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(190) अपने अच्छे नाम रखो।

15 2020/10/04
(190) अपने अच्छे नाम रखो।

عَنْ اَبِي الدَّرْدَاءِ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اﷲِ صلی الله علیه وسلم : "إِنَّکُمْ تُدْعَوْنَ يَوْمَ الْقِيَامَةِ بِأَسْمَائِکُمْ وَأَسْمَاءِ آبَائِکُمْ فَأَحْسِنُوا أَسْمَاءَکُمْ".

तर्जुमा: ह़ज़रत अबू दर्दाअ रद़ियल्लाहु अ़न्हु बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: "तुम्हें क़यामत के दिन तुम्हारे तुम्हारे और तुम्हारे बाप-दादाओं के नामो से बुलाया जाएगा। लिहाज़ा तुम अपने नाम अच्छे रखो।"

नाम ही से इंसान का पता चलता है और उसी से उसकी पहचान होती है।

आदमी के अच्छे नाम में उसके लिए और जो भी उसे सुनता है उसके लिए एक अच्छा शगुन होता है और उसे सुनकर उसे खुशी महसूस होती है जबकि बुरे नाम में इसका उल्टा होता है और उसके इंसान पर बुरे असर पड़ते हैं। क्योंकि जब उस बुरे नाम से बच्चे को पुकारा जाता है तो कभी-कभार वह मानसिक तकलीफ का शिकार हो जाता है और शर्मिंदगी की वजह से लोगों के सामने आने से कतराता है और उनसे छुप कर अकेलापन अपना लेता है जिसकी वजह से फिर वह लोगों से मिलने में घबराहट महसूस करने लगता है और जिंदगी भर इसी अकेलेपन की बीमारी का शिकार रहता है।

उ़लमा ए किराम ने नामों के तीन प्रकार किए हैं: पहले प्रकार के वे नाम जिन्हें रखना मकरुह यानी नापसंदीदा है। दूसरे प्रकार के वे नाम हैं जिन्हें रखना ह़राम है। और तीसरे प्रकार में वह नाम हैं जिन्हें रखना मुस्तह़ब यानि पसंदीदा है। (इनके अलावा एक प्रकार वह है जिसमें वे नाम आते हैं जिन्हें रखना जायज है।)

ऐसे नाम रखना मकरुह यानी नापसंदीदा है कि जिन्हें पुकारा जाए तो उनके न होने की सूरत में "नहीं या ना" जवाब मिलने पर बुरा लगे या अपशुकन महसूस हो। (जैसे कि किसी का नाम यसार (आसानी), नजाह (कामयाब), फलाह़ (कामयाब) आदि रख दिया जाए। फिर पूछा जाए: क्या यसार (आसानी), या फलाह़ (कामयाबी) है? तो जवबा मिले: यसार (आसानी), या फलाह़ (कामयाबी) नहीं है। ऐसे नामों से नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने मना किया है।)

इसी तरह बुरे नाम रखना भी मकरूह यानी नापसंदीदा है जैसे ह़र्ब (जंग), मुर्रह (कड़वा), कल्ब( कुत्ता), कुलैब (छोटा कुत्ता या पिल्ला), आ़सी (ऐन और स्वाद से जिसका अर्थ है: गुनाहगार), आ़सिया (ऐन और स्वाद से जिसका अर्थ है: गुनाहगार लड़की) शैतान, शिहाब (आग का अंगारा) ज़ालिम (अत्याचार करने वाला) ह़िमार (गधा) और इन जैसे दूसरे नाम।

यह बिल्कुल खुली जहालत और गुमराही है कि कोई अपने बच्चे का इसलिए बुरा नाम रखे ताकि उसका बच्चा जिंदा रह सके और उसे किसी की बुरी नजर न लगे। ऐसा ज्यादातर गांवों और देहातों में औरतें करती हैं और ऐसे नामों से बचती हैं जो अच्छे हों ताकि उनके बच्चों को नजर न लगे।

