इसी शुभ हदीस में आया है l 
3 – और यह दुआ पढ़ना भी सुन्नत है:

" أصبحنا وأصبح الملك لله والحمد لله ، لا إله إلا الله وحده لا شريك له ، له الملك وله الحمد وهو على كل شيء قدير رب أسألك خير ما في هذا اليوم وخير ما بعده ، وأعوذ بك من شر ما في هذا اليوم وشر ما بعده ، رب أعوذ بك من الكسل وسوء الكبر ، رب أعوذ بك من عذاب النار وعذاب القبر"

 " अस्बह्ना व अस्बहल-मुल्कु लिल्लाहि वल हम्दुलिल्ला, ला इलाहा इल्लल्लाहु वह्दहु ला शरीक लहु, लहुल-मुल्कु व लहुल-हमदु व हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर, रब्बि अस्अलुका खैरा माफ़ी हाज़ल-यौम व खैरा मा बअदहु, व अऊज़ु बिका मिन शर्रि मा फी हाज़ल-यौम, व शर्रि मा बअदहु, रब्बि अऊज़ु बिका मिनल-कसल, व सूइल-किबर, रब्बि अऊज़ु बिका मिन अज़ाबिन-नारि व अज़ाबिल-क़ब्र"

(हम सुबह किए और राज और प्रशंसा ने अल्लह के लिए सुबह किया, अल्लाहको छोड़ कर कोईपूजे जाने के योग्य नहींहै, अकेला है उसका कोई साझी नहीं हे, उसी का राज है और उसी केलिए सारी प्रशंसा है और वही सब चीज़ पर शक्तिशाली है, हे मेरे पालनहार! मैं तुझ से मांगता हूँ जो इस दिन में भलाई है , और जो उसके बाद भलाई है, और मैं तेरी शरण में आता हूँ उस बुराई से जो इस दिन में है जो बुराई उसके बाद है lहे मेरे पालनहार! मैं सुस्ती और बुढापे की कठनाई से तेरी शरण में आता हूँ  हे मेरे पालनहार! और मैं तेरी शरण में आता हूँ नर्क की पीड़ा और क़ब्र की पीड़ा से l) इसे इमाम मुस्लिम ने उल्लेख किया है l 

शाम को भी यही दुआ पढ़ना चाहिए लेकिन जहाँ "असबहना" "हम सुबह किए" है उसके बदले "अम्सैना" हम शाम किए" बोलना चाहिए, इसी तरह जहां"रब्बि अस्अलुका खैरा माफ़ी हाज़ल-यौम" (हे मेरे पालनहार! मैं तुझ से मांगता हूँ जो इस दिन में भलाई है) है उसके बदले "रब्बि अस्अलुका खैरा माफ़ी हाज़िहिल-लैलति" (हे मेरे पालनहार! मैं तुझ से मांगता हूँ जो  इस रात में भलाई है) कहेl       
4 –इसी तरह इन्हीं सुन्नत दुआओं में यह दुआ भी शामिल है:

اللهم بك أصبحنا وبك أمسينا ، وبك نحيا وبك نموت وإليك النشور""

 

"अल्लाहुम्मा बिका अस्बहना व बिका अम्सैना, व बिका नहया व बिका नमूतु व इलैकन-नुशूर" (हे अल्लाह! तुझी के द्वारा हम सुबह किए और तुझी के द्वारा शाम किए, तुझी के द्वारा जीते हैं और तुझी के द्वारा मरते हैं, और तेरी ही ओर लौटना है l) इसे इमाम तिरमिज़ी ने उल्लेख किया है l

शाम को भी यही दुआ पढ़े गा लेकिन, लेकिन उसके शब्द इस तरह होंगे "अल्लाहुम्मा बिका अम्सैना व बिका अस्बहना व बिका नहया व बिका नमूतु व इलैकल मसीर" (हे अल्लाह! हम तुझी के द्वारा शाम किए और तुझी के द्वारा हम सुबह किए, तुझी के द्वारा जीते हैं और तुझी के द्वारा मरते हैं, और तेरी ही ओर वापिस आना है" l     

