1. फोटो एल्बम
  2. (163) जिसे नमाज़ में कोई चीज़ (हवा) निकलने का ख्याल (शक) होता हो तो वह जब तक आवाज़ न सुने या बदबू न पाए तब तक (नमाज़ से) न फिरे या न मुड़े।"

(163) जिसे नमाज़ में कोई चीज़ (हवा) निकलने का ख्याल (शक) होता हो तो वह जब तक आवाज़ न सुने या बदबू न पाए तब तक (नमाज़ से) न फिरे या न मुड़े।"

79 2020/10/04
(163) जिसे नमाज़ में कोई चीज़ (हवा) निकलने का ख्याल (शक) होता हो तो वह जब तक आवाज़ न सुने या बदबू न पाए तब तक (नमाज़ से) न फिरे या न मुड़े।

وَعَنْ عَبَّادِ بْنِ تَمِيمٍ عَنْ عَمِّهِ:

عبد الله بن زيد بن عاصم الأنصاري أَنَّهُ شَكَا إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ الرَّجُلُ الَّذِي يُخَيَّلُ إِلَيْهِ أَنَّهُ يَجِدُ الشَّيْءَ فِي الصَّلَاةِ، فَقَالَ: "لَا يَنْفَتِلْ، أَوْ لَا يَنْصَرِفْ، حَتَّى يَسْمَعَ صَوْتًا أَوْ يَجِدَ رِيحًا".

तर्जुमा: ह़ज़रत अ़ब्बाद बिन तमीम अपने चचा अ़ब्दुल्लह बिन ज़ैद बिन आ़सिम अंसारी से बयान करते हैं कि उन्होंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम से शिकायत की कि एक व्यक्ति हैं जिसे नमाज़ में कोई चीज़ (हवा) निकलने का ख्याल (शक) होता है। तो नबी सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: "जब तक आवाज़ न सुने या बदबू न पाए तब तक (नमाज़ से) न फिरे या न मुड़े।"

यह हदीस शरीफ इस्लामी सिद्धांतों में से एक सिद्धांत की हैसियत रखती है जिससे उ़लमा ए किराम ने कुछ नियम निकाले हैं जो एक दूसरे का समर्थन करते हैं। अतः वे कहते हैं : "शक की आधार पर यकीन खत्म नहीं होगा।" और कहते हैं: "यकीन केवल यकीन से ही खत्म होगा।" और कहते हैं: "असल को लेना, शक को छोड़ना और हर चीज को उसकी असल पर बाकी रखना जरूरी है।" तथा फरमाते हैं: तमाम चीजों को उनकी असल पर बाकी रखा जाएगा जब तक कि उसके खिलाफ का यकीन न हो जाए और शक से उस पर कोई असर नहीं पड़ेगा।" इन तमाम शब्दों या वाक्यों का लगभग एक ही मतलब है।

यह उन बुनियादी ह़दीस़ों में से एक है जिनमें उस मानसिक बीमारी का इलाज है जिसका आज के समय में बहुत ज्यादा खतरा बढ़ गया है और जो लोगों में आम हो चुकी है खासकर उन नेक बंदों में यह ज्यादा होती है जिन्होंने अल्लाह का रास्ता अपना लिया हो और उसकी आज्ञाकारी और फरमाबरदारी और रज़ामंदी हासिल करने के लिए उससे मदद चाहते हों। क्योंकि ऐसे लोगों को सीधे रास्ते से रोकने, भटकाने और उनके धर्म से संबंध हर चीज में शक और वसवसे डालकर उनकी इबादतें खराब करने की शैतान भरपूर कोशिश करता है।

इसीलिए नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने अ़कीदों, इबादतों और मामलों में शकों और उन वसवसों पर अमल करने से मना किया है जो कि शैतान लोगों के दिलों में डालता है ताकि उन्हें उनके धर्म से संबंध शक और हर्ज में डालकर उन्हें उनकी धार्मिक और सांसारिक जिम्मेदारियाँ पूरी करने से रोके और ताकि उनके हौसले पस्त करे ताकि वे उन बुलंद मकसदों और उन तमाम चीजों के हासिल करने की कोशिश न करें जिनमें उनकी दुनिया और आखिरत की भलाई और कामयाबी है। इसीलिए नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने फ़रमाया:"जो जीज तुम्हें शक में डाल दे उसे छोड़कर ऐसी चीज अपनाओ जो तुम्हें शक में न डाले। यकीनन सच से दिल को इत्मीनान मिलता है और झूठ से बेचैनी मिलती है।"

यानी जिसमें आपको शक हो उसे छोड़ दो और अपने हर मामले में सिर्फ यकीन और विश्वास पर भरोसा करो। क्योंकि यकीन सच है और सच से इत्मीनान और सुकून मिलता है लेकिन झूठ इसके बिल्कुल उल्टा है। नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम शैतान को भगाने और उसके वसवसों को दूर करने के लिए सुबह-शाम बहुत ज़्यादा कुरान की आखिरी दो सूरतें यानी सूरह अल-फलक़ और सूरह अल-नास पढ़ते थे हालांकि आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम मासूम थे। तो जरा सोचें कि हमें उन्हें कितना ज्यादा पढ़ना चाहिए।

तथा नबी ए करीम सल्लल्लाहु सल्लम इस ह़दीस़ शरीफ से मोमिनो के दिलों में यकीन जमाना चाहते हैं ताकि उन पर कोई शैतानी वसवसा असर न करे। क्योंकि आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने उन्हें वसियत की है कि वे नमाज़ और अपने सारे धार्मिक व सांसारिक मामलों में सिर्फ यक़ीन व विश्वास ही पर अमल करें और शकों या वसवसों पर ध्यान न दें।

यह वसियत उ़लमा ए किराम के लिए उन नियमों की असल की हैसियत रखती है जिनके तहत धर्म और दुनिया से संबंध बहुत से नए और पुराने मसले आते हैं और आएंगे।

पैगंबर हज़रत मुहम्मद के समर्थन की वेबसाइटIt's a beautiful day