पैगंबर हज़रत मुहम्मद के समर्थन की वेबसाइट - नमाज़ की शाब्दिक सुन्नतें



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---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? ---उस पर व्यभिचार का आरोप लगाया गया जबकि वह बेगुनाह है, और उसके पास अपनी बेगुनाही का कोई सबूत व प्रमाण नहीं है। तो वह क्या करे? ---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? ---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? --- नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का वुज़ू नींद से नहीं टूटता है। ---उस पर व्यभिचार का आरोप लगाया गया जबकि वह बेगुनाह है, और उसके पास अपनी बेगुनाही का कोई सबूत व प्रमाण नहीं है। तो वह क्या करे? ---वादा-ख़िलाफ़ी सख़्ती से मना ---दुश्मन की लाशें उसके हवाले करना ---दुश्मन की लाशों पर गु़स्सा न निकाला जाए ---दुश्मन की लाशों पर गु़स्सा न निकाला जाए

   

नमाज़ की शाब्दिक सुन्नतें:


१ – नमाज़ के आरंभ की दुआ- मतलब तकबीरे तहरीमा के बाद की दुआ और वह इस तरह  है:
(سبحانك اللهم وبحمدك وتبارك اسمك وتعالى جدك ولا إلـه غـيرك)
(सुबहानकल-लाहुम्मा व बिहमदिका व तबराक्स-मुका व तआला जद्दुका व ला इलाहा ग़ैरुका)
 "हे अल्लाह! तुझे पवित्रता हो तेरी प्रशंसा के साथ, तेरा नाम बरकत वाला है और तेरा पद बहुत ऊँचा है, और तुझको छोड़कर और कोई पूजनीय नहीं है." इसे चारों इमामों: नासाई, तिरमिज़ी, अबू-दावूद और इब्ने-माजा ने उल्लेख किया है.


• इस से संबंधित एक दूसरी दुआ भी है, और वह कुछ इस तरह है:
(اللهم باعد بيني وبين خطاياي كما باعدت بين المشرق والمغرب ، اللهم نقني من خطاياي كما ينقى الثوب الأبيض من الدنس ، اللهم اغسلني من خطاياي بالثلج والماء والبرد)


"अल्लाहुम्मा बाइद बैनी व बैना खतायाय कमा बाअदता बैनल-मशरिक़ वल-मग़रिब, अल्लाहुम्मा नक्क़िनी मिन खातायाय कमा युनक्क़स-सौबुल-अबयज़ु मिनद-दनस, अल्लाहुम्मग़-सिलनी मिन खतायाय बिस-सलजि- वल-माइ वल-बरद"  


(हे अल्लाह! मुझे और मेरे पापों के बीच इतनी दूरी करदे जितनी दूरी पूरब और पश्चिम के बीच है, हे अल्लाह! मुझे मेरे पापों से ऐसा सुथरा करदे, जैसे सफेद कपड़ा मैल से साफ़ किया जाता है, हे अल्लाह! मुझे मेरे पापों से धुल दे, बर्फ से और पानी से और ओले से) इसे बुखारी और मुस्लिम ने उल्लेख किया है.

 


याद रहे कि नमाज़ के आरंभ की जो दुआएं यहाँ लिखी गई हैं उनमें से किसी को भी चुनकर पढ़ सकते हैं.
२ – पवित्र कुरान को पढ़ने से पहले अल्लाह की शरण मांगते हुए यह पढ़ना चाहिए:
) أعوذ بالله من الشيطان الرجيم (
(अऊज़ु बिल्लाहि मिनश-शैतानिर-रजीम)
[मैं शैतान शापित से अल्लाह की शरण में आता हूँ]

३ – "बिस्मिल्लाह" पढ़ना भी सुन्नत है: उसके शब्द यह हैं:
(بسم الله الرحمن الرحيم(
"बिस्मिल्लाहिर-रहमानिर-रहीम (अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपाशील, अत्यंत दयावान है).

 

 

४ – सूरह फातिहा के बाद "आमीन" (सवीकार करले) कहना.
५ - सूरह फातिहा पढ़ने के बाद एक और कोई सूरह उसके साथ पढ़ना, और यह नियम फजर की दोनों रकअतों में और शुक्रवार की नमाज़ की दोनों रकअतों में, और मग़रिब की पहली दोनों रकअतों में, और चार रकअत वाली किसी भी नमाज़ की पहली दोनों रकअतों में लागू होगा. इसी तरह तन्हा नमाज़ पढ़ने वाला और सारी नफ्ल नमाजों में भी इसी नियम पर चलना चाहिए. लेकिन किसी इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ने वाला व्यक्ति आहिस्ता वाली नमाज़ में तो सूरह फ़ातिहा पढ़ेगा लेकिन ज़ोर से कुरान पढ़ने की नमाज़ में सूरह फ़ातिहा नहीं पढ़े गा.

 

६ – और यह दुआ पढ़ना भी सुन्नत है:
(ملء السموات وملء الأرض وما بينهما ، وملء ما شئت من شيء بعد أهل الثناء والمجد ، أحق ما قال العبد ،وكلنا لك عبد ، اللهم لا مانع لما أعطيت ولا معطي لما منعت ولا ينفع ذا الجد منك الجد)
(मिलउस-समवाति वल-अर्ज़ि वमा बैनाहुमा, व मिलआ मा शिअता मिन शैए, बअदा अहलिस-सनाइ वल-मजद, अहक्क़ु मा क़ालल-अब्द, व कुल्लुना लका अब्द, अल्लाहुम्मा ला मानिआ लिमा अअतैता वला मुअतिया लिमा मनअता वला यनफ़उ ज़ल-जद्दि मिनकल-जद्द.)


