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(181) अपने बच्चों को नमाज़ का हुक्म दो।

89 2020/10/04
(181) अपने बच्चों को नमाज़ का हुक्म दो।

عَنْ عَمْرِو بْنِ شُعَيْبٍ عَنْ أَبِيهِ عَنْ جَدِّهِ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: "مُرُوا أَوْلَادَكُمْ بِالصَّلَاةِ، وَهُمْ أَبْنَاءُ سَبْعِ سِنِينَ، وَاضْرِبُوهُمْ عَلَيْهَا، وَهُمْ أَبْنَاءُ عَشْرٍ، وَفَرِّقُوا بَيْنَهُمْ فِي الْمَضَاجِعِ".

तर्जुमा: ह़ज़रत अ़म्र बिन शुऐ़ब अपने पिता और वह उनके पिता अपने पिता से बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: "अपने बच्चों को नमाज़ का हुक्म दो जब वे सात साल के हो जाएं। और जब वे दस साल के हो जाएं तो उस (के लिए न जाने) पर उन्हें मारो। और उन्हें अलग अलग सुलाओ।"

हमारे बच्चे हमारे जिगर के टुकड़े, आंखों की ठंडक, कयामत के दिन अल्लाह के सामने हमारे शिफारशी, हमारी मौत के बाद हमारे लिए नेक कामों का जरिया और जिंदगी में जिसकी हमने शुरुआत की है उसको पूरा करने के लिए हमारे जानशीन हैं। लिहाज़ा हमारे ऊपर जरूरी है कि हम उनकी शारीरिक, आत्मिक और मानसिक परवरिश का खास ध्यान रखें। बुलंद व अच्छे अखलाक और अच्छे व्यवहार पर उनकी परवरिश करें और उनके दिलों में अल्लाह और उसके रसूल की मोहब्बत बिठाएं। नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने बहुत ही सी ह़दीस़ों में हमें इसका आदेश दिया है।

नमाज़ इस्लाम धर्म का सतून और उसका स्तंभ और बंदे और उसके अल्लाह के बीच मजबूत बंधन है। तथा उसके अनगिनत फज़ीलतें हैं जिन्हें हम जानते हैं या नहीं जानते हैं।

नमाज़ से बच्चा सफाई का ख्याल रखना जानेगा। और वुज़ू करके और अपने शरीर या कपड़े या नमाज़ की जगह पर लगी गंदगी को दूर करके अपनी सेहत व तंदुरुस्ती का ख्याल रखेगा। इसी तरह पढ़ना, तसबीह़ करना और अल्लाह की तारीफ करना, तकबीर कहना और दूसरे बहुत से ज़िक्र और दुआएं आदि सीखेगा। माता-पिता से ज्यादा उसका दिल उसके अल्लाह से लग जाएगा और उसके और उसके अल्लाह के दरमियान का ये बंधन इतना मजबूत और गहरा हो जाएगा कि उसे उससे मोहब्बत हो जाएगी, उसके ज़िक्र उसे सुकून मिलेगा, फिर उसकी आत्मा को नमाज़ से इतना लगाव हो जाएगा कि नमाज़ उसकी भावनाओं पर काबू पा जाएगी, उसके खाली समयों में उसके लिए सुकून का जरिया होगी। और फिर उस बंदे को उस में वह मजा और आनंद मिलेगा जो उसके अलावा फिर किसी चीज में नहीं मिल सकता।

चूंकि सात साल की उम्र से पहले बच्चा आदेशों को नहीं समझ सकता और न उनके फायदों को पहचान सकता है इसीलिए नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया:"अपने बच्चों को नमाज़ का हुक्म दो जब वे सात साल के हो जाएं।" यानी समझदारी और अक्लमंदी और अच्छी तरह नसीहत से उन्हें नमाज़ का आदेश दो और अच्छे अंदाज में उन्हें उस पर उभारो ताकि उसे आसानी से समझ सकें।

 मोह़म्मद सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम अकलमंद शिक्षक, प्रभावशाली डॉक्टर और अल्लाह के नबी और पैगंबर थे कि जिनके पास अल्लाह की तरफ से संदेश आता था। लिहाज़ा जरूरी है कि हम उन तरीकों को पढ़ने का अच्छी तरह ख्याल रखें जिनके द्वारा नबी करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम अपने आदेशों और निषेधों और वसियतों में हमसे संबोधित हुए। ताकि किसी भी शब्द के समझने में हमसे कोई गलती न हो। तथा नबी सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम से उल्लेख ह़दीस़ों में खूब गोर व फिक्र करें और गहरी नजर से काम लें।

तथा इस ह़दीस़ शरीफ में एक और आदेश दिया गया है और वह यह है कि जब बच्चे दस साल के हो जाएं तो उनके सोने के बिस्तर अलग-अलग कर दिए जाएं यानी अगर मुमकिन हो तो हर एक को अलग-अलग सोने के लिए एक खास बिस्तर दिया जाए। लेकिन अगर यह मुमकिन न हो तो उनको उल्टा सुलाया जाए इस तरह की एक का सिर एक तरफ किया जाए और दूसरे का दूसरी यानी पाएंती की तरफ। याद रखें कि नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम सबसे ज्यादा बुद्धिमान और अक्लमंद आदमी हैं। और अपने पास से कुछ नहीं बोलते हैं। (केवल वही बताते हैं जो उनसे अल्लाह फरमाता है।) लिहाज़ा हमारे लिए जरूरी है कि हम नबी सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम के आदेशों और नीषेधों को संजीदगी से लें और उनका पूरी तरह पालन करें। और हाँ इन आदेशों में लड़के और लड़कियाँ दोनों बराबर हैं।

पैगंबर हज़रत मुहम्मद के समर्थन की वेबसाइटIt's a beautiful day