अस्र की नमाज़

-अज़ान के शब्दों को दुहराना चाहिए l

-अज़ान और इक़ामत के बीच दुआ करना चाहिए l

अस्र से पहले या बाद में कोई नियमित सुन्नत नमाज़ नहीं है l लेकिन हज़रत पैगंबर -उन पर इश्वर की कृपा और सलाम हो-ने फ़रमाया:

"رحم الله امرءًا صلى قبل العصرأربعًا"

)अल्लाह सर्वशक्तिमान उस व्यक्ति पर दया करे जो अस्र से पहले चार रकअत पढ़ता है l) अब प्रश्न यह है कि हम में कौन ऐसा आदमी है जो अल्लाह के कृपा की इच्छा नहीं रखता है ? उसके बाद नमाज़ खड़ी होने तक शुभ क़ुरआन पढ़ने में लगे रहेंl
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फ़र्ज़ नमाज़ पढ़ने के बाद नमाज़ के खत्म पर पढ़ी जानेवाली दुआएं और ज़िक्र पढ़ें l और यदि अस्र की नमाज़ के बाद मस्जिद में ही उपदेश की बैठक हो तो उसमें बैठना और सबक सुनना बहुत अच्छी बात है l

याद रहे कि शुभ रमज़ान में सबसे अच्छी इबादत क़ुरआन को पढ़ना है l लेकिन यदि आप उसके साथ अन्य प्रकार की इबादत को इकठ्ठा करते जाएँ तो फर और अच्छी बात है l

-उपदेश सुनने के बाद माजिद में ही रह कर शुभ क़ुरआन पढ़ें l इस विषय में हज़रत पैगंबर -उन पर इश्वर की कृपा और सलाम हो-ने फ़रमाया है जैसा कि हज़रत अबू हुरैरा –अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे-से कथित है :

"لا يزال العبد في صلاة ما كان في مصلاه؛ ينتظر الصلاة، والملائكة تقول:اللهم اغفر له، اللهم ارحمه، حتى ينصرف أو يحدث)رواه مسلم(.

(एक व्यक्ति उस समय तक नमाज़ में ही होता है (यानी नमाज़ पढ़ने का पुण्य पाता है l) जब तक वह नमाज़ के इन्तेज़ार में अपनी नमाज़ की जगह पर होता है l और फ़रिश्ते कहते हैं: ऐ अल्लह ! इसे माफ करदे, इस पर दया कर l यहाँ तक वह आदमी वापस हो जाए या बेवुज़ू हो जाए l) [इसे मुस्लिम ने उल्लेख किया है l]