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(182) कोई अपने आप को अपमानित (ज़लील व रुसवा) न करे।

100 2020/10/04
(182) कोई अपने आप को अपमानित (ज़लील व रुसवा) न करे।

عَنْ أَبِي سَعِيدٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: "لَا يَحْقِرْ أَحَدُكُمْ نَفْسَهُ" قَالُوا: يَا رَسُولَ اللَّهِ، كَيْفَ يَحْقِرُ أَحَدُنَا نَفْسَهُ؟ قَالَ يَرَى أَمْرًا لِلَّهِ عَلَيْهِ فِيهِ مَقَالٌ ثُمَّ لَا يَقُولُ فِيهِ فَيَقُولُ اللَّهُ عَزَّ وَجَلَّ لَهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ: مَا مَنَعَكَ أَنْ تَقُولَ فِي كَذَا وَكَذَا؟ فَيَقُولُ: خَشْيَةُ النَّاسِ، فَيَقُولُ: فَإِيَّايَ كُنْتَ أَحَقَّ أَنْ تَخْشَى".

तर्जुमा: ह़ज़रत अबू सई़द खुदरी रद़ियल्लाहु अ़न्हु बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया:" कोई अपने आप को अपमानित (ज़लील व रुसवा) न करे।" सह़ाबा ए किराम ने पूछा: "ऐ अल्लाह के रसूल! कोई अपने आप को किस तरह अपमानित करता है?" नबी सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: "वह ऐसा काम होता देखता है जिसके बारे में अल्लाह की तरफ से उस पर बोलना जरूरी है लेकिन वह उसके बारे में कुछ नहीं बोलता है। (और गलत काम से मना नहीं करता है) तो कयामत के दिन अल्लाह उससे फरमाएगा: "तुझे उस मसले में बोलने से किसने रोका?" वह आदमी कहेगा: "लोगों का डर था।" तो अल्लाह फरमाएगा:"मैं इस बात के ज्यादा योग्य था कि तू मुझसे डरे।"

जब बंदा अल्लाह पर पूरा ईमान रखता है तो वह किसी से नहीं डरता है केवल अपने अल्लाह ही के अधिकार के आगे झुकता है और अपनी ज़ुबान या तलवार से उसके धर्म का समर्थन और उसकी मदद करने से कभी पीछे नहीं हटता है। क्योंकि वह अच्छी तरह जानता है कि अगर सारी कायनात भी उसे कुछ फायदा पहुंचाने के लिए इकट्ठा हो गई तब भी उसे केवल वही फायदा पहुंचा पाएगी जो अल्लाह ने उसके भाग्य में लिख दिया है और इसी तरह अगर उसे कुछ नुकसान पहुंचाना चाहे तो इस से ज्यादा कुछ नुकसान नहीं पहुंचा सकती जो अल्लाह ने उसके लिए मुकद्दर कर दिया है।

नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम सह़ाबा ए किराम रद़ियल्लाहु अ़न्हुम को यह शिक्षा देते रहते थे कि वे जहाँ कहीं भी रहें सत्य के समर्थक और सहायक बन कर रहें और पूरी ताकत से उसकी सुरक्षा करें। आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: "कोई अपने आप को अपमानित न करे।" नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम का यह निषेध कई अर्थों की संभावना रखता है जिसकी वजह से आपके सह़ाबा ए किराम रद़ियल्लाहु अ़न्हुम को इसके सही मतलब के समझने में परेशानी हुई और आपसे इसका सही मतलब पूछा कि ऐ अल्लाह के रसूल! कोई अपने आप को किस तरह अपमानित करता है? लिहाज़ा नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने उनके शक व परेशानी को दूर किया और अपने फरमान: "कोई अपने आप को अपमानित न करे।" का सही मतलब जाहिर करके उनके सवाल का जवाब दिया जो के हदीस शरीफ में जिक्र हुआ। लिहाज़ा यहाँ पर इस मनादी का मतलब साफ हो गया और दूसरे अर्थों की संभावना दूर हो गई जैसे कि खाकसारी (विनम्रता) क्योंकि मुसलमान की यह भी शान है कि वह अपने आप को कमतर समझे यानी किसी से अपने आप को बेहतर न जाने।

इस ह़दीस़ शरीफ से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सत्य बात को उसकी जगह और उसके समय पर बिना किसी मालदार या जालिम बादशाह आदि से डरे मुनासिब अंदाज में जरूर कह देना चाहिए।

सत्य की कड़वाहट मुसलमान के नजदीक शहद से ज्यादा मीठी होती है। क्योंकि उसमें उसे इस कदर दुनिया और आखिरत की भलाई मिलती है जिसे सिर्फ अल्लाह ही जान सकता है जिसकी कुदरत में सारे मामले और उनका सवाब है और  वही भरोसे के लायक है।

ताकत और शक्ति का एक तत्व यह भी है कि मुसलमान हमेशा खुलकर बात करे, बनावटी न रहे, खुले दिल और मशहूर नियमों के साथ लोगों से मिले और सत्य के मामले में कोई ऐसा व्यवहार न करे जिससे उसकी और उसके समर्थकों की शान में कोई कमी आए। बल्कि सत्य की ताकत को उस आस्था की ताकत समझे जिसे वह अपनाए हुए है और जिसके लिए जी रहा है। और कभी भी किसी भी सच्चाई को बयान करने में इस सफाई और बेबनावटी (ईमानदारी) से न हटे। क्योंकि जो आदमी हकीकतों में जीवन बसर करता है या सत्य का जीवन जीता है वह कभी झूठ या गलत का व्यापार नहीं करता है बल्कि उससे हमेशा दूरी बनाए रखता है। और उसकी ईमानदारी का गुण उसके सम्मान के खजाने का मुंह बोलता सुबूत होता है जो खजाना उसे धोखा देने और किसी का उपयोग करने से दूर रखता है और सम्मान के अटल नियमों पर उसकी जिंदगी को बाकी रखता है।

लिहाज़ा हर मुसलमान की जिम्मेदारी है कि वह अपने आपको लोगों के लिए बेमिसाल उदाहरण व आदर्श बनाकर पेश करे। कभी दुनिया के बदले अपना धर्म न बेचे और पिछले नेक लोगों के नक्शे कदम पर चलते हुए ईमानदारी के साथ अपने अल्लाह की मदद से लोगों को अल्लाह की तरफ और नेकी की तरफ बुलाए।

पैगंबर हज़रत मुहम्मद के समर्थन की वेबसाइटIt's a beautiful day