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  2. (133) कोई भी व्यक्ति किसी भी अजनबी औरत के साथ उसके महरम (वह करीबी व्यक्ति जिससे उसका विवाह जायज़ न हो।) के बगैर हरगिज तन्हाई इख्तियार न करे।

(133) कोई भी व्यक्ति किसी भी अजनबी औरत के साथ उसके महरम (वह करीबी व्यक्ति जिससे उसका विवाह जायज़ न हो।) के बगैर हरगिज तन्हाई इख्तियार न करे।

109 2020/09/06
(133) कोई भी व्यक्ति किसी भी अजनबी औरत के साथ उसके महरम (वह करीबी व्यक्ति जिससे उसका विवाह जायज़ न हो।) के बगैर हरगिज तन्हाई इख्तियार न करे।

عَنْ ابْنَ عَبَّاسٍ – رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ – عَنْ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ

"لَا يَخْلُوَنَّ رَجُلٌ بِامْرَأَةٍ إِلَّا وَمَعَهَا ذُو مَحْرَمٍ، وَلَا تُسَافِرْ الْمَرْأَةُ إِلَّا مَعَ ذِي مَحْرَمٍ، فَقَامَ رَجُلٌ فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ! إِنَّ امْرَأَتِي خَرَجَتْ حَاجَّةً وَإِنِّي اكْتُتِبْتُ فِي غَزْوَةِ كَذَا وَكَذَا. قَالَ:"انْطَلِقْ فَحُجَّ مَعَ امْرَأَتِكَ".

तर्जुमा: ह़ज़रत इब्ने अब्बास रद़ियल्लाहु अ़न्हु बयान करते हैं कि नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया

:"कोई भी व्यक्ति किसी भी अजनबी औरत के साथ उसके महरम (वह करीबी व्यक्ति जिससे उसका विवाह जायज़ न हो।) के बगैर हरगिज तन्हाई इख्तियार न करे। और न ही कोई औरत अपने महरम के बगैर यात्रा करे।" इसी दौरान एक व्यक्ति खड़ा हुआ और बोला:" ए अल्लाह के रसूल! मेरी पत्नी ह़ज के लिए रवाना हो चुकी है जबकि मेरा फुलाने फुलाने युद्ध में नाम लिखा जा चुका है।" तो नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: "जाओ और अपनी पत्नी के साथ जाकर ह़ज करो।"

अजनबी या अनजान महिला के साथ तन्हाई इख्तियार करना शक, बुराई, विश्वासघात और फितने का कारण है। और यह उन लोगों के लिए बहुत बड़ा गुनाह है जो इसके आदी हो चुके हैं या इसमें लापरवाही बरतते हैं या इस मामले या इसके परिणाम को हल्का समझते हैं।

महरम व्यक्ति के बगैर महिला का इतनी दूर यात्रा करना कि जिसमें उसे नुकसान पहुंचने का खतरा हो जान को जोखिम में डालना है। तथा बिना महरम के बिना यात्रा करना मर्यादा, अदब और रीति-रिवाज के भी खिलाफ है जिसका ख्याल रखना ज़रूरी है।

एक बुद्धिमान और गैरतमंद व्यक्ति कभी भी अपनी पत्नी को अकेले यात्रा नहीं करने देता है भले ही वह यात्रा नेकी के लिए क्यों ना हो। बल्कि या तो वह खुद उसके साथ जाता है या फिर उसके किसी महरम व्यक्ति को उसके साथ भेजता है।

इस वसियत के अंदर महिला से अकेले यात्रा करने से या किसी अजनबी या अनजान के साथ तनहाई इख्तियार करने से महिला को भी और बहेसियत उसके जिम्मेदार और उसके हाकिम या शासक होने के मर्द को भी सख्त चेतावनी दी गई है। मतलब यह है कि केवल महरम की मौजूदगी में ही अजनबी व्यक्ति को किसी महिला से मिलना चाहिए। ऐसे ही महिला को भी उसके महरम की मौजूदगी ही में इसकी इजाजत दी जाए। यह सिर्फ इसलिए नहीं ताकि उस अजनबी के हमला करने की सूरत में वह महरम व्यक्ति अपनी करीबी महिला का बचाव कर सके। बल्कि इसलिए भी है ताकि वह महिला शकों व संदेहों और नादानों की अफवाहों से सुरक्षित रह सके। क्योंकि इज्जत और आबरू शुद्ध दूध की तरह है कि जिसे थोड़ी सी चीज भी गंदा कर देती है और फिर वह दोबारा कभी ऐसा नहीं हो सकता जैसे के पहले था।

जिस यात्रा में महिलाओं के साथ महरम का होना जरूरी है दूरी और दिन और रात से निर्धारित नहीं किया जाएगा। बल्कि वह उस दूरी या अवधि से निर्धारित होगा जिसमें अगर उसका कोई महरम उसके साथ न हो तो उसे नुकसान पहुंच सकता है।

अगर औरत कहीं यात्रा करना चाहे भले ही दूर ही सही और रास्ता सुरक्षित और शांतिपूर्ण हो और उसके साथ  शांतिपूर्ण साहचर्य (संगठन या संगत) हो तो इस संगत से महरम की भरपाई हो जाएगी। ईमाम मालिक (उन पर अल्लाह की कृपा हो।) के नजदीक शांतिपूर्ण संगत की तादाद दौ पुरुष और तीन महिलाएं और ईमाम शाफई़ के यहाँ चार महिलाएं हैं।

इस मामले में हमें ज़्यादा सख्ती नहीं बरतनी चाहिए। बल्कि जरूरी है कि हम उन स्थितियों को देखें जिनमें महिला यात्रा करना चाहती है। महिला की ताकत और क्षमता को भी देखना चाहिए कि वह अपना बचाव कर सकती है या नहीं, या अपने आप को महफूज रख सकती है या नहीं, उसे रास्ते और सभ्यता (संस्कृति) का अनुभव है या नहीं। तथा उस आबादी को भी देखना चाहिए जहाँ वह महिला यात्रा करके जा रही है कि वह कितनी और कैसी है। क्योंकि इन सब चीज़ों को देखते हुए हम इस्लाम की रवादारी और आसानी का ख्याल करते हुए आसानी के साथ सही हुक्म लगा सकते हैं।

पैगंबर हज़रत मुहम्मद के समर्थन की वेबसाइटIt's a beautiful day