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(166) क्या तुम अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम) से बैअ़त (निष्ठा की शपथ) नही करोगे?

74 2020/10/04

عَنْ أَبِي عبد الرحمن عُوْفُ بْنُ مَالِكٍ الْأَشْجَعِيُّ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: كُنَّا جُلُوساً عِنْد رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ تِسْعَةً أَوْ ثَمَانِيَةً أَوْ سَبْعَةً، فَقَالَ: "أَلَا تُبَايِعُونَ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ؟" وَكُنَّا حَدِيثَ عَهْدٍ بِبَيْعَةٍ، فَقُلْنَا: قَدْ بَايَعْنَاكَ يَا رَسُولَ اللَّهِ، ثُمَّ قَالَ: "أَلَا تُبَايِعُونَ رَسُولَ اللَّهِ؟" فَقُلْنَا: قَدْ بَايَعْنَاكَ يَا رَسُولَ اللَّهِ، ثُمَّ قَالَ: "أَلَا تُبَايِعُونَ رَسُولَ اللَّهِ؟" قَالَ فَبَسَطْنَا أَيْدِيَنَا وَقُلْنَا: قَدْ بَايَعْنَاكَ يَا رَسُولَ اللَّهِ، فَعَلَامَ نُبَايِعُكَ؟ قَالَ: "أَنْ تَعْبُدُوا اللَّهَ وَلَا تُشْرِكُوا بِهِ شَيْئًا، وَالصَّلَوَاتِ الْخَمْسِ، وَتُطِيعُوا"، وَأَسَرَّ كَلِمَةً خَفِيَّةً: وَلَا تَسْأَلُوا النَّاسَ شَيْئًا"، فَلَقَدْ رَأَيْتُ بَعْضَ أُولَئِكَ النَّفَرِ يَسْقُطُ سَوْطُ أَحَدِهِمْ فَمَا يَسْأَلُ أَحَدًا يُنَاوِلُهُ إِيَّاهُ".

तर्जुमा: हजरत अबू अब्दुर्रह़मान औ़फ बिन मालिक अशजई़ रद़ियल्लाहु अ़न्हु बयान करते हैं कि हम सात या आठ या नो लोग अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम के पास बैठे हुए थे। तो आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने फरमाया:" क्या तुम अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम) से बैअ़त (निष्ठा की शपथ) नही करोगे?" हालांकि अभी हम ताजा-ताजा बैअ़त कर चुके थे। हम ने कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल! हम बैअ़त कर चुके हैं। लेकिन फिर आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने फरमाया: "क्या तुम अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम) से बैअ़त नही करोगे?" हम ने कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल! हम बैअ़त कर चुके हैं। लेकिन फिर आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने फरमाया: "क्या तुम अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम) से बैअ़त नही करोगे?" ह़ज़रत औ़फ बिन मालिक कहते हैं कि तो हमने अपने हाथ बढ़ा दिए और कहा: ऐ अल्लाह के रसूल! हम आप से पहले ही बैअ़त कर चुके हैं तो अब किस बात पर बैअ़त करें? आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: "इस बात पर कि केवल अल्लाह ही की इबादत करोगे, उसके साथ किसी को शरीक नहीं करोगे, पांचों नमाज़े पढ़ोगे और (अल्लाह और रसूल) की आज्ञा का पालन करोगे।: और एक बात आहिस्ता से कही कि: "और लोगों से कुछ नहीं मांगोगे।" इस ह़दीस़ को बयान करने वाले बयान करते हैं कि फिर उन लोगों का हाल यह था कि अगर किसी की कोई छड़ी भी गिर जाती तो वह किसी दूसरे से यह तक नहीं कहता था कि यह उठा कर मुझे दे दो।

नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम हमेशा अपने सह़ाबा को मागने से बचने, लोगों के पास जो है उसकी इच्छा न करने, जो अपने पास हो उसी पर संतुष्ट रहने, आमतौर पर दुनिया से बेरगबती रखने, अल्लाह और उसकी दया पर अच्छी तरह भरोसा रखने, तकदीर व भाग्य से खुश रहने, इबादत और आज्ञाकारी के द्वारा उसका इकरार करने और खाकसारी के साथ दुआ के जरिए अल्लाह की तरफ लो लगाने की शिक्षा देते रहते थे।

जो सम्मान के साथ जीवन बसर करना चाहते हैं उनके लिए नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम इस ह़दीस़ शरीफ में सहीह रास्ता बता रहे हैं तथा अल्लाह तक पहुंचाने वाले सहीह रास्तों का भी पता बता रहे हैं। क्योंकि आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम इस ह़दीस़ शरीफ में अपने सह़ाबा से ऐसे कामों पर बैअ़त (निष्ठा की शपथ या वचन) ले रहे हैं जिनमें उनकी दुनिया व आखिरत की भलाई व कामयाबी है। अतः सह़ाबा ए किराम रद़ियल्लाहु अ़न्हुम नबी सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम से बैअ़त के नियम और शर्तों के बारे में मालूम करते हैं तो आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम उन्हें बेहतर तौर पर जवाब देते हैं जो कि हदीस पाक में बयान हुआ।

नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम अपने फरमान: "क्या तुम अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम) से बैअ़त नहीं करोगे?" के जरिए अपने सह़ाबा ए किराम रद़ियल्लाहु अ़न्हुम को बड़े ही प्यारे अंदाज में उस चीज की तरफ बुला रहे हैं जिस पर आप उनसे बैअ़त करना चाहते हैं। लिहाज़ा यहाँ पर सवाल पूरे होसले के साथ बैअ़त करने पर उभारने के लिए है।

बैअ़त का मतलब है निष्ठा की शपथ लेना। एक दुसरे के हाथ में हाथ देकर वचन देना या वफादारी और बात मानने का वादा करना।

सच्चा मुसलमान वह है जो अल्लाह से सम्मान हासिल करे। उसके फैसले व भाग्य से खुश, उसके दिए पर संतुष्ट रहते हुए और उसकी नेमतों का शुक्र अदा करते हुए उसकी आज्ञाकारी की छांव में जिंदगी बसर करे, मुश्किलों में नेमतों पर नजर करके अपने अल्लाह का शुक्र अदा करे और खुशी व गम हर हालत में उसकी तारीफ करे और कभी उसके ज़िक्र से गाफिल न हो। क्योंकि अल्लाह का ज़िक्र ऐसी चीज है कि अगर वह न हो तो दिल को सुकून न मिले। और दिल का सुकून ही सबसे बड़ी नेमत है जो सिर्फ ईमानदार सच्चे मोमिनों को ही मिलती है।

प्यारे भाइयों! इस वसियत के जरिए हमने आपको सम्मान और बुलंद अखलाक की वादियों की सैर कराई ताकि आप भी अपने अल्लाह अल्लाह और रसूल से इस पर वादा करें कि पूरी ईमानदारी के साथ अल्लाह की इबादत करोगे, पांचो समयों की नमाज़ों को जमाअ़त के साथ उनके समयों पर अदा करोगे, जो भलाई का आदेश देगा या बुराई से रोकेगा उसकी बात मानोगे, अल्लाह के दिए हुए पर संतुष्ट रहोगे और जहाँ तक हो सके लोगों के पास जो है उससे बेपरवाह रहोगे।

पैगंबर हज़रत मुहम्मद के समर्थन की वेबसाइटIt's a beautiful day