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(192) यतीम (अनाथ) के सिर पर हाथ फेरा करो और गरीब को खाना खिलाया करो।

14 2020/10/04
(192) यतीम (अनाथ) के सिर पर हाथ फेरा करो और गरीब को खाना खिलाया करो।

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ أَنَّ رَجُلًا شَكَا إِلَى النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَسْوَةَ قَلْبِهِ فَقَالَ: "امْسَحْ رَأْسَ الْيَتِيمِ، وَأَطْعِمْ الْمِسْكِينَ".

तर्जुमा: ह़ज़रत अबू हुरैरा रद़ियल्लाहु अ़न्हु बयान करते हैं कि एक आदमी ने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम से अपना दिल सख्त (कठोर) होने की शिकायत की। तो नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने (उससे) इरशाद फ़रमाया:" यतीम (अनाथ) के सिर पर हाथ फेरा करो और मिस्कीन (गरीब) को खाना खिलाया करो।"

और एक दूसरी रिवायत में है कि नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: "क्या तुम यह चाहते हो कि तुम्हारा दिल नरम हो जाए और तुम्हारी जरूरत पूरी हो जाए? तो तुम अनाथ पर दया करो, उसके सिर पर हाथ फेरो और उसे अपने खाने में से खाना खिलाओ। तुम्हारा दिल नरम हो जाएगा और तुम्हारी जरूरत पूरी हो जाएगी।"

इंसान के ईमान की निशानी यह है कि जब उसका दिल कठोर यानी सख्त हो जाता है तो वह अपने दिल की कठोरता को महसूस कर लेता है। उसकी वजह यह है कि दिल में जिस कदर ईमान होता है उतना ही वह अल्लाह के नूर (प्रकाश) से रोशन होता है। अल्लाह के ज़िक्र से कोमल होता है और जो नसीहतें है सुनता है उनसे सबक हासिल करता है। और जब ईमान कुछ कमजोर हो जाता है तो वह (नूर) प्रकाश भी उसी हिसाब से कम पड़ता जाता है और उस समय इंसान अपने दिल की कठोरता को महसूस करता है। फिर जो ईमान उसके दिल में बाकी रह जाता है वह उसे उस प्रकाश के कम होने की वजह तलाश करने पर उभरता है कि जिसके कारण दिल कठोर हो गया है। तो उसकी हालत उसे अपने आप को संभालने और सुधारने के बारे में संजीदगी से सोचने की तरफ बुलाती है। लिहाज़ा इस तरह वह अपने पूरे हौसले के साथ अपने आप को सुधारने में लग जाता है यहाँ तक कि उसका ईमान पहले की तरह पूरा हो जाता है। यदि फिर जब वह ऐसी हालत महसूस करता है तो इसी तरह अपने आप को सुधारता है यहाँ तक कि अल्लाह के डर और उसकी कृपा में जीवन बसर करते हुए अपने अल्लाह से जा मिलता है।

          इसी तरह के सह़ाबी नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम के पास आते हैं और आपसे ऐसी चीज के बारे में पूछते हैं जिससे उनके दिल की कठोरता दूर हो जाए। तो नबी सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम उनसे इरशाद फरमाते हैं: "अनाथ पर दया करो, उसके सिर पर हाथ फेरो और उसे अपने खाने में से खाना खिलाओ। तुम्हारा दिल नरम हो जाएगा और तुम्हारी जरूरत पूरी हो जाएगी।" इस ह़दीस़ शरीफ का मतलब तो जाहिर ही है लेकिन इसमें कुछ ऐसी चीजें हैं जिन्हें पहचानने की हमें जरूरत है।

बेशक इस्लाम ने नेक और अच्छे लोगों को इस बात पर उभारा है कि वह अनाथो की देखभाल करें, उनके साथ एहसान और भलाई करें, उन पर दया और नरमी करें, उनकी संपत्ति की रक्षा करें और उन्हें शारीरिक और मानसिक तौर पर तैयार करें यहाँ तक कि वे बड़े होकर नेक बन जाएं।

नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम अनाथ के साथ भलाई करने, उसका सम्मान करने और उसके साथ नरमी करने का बहुत ज्यादा ख्याल रखते थे और अपने साथियों को भी इस पर बहुत ज्यादा उभरते थे। इसलिए नहीं कि आप नबी सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने अनाथ का जीवन बसर किया था। बल्कि इसलिए कि आप नबी सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम यह महसूस करते थे कि अनाथ को इन चीजों की बहुत ज्यादा जरूरत होती है।

अनाथ अगर मिस्कीन (फकीर गरीब) हो तो उसे खाना खिलाने और उसके साथ भलाई करने का अल्लाह के यहाँ बड़ा सवाब है।

अनाथ का जिम्मेदार आदमी अगर फकीर हो तो उसे उस अनाथ की संपत्ति से अपनी जरूरत भर खाना जायज है। अल्लाह फरमाता है:

وَمَن كَانَ فَقِيرًا فَلْيَأْكُلْ بِالْمَعْرُوفِ

(सूरह: अल-निसाअ, आयत संख्या: 6)

तर्जुमा: और जो फकीर (जरूरतमंद) हो वह भलाई के साथ खाए। (यानी मुनासिब तरीके से जरूरत भर खाए।)

तथा उल्लेख है कि एक आदमी नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम के पास आया और कहा: "मैं फकीर हूँ। मेरे पास कुछ नहीं है। हाँ मेरे पास एक अनाथ है जिसकी संपत्ति का मैं जिम्मेदार हूँ।" तो नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: "तुम अपने अनाथ की संपत्ति से खा सकते हो बशर्ते कि न तो फिजूलखर्ची करो और न (उसकी संपत्ति) बर्बाद करो और न (उस अनाथ की संपत्ति से अपने लिए) खजाना इकट्ठा करो।" यानी उसके माल से अपने और अपनी औलाद के लिए जमा न करो। और ऐसा भी न करो कि अपनी संपत्ति तो अपने और अपनी औलाद के लिए इकट्ठा करके रखो और उसकी संपत्ति से खाओ।

इस वसियत की स्पष्टता से जो हमारा मक़सद है वह यह है कि हम यह सीखे की अनाथ पर दया और कृपा किस तरह से की जाए। यह दया, कृपा और मेहरबानी के शब्द उन तमाम चीजों को शामिल हैं जिनमें भलाई, एहसान और कोमलता पाई जाती हो। लिहाज़ा यह इस तरह से होगी की अच्छी तरह से उसकी देखभाल की जाए, उसकी पढ़ाई-लिखाई अच्छे से ख्याल किया जाए और उसकी अच्छी तरह परवरिश करके उसे पूरे हौसले के साथ जीवन के विभिन्न प्रकार के चरणों को तय करने के लिए तैयार किया जाए और दुनिया और दीन में लाभदायक और हानिकारक चीजों की पहचान कराई जाए।

किसी के सिर पर हाथ फेरना उससे मोहब्बत और उस पर दया और मेहरबानी का इजहार है। लेकिन इसमें शर्त यह है कि यह केवल अल्लाह की रजामंदी के लिए होना चाहिए।

अनाथ के साथ सबसे बड़ी मेहरबानी यह है कि आप उसे अनाथपन, उसकी गरीबी और मोहताजी का एहसास न होने दें। लिहाज़ा उसके साथ ऐसा व्यवहार न करें जिससे वह अपने आप को अनाथ महसूस करे कि इससे वह मानसिक दबाव का शिकार हो सकता है और फिर बड़े होकर उसके अखलाक और व्यवहार पर बुरा असर व प्रभाव पड़ सकता है।

पैगंबर हज़रत मुहम्मद के समर्थन की वेबसाइटIt's a beautiful day