"हे अल्लाह!तेरे लिए प्रशंसा है आकाशों भर और पृथ्वी भर, और जो भी उन दोनों के बीच है, और प्रशंसा करने वाले और सम्मान वाले के बाद जिस चीज़ को भी तू चाहे उस चीज़ के बराबर तेरी प्रशंसा हो, भक्त ने जो कहा है उसका तू ही ज़ियादा अधिकार है, और हम सब तेरे भक्त हैं, हे अल्लाह! जो तू दे उसका कोई रोकने वाला नहीं, और जिसको तू रोक दे उसे कोई देने वाला नहीं, तेरे पास सम्मान वाले का सम्मान कुछ काम नहीं देता." इसे इमाम मुस्लिम ने उल्लेख किया है.
और रुकूअ से उठने के बाद यह पढ़े:
(ربنا ولك الحمد)


"रब्बना व लकल-हमद"
(हे हमारा पालनहार! और तेरे लिए ही सारी प्रशंसा है.)
७ –सजदा और रुकूअ में जो भी "तस्बीह" एक बार से ज़ियादा होगी वह सुन्नत में शामिल है.
८ – और दोनों सजदों के बीच "रब्बिग़-फ़िर ली" (हे मेरा पालनहार! मुझे माफ करदे) यदि एक बार से अधिक पढ़ता है तो वह भी सुन्नत में शामिल होगा.

 

९- आखिरी तशहहुद के बाद यह दुआ पढ़े:
(اللهم إني أعوذ بك من عذاب جهنم ومن عذاب القبر ومن فتنة المحيا والممات ومن فتنة المسيح الدجال)
(अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिन अज़ाबि जहन्नम व मिन अज़ाबिल –क़बरि व मिन फितनतिल-महया वल-ममात, व मिन फितनतिल-मसीहिद-दज्जाल.)
"हे अल्लाह! मैं तेरी पनाह में आता हूँ नर्क की तकलीफ़ से, और क़बर की तकलीफ़ से और जीवन और मृत्यु के परीक्षणों से, और मसीह दज्जाल  के परीक्षण से." इसे बुखारी और मुस्लिम ने उल्लेख किया है.


• और बेहतर यह है कि नमाज़ पढ़ने वाला सजदों में केवल "तस्बीह" पर ही बस न करे बल्कि इसके अलावा जो दुआ करना चाहे करे, क्योंकि हदीस में है:( एक भक्त अपने पालनहार के सब से अधिक उसी समय नज़दीक होता है जब वह सजदे की स्तिथि में होता है, तो उसमें अधिक से अधिक दुआ किया करो) इसे इमाम मुस्लिम ने उल्लेख किया है.
* इस सिलसिले में और भी बहुत सारी दुआएं हैं, जिसे देखना हो वह "हिस्नुल-मुस्लिम" नामक पुस्तक लेखक क़हतानी को देख सकता है.


*जितने भी शाब्दिक सुन्नतें हैं वे प्रत्येक रकअत में पढ़े जाते हैं सिवाय नमाज़ के शुरू की दुआ, और सिवाय उस दुआ के जो तशह्हुद के बाद पढ़ी जाती है. 
* इस तरह केवल शाब्दिक सुन्नतों की संख्या जो र्फ्ज़ नमाज़ में पढ़ी जाती है १३६ सुन्नत हो जाएगी क्योंकि फ़र्ज़ रकअतों की संख्या १७ है और बार बार आने वाली सुन्नतों की संख्या आठ है.

 

 
* और शाब्दिक सुन्नतें की संख्या जो न्फ्ल नमाज़ में पढ़ी जाती है १७५ सुन्नत है, क्योंकि न्फ्ल रकअतों की संख्या २७ है जैसा कि हम ने रात-दिन में पढ़ी जाने वाली सुन्नतों के विषय में उल्लेख किया है. याद रहे कि न्फ्ल नमाज़ की रकअतों की संख्या और भी बढ़ सकती है, विशेष रूप से जब रात की नमाज़ और ज़ुहा की नमाज़ की रकअतों को बढ़ाया जाए, उसी के अनुसार इस सुन्नत के अमल में भी बढ़ावा होगा.


और ऐसी शाब्दिक सुन्नतें जो नमाज़ में केवल एक बार पढ़ी जाती हैं  दोहराई नहीं जाती हैं इस तरह हैं:
१- नमाज़ शुरू करने की दुआ.
२ – और तशह्हुद के बाद की दुआ.
इस तरह फ़र्ज़ नमाज़ में इस सुन्नत की संख्या कुल दस होगी.


* और दिन-रात में पढ़ी जाने वाली सुन्नत नमाजों में इस सुन्नत की संख्या २४ होगी, उल्लेखनीय है कि इस की संख्या और भी बढ़ सकती है, यदि रात की नमाज़ और ज़ुहा की नमाज़ और तहिय्यतुल-मस्जिद या मस्जिद में प्रवेश होने की नमाज़ को भी बढ़ाया जाए, तो उसी के हिसाब से इस सुन्नत के अमल में भी बढ़ावा होगा भले ही यह सुन्नत एक नमाज़ में एक बार से अधिक नहीं पढ़ी जाती, और इस तरह पुण्य भी बढ़ेगा और सुन्नत पर अमल भी आगे बढ़ेगा.
 




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