5 –इसी तरह यह दुआ भी पढ़ना सुन्नत है:

 

"اللهم أنت ربي لا إله إلا أنت خلقتني وأنا عبدك ، وأنا على عهدك ووعدك ما استطعت أعوذ بك من شر ما صنعت أبوء لك بنعمتك على وأبوء بذنبي فاغفر لي فأنه لا يغفر الذنوب إلا أنت"

अल्लाहुम्मा अन्ता रब्बि ला इलाहा इल्ला अन्ता खलक़तानी व अना अब्दुका, व अना अला अहदिका व वअदिका मसतातअतु अऊज़ु बिका मिन शाररि-मा सनअतु अबूउ बि निअमतिका अलैया व अबूउ बि ज़न्बी फग़फ़िर ली फइन्नहु ला यग़फ़िरुज़-ज़ुनूबा इल्ला अन्ता l

(हे अल्लाह तू मेरा पालनहार है तूने मुझे बनाया है, और मैं तेरा दास हूँ और जहाँ तक मुझ से बन पड़े मैं तेरे वचन और वादे पर हूँ, मैं तेरी शरण में आता हूँ अपने करतूत की बुराई से,  और जो मुझ पर तेरा कृपाहै उसे मैं मानता हूँ तो तू मुझे क्षमा कर दे, क्योंकि तेरे सिवाय पापों को  कोई माफ नहीं करता है l) इसे बुखारी ने उल्लेख किया l

इसका फल यह है कि जो इस पर विश्वास करके शाम होते समय इसे पढ़ेते  है और यदि उस रात में मर जाए तो स्वर्ग में प्रवेश कर जाएगा, और यही फल सुबह होते समय भी पढ़ने का है lजैसा कि खुद इस

शुभ हदीस में उल्लेखित है l

6  - इसी तरह यह दुआ चार बार पढ़ना भी सुन्नत है:   

"اللهم إني أصبحت أًشهدك وأشهد حملة عرشك ، وملائكتك وجميع خلقك أنك أنت الله لا إله إلا أنت وحدك لا شريك لك وأن محمداً عبدك ورسولك"

"अल्लाहुम्मा इन्नी अस्बह्तु उशहिदुका व उशहिदु हमलता अरशिका, व मलाइकतका व जमीआ खलक़िका अन्नका अन्ता वह्दाका ला शरीका लका व अन्ना मुहम्मदन अब्दुका व रासूलुका"  

(हे अल्लाह!मैंने सुबह की तुझे गवाह बनाता हूँ, और तेरे "अर्श" को उठाने वाले फरिश्तों और तेरी सारी रचना को गवाह बनाता हूँ कि तू अल्लाह है, तुझे छोड़ कर और कोई पूजनीय नहीं है, तू अकेला है, तेरा कोई साझी नहीं है, और यह कि मुहम्मद तेरे दास और दूत हैं lइसे अबू-दाऊद ने और नसाई ने "अमलुल-यौमि वाल्लैला" (रात और दिन में किए जाने वाले काम) नामक पुस्तक में उल्लेख किया l

और इसका फल यह है कि जो भी इसे सुबह और शाम को चार बार पढ़ेगा तो अल्लाह उसे नर्क से मुक्त कर देगा l

·        लेकिन शाम की दुआ में "अल्लाहुम्मा इन्नी अस्बह्तु"( हे अल्लाह मैंने सुबह की) की जगह पर"अल्लाहुम्मा इन्नी अम्सैतु" (हे अल्लाह मैंने शाम की) पढ़े:

 
  (اللهم ما أصبح بي من نعمة أو بأحد من خلقك فمنك وحدك لا شريك لك فلك الحمد و لك الشكر)

"अल्लाहुम्मा मा अस्बहा बी मिन निअमतिन औ बि अहादिन मिन खलक़िका फमिनका वहदका ला शरीका लका फलकल-हमदु वश्शुकरु"

