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(189) जिसने सुबह की नमाज़ पढ़ली वह अल्लाह के जिम्मे में आ गया।

14 2020/10/04
(189) जिसने सुबह की नमाज़ पढ़ली वह अल्लाह के जिम्मे में आ गया।

عَنْ جُنْدَبَ بْنَ عَبْدِ اللَّهِ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: "مَنْ صَلَّى صَلَاةَ الصُّبْحِ فَهُوَ فِي ذِمَّةِ اللَّهِ، فَلَا يَطْلُبَنَّكُمْ اللَّهُ مِنْ ذِمَّتِهِ بِشَيْءٍ؛ فَإِنَّهُ مَنْ يَطْلُبْهُ مِنْ ذِمَّتِهِ بِشَيْءٍ، يُدْرِكْهُ ثُمَّ يَكُبَّهُ عَلَى وَجْهِهِ فِي نَارِ جَهَنَّمَ".

तर्जुमा: ह़ज़रत जुन्दब बिन अ़ब्दुल्लह रद़ियल्लाहु अ़न्हु बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: "जिसने सुबह की नमाज़ पढ़ ली वह अल्लाह के ज़िम्मे में आ गया। (दुआ़ है कि) अल्लाह तुम से अपने ज़िम्मे (अधिकार) में से किसी चीज का मुतालबा न करे। क्योंकि जिससे वह अपने ज़िम्मे में से किसी चीज का मुतालबा कर लेगा उसे अपनी पकड़ में ले लेगा, फिर उसे ओंधे मुंह जहन्नुम में डाल देगा।"

पांच दैनिक नमाज़े बंदे और उसके अल्लाह के बीच वचन का नवीनीकरण हैं। तो जब बंदा कोई नमाज़ पढ़ता है तो उसे बड़ा चैन और सुकून मिलता है, उसे वफादारी का एहसास होता है जिससे उसे दिल की गहराइयों से खुशी मिलती है और वह यह महसूस करता है कि इस्लाम लाकर जो मैंने अपने ऊपर जिम्मेदारी ली है और जो अल्लाह मुझसे इस समय में चाहता है वह जिम्मेदारी मैंने पूरी कर दी है। फिर थोड़े से समय के लिए वह अपने दुनिया के कामकाज में लग जाता है फिर जब पुकारने वाला पुकारता है: "ह़य्या अ़लस्सलात (आओ नमाज़ की तरफ), ह़य्या अ़ललफलाह़ (आओ कामयाबी की तरफ)।" तो फिर दोबारा वह अपने गुनाहों का बोझ कम करने के लिए अपने कामकाज को कुछ समय के लिए छोड़ो कर नमाज़ के लिए वापस आ जाता है और फिर अल्लाह के घर में दाखिल होकर पूरी तवज्जो व ध्यान के साथ अपनी जिम्मेदारी अदा करता है। और ऐसे ही वह दिन-रात करता रहता है लिहाज़ा इस तरह से उसके और उसके अल्लाह के बीच मजबूत बंधन रहता है। और जब वह अपने दिल पर गुनाहों का बोझ महसूस करता है तो अपने अल्लाह से कृपा, दया और बखशिश (माफी) मांगता है। लिहाज़ा इस तरह वह अल्लाह का सच्चा बंदा होकर बंदगी के तक़ाज़ो के मुताबिक जीवन बसर करता है यहाँ तक कि वह अपने अल्लाह से जा मिलता है। और यही असली कामयाबी और खुशी है। यही वह प्रकाश व रोशनी है जिसे लेकर मुसलमान लोगों में घूमता है। यही असली सम्मान, सुंदरता और कमाल है।

तो जो पांचों समय की नमाज़ों की पाबंदी करता है और पूरे ध्यान के साथ उन्हें उनके समयों पर पढ़ता है तो अपने आप को ख्वाहिशों के बहकावों और शैतान के वसवसों से महफूज़ कर लेता है और अल्लाह के अधिकार में कोताही करने से अपने आप को बचाए रखता है। फिर वह किसी जिम्मेदारी में कोताही नहीं करता है और न ही किसी तरह की बदकारी करता है। और अगर कोई छोटा गुना उससे हो भी जाए तो नमाज़ के जरिए वह माफ हो जाता है। लिहाज़ा इस तरह वह माफ हुआ रहता है जब तक कि बड़े गुनाहों से बचा रहे।

नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: "जिसने सुबह की नमाज़ पढ़ ली वह अल्लाह के ज़िम्मे में आ गया।" यानी वह उस वचन में आ गया जो उसने उस नमाज़ में अपने आप से किया है। क्योंकि जब वह नमाज़ के लिए पुकारने वाले की पुकार को सुनकर उसके लिए जाएगा जिसके लिए वह बुला रहा है और उसे पूरे तौर पर व अदा करेगा तो गोया कि वह अपने अल्लाह से इस बात का वादा करेगा कि वह अपना पूरा दिन उसकी आज्ञाकारी में गुज़ारेगा। तथा जब अगली ज़ुहर की नमाज़ आएगी तो उसे अपना वादा और वचन याद आ जाएगा और इसी तरह से वह हर नमाज़ में करेगा यहाँ तक कि आने वाला दिन भी वह इसी तरह गुज़ारेगा।

नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम का फ़रमान: "अल्लाह तुम से अपने ज़िम्मे (अधिकार) में से किसी चीज का मुतालबा न करे।" अल्लाह की आज्ञाकारी के वचन और वादे में कोताही करने से निषेध है। यानी तुम बिल्कुल कोताही न करो ताकि अल्लाह तुमसे अपने अधिकार के बारे में न पूंछे वरना तो तुम बर्बाद हो जाओगे। क्योंकि अल्लाह के कुछ ऐसे अधिकार हैं कि जब तक बंदा उनके अदा करने की क्षमता रखता हो उनमें बिल्कुल कोताही नहीं करना चाहिए।

और याद रखें की अच्छी जिंदगी वही जिंदगी है जिसमें मुसलमान अल्लाह के ज़िक्र का आनंद और उसकी आज्ञाकारी की मिठास महसूस करे भले ही वह गरीबी और तंगदस्ती की ज़िन्दगी बसर करे।

याद रखें कि अल्लाह के अ़ज़ाब या सजा़ की कड़वाहट उसे ही महसूस होगी जिसने अपने अल्लाह को भुला दिया हो, उसके वचन को तोड़ दिया हो या उसकी किसी शाखा में कोताही की हो। और अल्लाह का वचन: उसका धर्म है।

पैगंबर हज़रत मुहम्मद के समर्थन की वेबसाइटIt's a beautiful day