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(179) तुम लोग ज़रूर भलाई का हुक्म (आदेश) देते रहना और बुराई से रोकते रहना।

110 2020/10/04
(179) तुम लोग ज़रूर भलाई का हुक्म (आदेश) देते रहना और बुराई से रोकते रहना।

عَنْ حُذَيْفَةَ بْنِ الْيَمَانِ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ عَنْ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ:"وَالَّذِي نَفْسِي بِيَدِهِ لَتَأْمُرُنَّ بِالْمَعْرُوفِ وَلَتَنْهَوُنَّ عَنْ الْمُنْكَرِ أَوْ لَيُوشِكَنَّ اللَّهُ أَنْ يَبْعَثَ عَلَيْكُمْ عِقَابًا مِنْهُ ثُمَّ تَدْعُونَهُ فَلَا يُسْتَجَابُ لَكُمْ".

तर्जुमा: "ह़ज़रत ह़ुज़ैफह बिन यमान रद़ियल्लाहु अ़न्हु बयान करते हैं कि नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: "तुम लोग ज़रूर भलाई का आदेश देते रहना और बुराई से रोकते रहना।, नहीं तो कोई पल जाएगा कि अल्लाह तुम पर अपना अ़ज़ाब भेज दे फिर तुम अल्लाह से दुआ़ करो और तुम्हारी दुआ़ कबूल न हो।"

भलाई का आदेश देना और बुराई से रोकना उन महत्वपूर्ण सिद्धांतों में से एक है जिन पर इस्लाम धर्म स्थापित है जिसे अल्लाह ने अपने बंदों के लिए उनके पहले ही दिन से पसंद फरमाया है। यह एक ऐसा काम है जिसके बिना कोई भी धर्म बाकी नहीं रह सकता।

इसकी स्पष्टता यह है कि धर्म बुनियाद चार निम्नलिखित सिद्धांतों पर है: संपूर्ण तौह़ीद (अल्लाह को एक मानना) पर आधारित सह़ीह़ अ़क़ीदा (आस्था), नेक काम जो सह़ीह़ अ़क़ीदे का सबूत होता है, नेक व अच्छे अखलाक़ जो नेक कामों का कारण होते हैं और अच्छा व्यवहार जिससे नेक अखलाक़ का पता चलता है।

भलाई एक ऐसा शब्द है जो इन चारों सिद्धांतों और उनके तहत आने वाले सिद्धांत और शाखाओं सबको शामिल है। (वह काम जिसका अल्लाह ने आदेश दिया है उसका करना भलाई और छोड़ना बुराई है और जिससे मना किया है और रोका है उसका छोड़ना भलाई और करना बुराई है।) लिहाज़ा अब भलाई का आदेश देने और बुराई से रोकने का मतलब होगा: समझदारी, अच्छी नसीहत व बातचीत और तसल्ली देने वाली दलीलों के द्वारा लोगों को उसके करने की तरफ बुलाना जिसके करने का अल्लाह ने आदेश दिया है और उससे बचने को कहना जिससे अल्लाह ने मना किया है। इसी की तरफ इशारा है सूरह यूसुफ में आने वाले अल्लाह के इस निम्नलिखित फरमान से:

قُلْ هَٰذِهِ سَبِيلِي أَدْعُو إِلَى اللَّهِ ۚ عَلَىٰ بَصِيرَةٍ أَنَا وَمَنِ اتَّبَعَنِي ۖ وَسُبْحَانَ اللَّهِ وَمَا أَنَا مِنَ الْمُشْرِكِينَ

(सुरह:यूसुफ, आयत संख्या:108)

तर्जुमा: तुम कहो कि यह मेरा रास्ता है। मैं और मेरी पैरवी करने वाले पूरी बसीरत (समझदारी) के साथ इसकी तरफ बुलाते हैं। और अल्लाह को पाकी है। और मैं शिर्क (साझा) करने वालों में से नहीं।

तो अल्लाह का रास्ता: उसकी आज्ञाएं और निषेध हैं और उनकी तरफ बुलाने का मतलब भलाई का आदेश देना और बुराई से रोकना है। और बसीरत (समझदारी) तसल्ली देने वाली दलील है जो रोग की जांच पड़ताल करके उसकी सही दवा बताती है। और तसबीह़ या पाकी (पवित्रता) का मतलब: संपूर्ण तौह़ीद है जिस पर अल्लाह की तरफ बुलाना आधारित होना चाहिए।

अल्लाह ने इस उम्मत के लिए सारी खूबियां इकट्ठा कर दी हैं। इसके धर्म को पूरा कर दिया है। इस पर अपनी नेमतों को मुकम्मल कर दिया है और उसे सबसे बेहतर क़ोम या उम्मत बनाया है जो लोगों के लिए बनाई गई है। क्योंकि यह उम्मत दूसरों को भलाई का आदेश देती है और खुद भी करती है। और बुराई से रोकती है और खुद भी रूकती है। और नेक काम और सच्ची तौबा के द्वारा हमेशा अपने ईमान को नया करती रहती है।

इस ह़दीस़ शरीफ में यह आदेश (भलाई का आदेश देना और बुराई से रोकना।) हर उस आदमी के लिए है जो भलाई का आदेश देने और बुराई से रोकने की ताकत रखता हो। और आज्ञा का पालन ताकत के हिसाब से होता है। लिहाज़ा कोई यह न कहे कि यह आदेश तो मालदारों और उ़लमाओं (पढ़े-लिखे और ज्ञानियों) के लिए हैं अनपढ़ों के लिए नहीं है। क्योंकि यह आदेश सबके लिए हैं। इसके किसी एक के लिए होने पर कोई सबूत नहीं है। क्योंकि अनपढ़ आदमी अपनी फितरत से ही जानता है कि क्या चीज जायज है और क्या न जायज़। और क्या चीज जरूरी है और क्या जरूरी नहीं है। और यह भी जानता है कि कौन सा काम अच्छा है और कौन सा बुरा। इसकी भी उसे जानकारी होती है कि क्या समाज और आदत के हिसाब से सही है और क्या गलत। और इसका भी अच्छी तरह से ज्ञान होता है कि कौन सी चीज बुरी है कि उसे नहीं करना चाहिए और कौन सी चीज समाज के हिसाब से करनी चाहिए। यह सब बातें वह फितरत द्वारा ही जानता है। लिहाज़ा जब वह अच्छाई पहचाने तो उसके करने का आदेश दे और जब बुराई देखे तो उससे रोके।

और जो आदमी भलाई का आदेश देने और बुराई से रोकने की ताकत न रखे तो वह अपने दिल में ही बुराई को बुरा जाने या किसी ऐसी जगह हिजरत करके चला जाए जहाँ नेक और अच्छे लोग रहते हों।

पैगंबर हज़रत मुहम्मद के समर्थन की वेबसाइटIt's a beautiful day