( हे अल्लाह ! जो भी कोई मेहरबानी मुझ पर अथवा तेरी रचनों में से किसी प्राणी पर सुबह तक रही तो वह तुझी से है तू अकेला है, तेरा कोई साझी नहीं है, तेरे ही लिए प्रशंसा है और तेरे ही लिए धन्यवाद है l  इसे अबू-दाऊद ने और नसाई ने "अमलुल-यौमि वल्लैला" (रात और दिन में किए जाने वाले काम) नामक पुस्तक में उल्लेख किया l
इसका फल यह है कि जो भी इसे सुबह होते समय पढ़ेगा, तो उसने उस दिन का शुक्रिया निभा दिया, और जो शाम होते समय इसे पढ़ेगा तो उसने उस रात का शुक्रिया अदा कर दिया lजैसा कि इसी शुभ हदीस में उल्लेखित है l

८- और तीन बार यह दुआ पढ़ना भी सुन्नत है:  

 (اللهم عافني في بدني ، اللهم عافني في سمعي ، اللهم عافني في بصري ، لا إله إلا أنت ، اللهم إني أعوذ بك من الكفر ، والفقر وأعوذ بك من عذاب القبر لا إله إلا أنت)


"अल्लाहुम्मा आफिनी फी बदनी, अल्लाहुम्मा आफिनी फी सम्ई अल्लाहुम्मा आफिनी फी बसरी, ला इलाहा इल्ला अन्ता, अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिनल-कुफरि वल-फक़रि व अऊज़ु बिका मिन अज़ाबिल-क़ब्रि ला इलाहा इल्ला अन्ता"  
(हे अल्लाह!मेरे शरीर में स्वास्थ्य दे , हे अल्लाह!मेरी कान में स्वास्थ्य दे,  हे अल्लाह!मेरी आंख में स्वास्थ्य दे,  तुझे छोड़कर और कोई पूजनीय नहीं है,  हे अल्लाह! मैं आप की शरण में आता हूँ अविश्वास से और गरीबी से, और तेरी शरण में आता हूँ क़ब्र की पीड़ा से, तुझे छोड़कर और कोई पूजनीय नहीं है l  इसे अबू-दाऊद और अहमद  ने उल्लेख किया है l

9 –इसी तरह सात बार यह दुआ पढ़ना चाहिए:

 

(حسبيالله لا إله إلا هو عليه توكلت وهو رب العرش العظيم

"हस्बियल्लाहु ला इलाहा इल्ला हुवा अलैहि तवक्कलतु, व हुवा रब्बुल-अर्शिल-अज़ीम"

(अल्लाह मुझे काफ़ी है उसके सिवाय कोई पूजनीय नहीं है, उसी पर मैंने भरोसा किया, और वही बड़े "अर्श" का मालिक है lइसे इब्ने-सुन्नी ने हज़रत पैगंबर -उन पर इश्वर की कृपाऔर सलाम हो-के माध्यम से उल्लेख किया है, और अबू-दावूद ने "सहाबी"के माध्यम से उल्लेख किया है l  उसका फल यह है कि जिसने इसे सुबह और शाम होते समय सात बार पढ़ा तो अल्लाह उसे इस दुनिया और आखिरत के चिन्तनों से मुक्त कर देगा lजैसा कि खुद इसी शुभ हदीस में उल्लेखित है l 
10 –और यह दुआ पढ़ना भी सुन्नत है:

 

 "اللهم إني أسألك العفو والعافية في الدنيا والآخرة ، اللهم إني أسألك العفو والعافية في ديني ودنياي وأهلي ومالي ، اللهم استر عوراتي ،وآمن روعاتي ، اللهم احفظني من بين يدي ومن خلفي وعن يميني وعن شمالي ومن فوقي ، وأعوذ بعظمتك أن أًغتال من تحتي"

"अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुकल-अफ़वा वल-आफियता फिद्दुन्या वल-आखिरह्, अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुकल-अफ़वा वल-आफियता फी दीनी व दुन्याय, व अहली व माली, अल्लाहुम्मुस्तुर अवराती व आमिन रवआती, अल्लाहुम्मह्फज़नी मिन बैनि यदैय्या व मिन खल्फी व अन यमीनी व अन शिमाली व मिन फवक़ी व अऊज़ु बि अज़मतिका अन उग़ताला मिन तहती"  (हे अल्लाह!मैं तुझ से दुनिया और आखिरत में क्षमा और स्वास्थ्य मांगता हूँ, हे अल्लाह!मैं तुझ से दुनिया और आखिरत में मेरे परिवार और धन में क्षमा और स्वास्थ्य मांगता हूँ, हे अल्लाह! तू मेरी कमियों पर पर्दा रख और मेरे डर को शांति में बदल दे, हे अल्लाह! तू मुझे सुरक्षा दे मेरे सामने से और मेरे पीछे से और मेरे दाहिने से और मेरे बाएं से और मेरे ऊपर से और मैं तेरी शरण में आता हूँ कि नीचे से धोखे से मारा जाऊं lइसे अबू- दाऊद और इब्ने-माजा ने उल्लेख किया

है l

11 –इसी तरह यह दुआ पढ़ना भी सुन्नत है :

"اللهم عالم الغيب والشهادة فاطر السماوات والأرض ، ربَّ كل شيء ومليكه ، أشهد أن لا إله إلا أنت ، أعوذ بك من شر نفسي ومن شر الشيطان وشركه ، وأن أقترف على نفسي سوءاً أو أجره إلى مسلم"

 

"अल्लाहुम्मा आलिमल-ग़ैबि वश्शहादति फातिरस्-समावाति वल-अरज़ि, रब्बा कुल्लि शैइन व मलीकहु, अश्हदु अल्ला इलाहा इल्ला अन्ता, अऊज़ु बिका मिन शर्रि नफ्सी व मिन शर्रिश्शैतानि व शिरकिही व अक़तरिफा अला नफ्सी सूअन औ अजुर्रहू इला मुस्लिम"

(हे अल्लाह! देखी और अनदेखी को जानने वला! आकाशों और पृथ्वी का निर्माता!हर चीज़ का पालनहार और मालिक! मैं गवाही देता हूँ कि तुझको छोड़कर कोई पूजनीय नहीं है, मैं तेरी शरण में आता हूँअपनी आत्मा की बुराई और शैतान की बुराई और उसकी मूर्तिपूजा से, और अपनी आत्मा पर कोई बुराई करने अथवा किसी मुसलमान पर बुराई डालने से तेरी शरण में आता हूँ lइसे इमाम तिरमिज़ी और अबू- दाऊद ने उल्लेख किया है l

12 –यह दुआ तीन बार पढ़ना सुन्नत है:

        

 "بسم الله الذي لا يضر مع اسمه شيء في الأرض ولا في السماء وهو السمـيع العليم"

"बिसमिल्लाहिल-लज़ी ला यज़ुर्रु मअसमिहि शैउन फिल-अर्ज़ि व ला फिस्समाइ व हुवससमीउल-अलीम"

(अल्लाह के नाम से शुरू जिसके नाम के साथ कोई चीज़ न पृथ्वी पर न ही आकाश में कुछ नुक़सान पहुंचा सकती है और वही सुनता जानता है l इसे अबू-दाऊद, तिरमिज़ी और इब्न-माजा और इमाम अहमद ने उल्लेख किया है lइसका फल यह है कि जो भी इसे सुबह को तीन बार और शाम को भी तीन बार पढ़ेगा तो उसे कोई भी चीज़ चोट नहीं पहुंचा सकेगी lजैसा कि खुद इस शुभ हदीस में उल्लेखित है l
13 – इसी तरह सुन्नत दुआ में यह भी शामिल है कि इस दुआ को तीन बार पढ़े :

 رضيت بالله رباً وبالإسلام ديناً وبمحمد – صلى الله عليه وسلم- نبيا" "

 

