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(159) क़ैदी को छुड़ाओ।

119 2020/10/03
(159) क़ैदी को छुड़ाओ।

عَنْ أَبِي مُوسَى عبد الله بن قيس الأشعري رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ:

قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: "فُكُّوا الْعَانِيَ - يَعْنِي الْأَسِيرَ - وَأَطْعِمُوا الْجَائِعَ، وَعُودُوا الْمَرِيضَ".

तर्जुमा: ह़ज़रत अबू मूसा अ़शअ़री रद़ियल्लाहु अ़न्हु बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया:"क़ैदी को छुड़ाओ। भुखे को खाना खिलाओ और बीमार को देखने जाओ।"

इस्लाम मोहब्बत और भाईचारे वाला और नेकी व परहेज़गारी पर मदद करने वाला धर्म है। इसकी छांव में किसी पर कोई अत्याचार नहीं होता है और न ही उसके इंसाफ व न्याय से कोई महरूम रहता है। यह एक ऐसा धर्म है जो उन इंसानी नियमों का बचाव करता है जो हर इंसान को इस बात की तरफ बुलाते  हैं कि वह अपने इंसानी भाई का सम्मान करे, उसकी भावनाओं और क्षमताओं की कद्र करे और उसकी स्थितियों का ख्याल रखे।

यह एक ऐसा धर्म है जो अच्छे अखलाक और महान विशेषताओं की तरफ बुलाता है और गरीबों को खाना खिलाने, मुसीबत में फंसे लोगों की मुसीबतें दूर करने, बीमारों और उन जैसे दुख व परेशानी का शिकार लोगों का ख्याल रखने पर उभारता है।

यह वसियत उन सैकड़ों वसियतों में से एक है जो दुश्मन के साथ भी इस्लाम धर्म की रवादारी को बयान करती हैं। क्योंकि यह ऐसा धर्म है जो अपने दुश्मन के साथ भी दुश्मनी से काम नहीं लेता है। बल्कि अपने मानने वालों को केवल दुश्मन के अत्याचार से सुरक्षित रखता है और अपना बचाव करने कि उन्हें इजाजत देता है। और जब भी कोई रास्ता दिखाई देता है तो उस दुश्मन को अपनी तरफ खींच लेता है। वह दुश्मन अगर इस्लाम ले आए तो उसके पिछले सारे गुनाहों को मिटा देता है। और अगर वह मुसलमानों के साथ नेक नियति दिखाए और उन्हें किसी तरह की तकलीफ और परेशानी पहुंचाने की कोशिश न करे तो इस्लाम धर्म उसका सम्मान करता है और उसके साथ अच्छा व्यवहार करता है।

इस वसियत में नबी करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम हर मुसलमान कैदियों को कैद से छुड़ाने, भूखों को खाना खिलाने और बीमारों को ऐसी बीमारी में देखने जाने का आदेश दे रहे हैं कि जिस बीमारी में देखना मुनासिब हो। ताकि वह उसकी खुशी का कारण हो। उसके दिल को तसल्ली दे। उसकी तकलीफ कम करने की कोशिश करे। उसके सही होने की उम्मीद दिलाए और सवाब की नियत से सब्र और बर्दाश्त करने पर उभारे।

ह़ज़रत उ़मर रद़ियल्लाहु अ़न्हु ने बैत अल-माल यानी मुसलमानों के खज़ाने में बहुत ज्यादा माल होने की वजह से मुसलमान कैदियों को रिहा कराने की जिम्मेदारी बैतूलमाल पर सौंप दी थी। लेकिन अगर मुसलमानों का बैतूलमाल न हो तो यह जिम्मेदारी मालदार मुसलमानों के जिम्मे है। लिहाज़ा अगर उनमें से किसी ने भी यह जिम्मेदारी अदा नहीं की तो सब के सब बड़े गुनहगार होंगे और अपने धर्म में इतनी बड़ी कोताही करने वाले होंगे कि उसी समय उनकी बख्शिश हो सकती है कि अल्लाह की बारगाह में सच्ची तौबा करें और अल्लाह की खुशी और अपनी बख्शिश के लिए सच्चे दिल से अपना बहुत सारा धन खर्च करें। बस यही दुनिया और आखिरत में अल्लाह के आजाब से उनके छुटकारे का एक रास्ता है। मुसलमान कै़दी को रिहा कराना पहले उस इलाके वालों की जिम्मेदारी है जिसकी खातिर वह जंग कर रहा था। लेकिन अगर उस इलाके वाले इसमें कोताही करें तो अब उसके बराबर वाले इलाकों वालों के जिम्मेदार है कि वे उस कै़दी को छुड़ाएं। क्योंकि मुसलमान आपस में एक दूसरे के मददगार हैं।

मुस्लिम और गैर-मुस्लिम कैदियों के दरमियान बदला करना भी जायज़ व दुरुस्त है। लिहाज़ा स्थितियों, तौर तरीकों और उनके और हमारे दरमियान समझोते के हिसाब से हम उनके कै़दी उन्हें दें और अपने क़ैदी उनसे लें। राय और मशवरे के बाद चाहे एक मुसलमान कै़दी को एक गैर मुस्लिम क़ैदी के बदले रखें या अगर जरूरत पड़े तो चाहे दो गैर मुस्लिम क़ैदियों के बदले एक मुसलमान क़ैदी को रखें। यानी हर हालत में उसके मुनासिब सूरत अपनाई जाए।

याद रखें कि गैर मुस्लिम कैदियों के साथ बेहतर व्यवहार किया जाए। उनके साथ इस्लामी रवादारी को अपनाया जाए। उन्हें अल्लाह की पवित्र किताब पढ़कर सुनाई जाए और उसके आदेश बताएं जाएं कि हो सकता है वे गैर मुस्लिम भी अपनी फितरत को आवाज दें और अपने घमंड से तौबा करके अल्लाह पर ईमान ले आएं और हमारे धर्म इस्लाम में दाखिल हो जाएं।

जब हम सह़ाबा ए किराम रद़ियल्लाहु अ़न्हुम की जिंदगियों को पढ़ते हैं तो हमें पता चलता है कि वे कैदियों के साथ कितना बेहतर और अच्छा व्यवहार करते थे कि जिस पर इस्लाम धर्म गर्व करता है जो कि क्षमता व ताकत होते हुए भी माफ कर देता है और जब भी दुश्मन का अपनी तरफ किसी तरह का कोई खिचाओ देखता है तो बेहतरीन तरीके से उसे माफी का परवाना दे देता है।

पैगंबर हज़रत मुहम्मद के समर्थन की वेबसाइटIt's a beautiful day