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(146) लोगों को उनके स्थानों (दर्जों) में रखो।

12 2020/09/22
(146) लोगों को उनके स्थानों (दर्जों) में रखो।

عَنْ مَيْمُونِ بْنِ أَبِي شَبِيبٍ أَنَّ عَائِشَةَ – رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا –

مَرَّ بِهَا سَائِلٌ، فَأَعْطَتْهُ كِسْرَةً، وَمَرَّ بِهَا رَجُلٌ عَلَيْهِ ثِيَابٌ وَهَيْئَةٌ فَأَقْعَدَتْهُ فَأَكَلَ، فَقِيلَ لَهَا فِي ذَلِكَ، فَقَالَتْ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: "أَنْزِلُوا النَّاسَ مَنَازِلَهُمْ".

तर्जुमा: ह़ज़रत मैमून बिन अबी शबीब रद़ियल्लाहु अ़न्हु बयान करते हैं कि ह़ज़रत आ़एशा रद़ियल्लाहु अ़न्हा के पास से एक मांगने वाला (भिखारी) गुजरा तो आपने उसे रोटी (वगैरह) का टुकड़ा दिया। जबकि एक और दूसरा व्यक्ति गुजरा जो की अच्छी सूरत और अच्छे कपड़ो में था। तो ह़ज़रत आ़एशा ने उसे बिठाकर खाना खिलाया। बाद में ह़ज़रत आ़एशा से इस बारे में पूछा गया (कि आपने उन दोनों के साथ अलग अलग व्यवहार क्यों किया?) तो ह़ज़रत आ़एशा ने जवाब दिया कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने फरमाया है:"लोगों को उनके स्थानों (दर्जों) में रखो।"

मुसलमान फितरती तौर पर बुद्धिमान और दिमागदार होता है। हर चीज को उसकी जगह पर रखता है, हर काम उसके योग्य को देता है, हर हकदार का हक पहचानता है और अपनी हिकमत (परख) से इस तरह काम करता है कि जिस में हमेशा नरमी व अच्छाई साफ दिखाई देती है। लिहाजा आप देखेंगे कि वह अपने सारे कामों में रवादार होता है। लोगों के साथ व्यवहार करने में बड़ा नरम और दयालु होता है। उनके साथ  इनकिसारी (खाकसारी, विनम्रता, विनयशीलता) से पेश आता है। बड़ों का अदब करता है। और छोटों पर दया करता है। लोगों की कद्र पहचानते हुए उनके साथ उसी हिसाब से व्यवहार करता है। और किसी की गरीबी व मेहताजी या उसके खराब ढंग या छोटी कॉम की वजह से उसको ह़कीर नहीं समझता है।

लोगों की कद्र (दर्जा) पहचानने और बेहतर तरीके से हर व्यक्ति को उसका हक देने के बारे में यह वसियत एक महान नियम की हैसियत रखती है।

अच्छे सुलूक और बेहतरीन व्यवहार करने में नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम आजाद और गुलाम, फकीर और मालदार और कमजोर और ताकतवर के दरमियान कोई अंतर नहीं करते थे। बल्कि अपनी बैठक और बातचीत में हर एक को बराबर का दर्जा देते थे। अपने मानने वालों में से हर एक छोटे-बड़े पर दया फरमाते थे। यहाँ तक कि ऐसा लगता था आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम भी उनमें से एक हों।

तथा आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम बड़े सरदारों व बड़े लीडरों को उनके मुनासिब उपनाम (लक़ब) दिते, जैसा कि ह़ज़रत अबू बक्र को "सिद्दीक़", ह़ज़रत उ़मर को "फारूक़", ह़ज़रत उ़समान को "ज़ुन्नूरैन", ह़ज़रत अ़ली को "कर्रार", ह़ज़रत अबू उ़बैदह को "अमीन अल-उम्मह" और खालिद बिन वलीद को "सैफुल्लाह" का लक़ब दिया।

नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम हर व्यक्ति की उसके मुनासिब ऐसी तारीफ करते जिसका वह योग्य होता। यही कारण है कि हर समाज और उम्र के महान लोग नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम से मोहब्बत करते थे। लिहाज़ा आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ही बिना इख्तिलाफ सब लोगों के सरदार हैं और सबसे बड़े हैं।

हमारे लिए जरूरी है कि हम पूरे तौर से इस ह़दीस़ पाक का पालन करें। लिहाजा जिन्हें अल्लाह ने बुलंद किया है जैसे नेक काम करने वाले उ़लमा ए किराम, औलिया और अल्लाह के नेक बंदे, उन्हें हम भी अपनी नजरों में बड़ा जानें, उन्हें अपनी बैठकों में नज़दीक बिठाएं, उनसे बात करते समय और उनकी तरफ देखते समय उनका सम्मान करें, जहाँ तक और जितना हो सके उनके साथ अच्छा व्यवहार करें, जितना हो सके उतना उनके नजदीक हों, उनकी गैरमौजूदगी में उनका वचाब करें, जब भी हम उन्हें याद करें तो उनके लिए भलाई की दुआ़एं करें, जिससे वह मिलते-जुलते हैं हम भी उससे मिलना-जुलना रखें और जिससे वह मोहब्बत करते हैं अल्लाह से सवाब की उम्मीद पर हम भी उससे मोहब्बत करें। और अच्छे और बुरों के साथ व्यवहार करने में नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम के नक्शे कदम पर चलें। लिहाज़ा जो इनकिसारी (खाकसारी, विनम्रता, विनयशीलता) के लायक उसके साथ खाकसारी से व्यवहार करें। है और जो खाकसारी के लायक न हो उसके साथ हरगिज़ खाकसारी न करें। ताकि यह हमारे अपमान व हमारी जिल्लत का कारण न हो।

पैगंबर हज़रत मुहम्मद के समर्थन की वेबसाइटIt's a beautiful day