"रज़ीतु बिल्लाहि रब्बा, व बिलइस्लामि दीना, व बिमुहम्मादिन - सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम - रसूला "( मैं संतुष्ट हूँ अल्लाह के पालनहार होने से, और इस्लाम के धर्म होने से और मुहम्मद-उन पर इश्वर की कृपाऔर सलाम हो-के दूत होने से l)इसे अबू-दाऊद , तिरमिज़ी, इब्ने-माजा  औरनसाई और अहमद ने उल्लेख किया है lइसका फल यह है कि जो भी इसे सुबह और शाम के समय तीन बार पढ़ेगा तो अल्लाह के सामने उसका अधिकार होगा कि क़ियामत के दिन उसको प्रसन्न कर दे lजैसा कि खुद इसी शुभ हदीसमें उल्लेखित है l   

14 –इसी तरह यह दुआ पढ़ना भी सुन्नत है:

 

 ""يا حي يا قيوم برحمتك أستغيث أصلح لي شأني كله ولا تكلني إلى نفسي طرفة عين

"या हय्यु या क़य्यूमु बि रहमतिका अस्ताग़ीसु, असलिह ली शअनी कुल्लहू वला तकिलनी इला नफ्सी तरफता ऐन"  (हे जिवित! हे स्वंय ही बरक़राररहने वाला, तेरी दया का सहारा मांगता हूँ, मेरे सारे काम को ठीक करदे और तू मुझे एक पलक झिपने भर केलिए भी मेरे स्वंय के हवाले मत कर l) इसे हाकिम ने उल्लेख किया है और इसे विश्वसनीय बताया और इमाम ज़हबी ने इस में उनका समर्थन किया है l
15 –और यह दुआ पढ़ना भी सुन्नत में शामिल है जिसके शब्द इस तरह हैं:  

   (أصبحنا على فطرة الإسلام وكلمة الإخلاص ودين نبينا محمد وملة أبينا إبراهيم حنيفا مسلما وما كان من المشركين )                                                                     

"अस्बहना अला फितरतिल इस्लामि व कलिमातिल-इख्लासि व दीनि नबिय्यिना मुहम्मद, व मिल्लति अबीना इबराहीमा हानीफन मुस्लिमन व मा काना मिनल- मुशरिकीन"

(हम इस्लाम के स्वभाव, पवित्रता के शब्द और हमारे पैगंबर मुहम्मद के धर्म और हमारे पिता इबराहीम पंथ पर सुबह किए, जो मूर्तिपूजा से अलग-थलग रहकर मुसलमान थे, और मूर्तिपूजकों में से नहीं थे lइसे इमाम अहमद ने उल्लेख किया l

16 –और यह शब्द १०० बार पढ़े:      

    "" سبحان الله وبحمده

"सुब्हानल्लाहि व बिहम्दिही" (प्रशंसा के साथ पवित्रता हो अल्लाह के लिए) इसे ईमान मुस्लिम ने उल्लेख किया है l

इसका फल यह कि जो भी इसे सुबह-शाम सौ १०० बार पढ़ेगा तो क़ियामत के दिन वह उन सब में सब से बेहतर होगा जिनके पास कुछ (पुण्य का काम) होगा सिवाय उसके जिसने उसी की तरह अथवा उससे कुछ बढ़ कर पढ़ा होगा lइस के इलावा उसका फल यह भी है कि उसके सारे पापों को मिटा दिया जाएगा भले ही समुद्र के झाग के बराबर हों l 
17 – और सुबह के समय सौ १०० बार यह दुआ पढ़े:  

 لا إله إلا الله وحده لا شريك له ، له الملك وله الحمد وهو على كل شيء قدير"

 

"ला इलाहा इल्लल्लाहु वह्दहु ला शरीक लहु, लहुल-मुल्कु व लहुल-हमदु व हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर"

(अल्लाहको छोड़ कर कोईपूजे जाने के योग्य नहींहै, अकेला है उसका कोई साझी नहीं हे, उसी è




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