याद रखें कि यह जो जाहिल औरतों में मशहूर है कि अगर बच्चे का बुरा नाम रख दिया जाए तो वह बच्चा जिंदा रहेगा और उसे बुरी नजर न लगेगी यह सरासर गलत और बेबुनियाद बात है।

फिरऔ़नों और ज़ालिम लोगों के नामों पर भी नाम रखना मकरूह व नापसंदीदा हैं जैसे कि फिरऔ़न, क़ारून, हामान और वलीद नाम रखना।

कुछ उ़लमा ए किराम कहते हैं कि फरिश्तों जैसे जिबरईल, मिकाइईल, इसरफील आदि के नाम रखना भी मकरूह व नापसंदीदा है। लेकिन ज्यादातर उ़लमा ए किराम कहते हैं कि फरिश्तों के नाम रखना जायज़ और सही है। इसमें कोई हर्ज नहीं। और यही सही है।

अल्लाह के अच्छे नामों में से किसी नाम के जरिए नाम रखना ह़राम व नाजायज़ है।

इसी तरह अ़ब्द अल-नबी, अ़ब्द अल-रसूल या अ़ब्द अल-हुसैन (यानी अ़ब्दुन्नबी, अ़ब्दुर्रसूल, अ़ब्दुलह़ुसैन) वगैरह जैसे नाम रखना भी ह़राम है जिनमें "अ़ब्द"शब्द की अल्लाह के अलावा किसी और की तरफ निसबत हो। (यह लेखक की अपनी राय है जो बिलकुल दुरुस्त नहीं है। क्योंकि अ़ब्द अल-नबी, अ़ब्द अल-रसूल या अ़ब्द अल-मुस्तफा जैसे नाम रखना जायज और सही है।  इसमें कोई कोई हर्ज नहीं है। क्योंकि "अ़ब्द" शब्द की निसबत अल्लाह के अलावा की तरफ करना भी जायज है। उसकी वजह यह है कि "अ़ब्द" शब्द का माना सिर्फ बंदा ही नहीं आता है कि उसकी अल्लाह के अलावा की तरफ उसकी निस्बत नाजायज हो जाए। बल्कि उसका माना गुलाम, खादिम (नौकर) और आज्ञाकारी भी आता है। लिहाज़ा जब कोई मुसलमान "अ़ब्द" शब्द की निसबत अल्लाह के अलावा किसी और की तरफ करता है तो वह यही दूसरे माना का ऐतबार करके करता है न कि पहले माना का एतवार करके। लिहाज़ा ऐसी सूरत में अ़ब्दुल नबी (पैगंबर का खादिम या आज्ञाकारी) अब्दुल मुस्तफा (मुस्तफा सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम का खादिम या आज्ञाकारी) नाम रखना जायज होगा। यही सही है। और लेखक ने जो नाजायज़ कहा है वह सही नहीं है। लिहाज़ा इसका ख्याल रखें।)

          इसी तरह मलिक अल-मुलूक (बादशाहो का बादशाह) या सुल्तान अल-सलातीन (सुल्तानों का सुल्तान) या शहंशाह (यह फारसी का शब्द है जिसके माना है बादशाहो का बादशाह) नाम रखना भी ह़राम है।

अ़ब्दुल्लाह और अब्दुर रह़मान और इन जैसे नाम रखना मुस्ताहब और बेहतर है। इसी तरह पैगंबरों के नामों पर भी नाम रखना पसंदीदा और प्यारा है। उनमें से सबसे बेहतर नाम हैं: मुह़म्मद, अह़मद, फिर इब्राहीम, इस्माईल, युसूफ, युनूस, शुऐ़ब, सालिह़, मूसा, हारून, ज़करिय्या और यह़या।

बच्चे का नाम रखना अक्सर उ़लमा के नजदीक पिता का अधिकार है न कि माँ का। लिहाज़ा अगर नाम रखने में माता-पिता के बीच इख्तिलाफ हो जाए तो पिता की ही बात मानी जाएगी। क्योंकि बच्चा पिता ही की तरफ मन्सूब होता है और वह उसी से पहचाना जाता है।

पैगंबर हज़रत मुहम्मद के समर्थन की वेबसाइटIt's a beautiful day