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---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? ---उस पर व्यभिचार का आरोप लगाया गया जबकि वह बेगुनाह है, और उसके पास अपनी बेगुनाही का कोई सबूत व प्रमाण नहीं है। तो वह क्या करे? ---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? ---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? --- नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का वुज़ू नींद से नहीं टूटता है। ---उस पर व्यभिचार का आरोप लगाया गया जबकि वह बेगुनाह है, और उसके पास अपनी बेगुनाही का कोई सबूत व प्रमाण नहीं है। तो वह क्या करे? ---वादा-ख़िलाफ़ी सख़्ती से मना ---दुश्मन की लाशें उसके हवाले करना ---दुश्मन की लाशों पर गु़स्सा न निकाला जाए ---दुश्मन की लाशों पर गु़स्सा न निकाला जाए

Under category संदेह और उनके उत्तर
Creation date 2009-04-15 03:28:08
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इस्लामी शरीयत (क़ानून) हर युग और हर जगह के लिए उचित है

 


 आपका विश्वास ऐसा हो सकता है कि इस युग के लिए इस्लामी क़ानून उपयुक्त नहीं है, लेकिन आपका यह विश्वासकिन तथ्यों पर आधारित है ? यह जांचना ज़रूरी हैlऔर जब हम इस बात को जांचते हैं तो पता चलता है कि आपका यह विश्वास सही नहीं है, और इस तरह के विश्वास के आधार पर इस्लामी शरीयत को अप्रचलित नहीं कहा जा सकता है उसके कारण कुछ तरह हैं:
पहला:

 


शायद आप कुछ इस्लामी देशों को जीवन के कुछ क्षेत्रों में अविकसित देख रहे होंगे और बहुत सारे लोग इसी को देख कर और बड़े पैमाने पर इस्लामी शरीयत को बदनाम करने पर लगी मीडिया से प्रभावित हो कर यह प्रश्न उठाते हैं कि यदि उनकी शरीयत वास्तव में चलने के योग्य होती या इस समय के लिए वह उचित होती तो यह सारे देश अविकसित नहीं रहते lतथापि,सच तो यह है कि इस तरह के इस्लामी देशों में इस युग में इस्लामी शरीयत लागू नहीं हैंlइसके विपरीत, वे तो उसके खिलाफ जंग लड़ रहे हैं lहमारे पीछे रहने का असली कारण तो यही है कि हम इस्लामी शरीयत को लागू नहीं कर रहे हैंl भ्रष्टाचार और अन्याय जो हमारे समाज में राज कर रहे हैं वही हमारे पीछे रहने के मूल कारण हैंlहमारे पिछड़ेपन से इस्लामी शरीयत को कोई संबंध नहीं है lयदि इस तरह के पिछड़ेपनसे इस्लामी शरीयत का कोई संबंध है तो यही कि इन देशों में इस्लामी शरीयत का राज्य नहीं है और इसी लिए यह सारे देश पिछड़ते जा रहे हैं l


 दूसरा:
इसी तरह कुछ लोग जो इस्लामी शरीयत को लागू करने का प्रयास कर रहे हैं वास्तव में वे उचित रूप से लागू नहीं कर रहे हैं क्योंकि वे इस्लाम को सही समझने में असफल रहे l और इसी नासमझी में वे ज़ियादती से काम ले रहे हैं या सख्ती कर रहे हैंlकभीमहिलाओं को डाल देते हैं और कभी महिलाओं को शिक्षा से रोकते हैंlऔर कभी यादगार और एतेहासिक चिन्हों को मिटाने लगते हैं और फिर अपने रंग-रूप और पहनावे पर ध्यान नहीं देते हैं lइस प्रकार के व्यवहार को मीडिया ऐसे पेश करती है जैसे कि वही सही इस्लाम हैlऔर मीडिया ऐसी बातों का फायदा उठाती है और दुनिया के सामने पेश कर देती है कि मुसलमान इसी तरह के कामों को फैलाना चाहते हैं lऔर इस तरह के चित्रों को दिखा कर यह एहसास देते हैं कि मुसलमान द्वारा इसी का परचार हो रहा है l

 


इसलिए, लोगों के दिलों में इस्लाम की नफरत फैलती है और लोगों को भी वही विश्वास होता हैजो आप को है कि यही शरीयत है जिसको मुसलमान सब पर लागू करने की इच्छा रखते हैं और लोगों को ऐसा लगता है कि इसी इस्लाम को स्वीकार करने के लिए लोग आमंत्रित हैंlयह समझ कर लोग एक शब्द में कह देते हैं हमको इस की ज़रूरत नहीं है lयही सब कारण हैं कि लोग मान लेते हैं कि इस्लामी शरियत इस युग केलिए उचित नहीं है lहमारा कहना है कि इन बकवास कारणों को ध्यान में रख कर यह फैसला करना कि इस्लामी शरीअत अब चलने के क़ाबिल नहीं है बिलकुल गलत है lइसको इस तरह समझिये कि यदि कुछ लोगों ने कुछ अच्छे और न्याय पर आधारित क़ानूनों को लेक कर अनुचित रूप से उसे लागू किया तो अब आप ही बताइए कि यहाँ गड़बड़ी क़ानून में है या उसके गलत प्रयोग में ?यहाँ यह प्रश्न उठता है कि हम यह फैसला कैसे कर सकते हैं कि कोई क़ानून उचित है या अनुचित है? यह तो हम केवल उसी समय कह सकते हैं जब उस क़ानून को उसी तरह लागू किया जाए जैसा कि उसे इस्तेमाल करने का अधिकार हैlयदि उसके इस्तेमाल में ग़लती हुई तो उस क़ानून को ग़लत कहना सही नहीं है l
 मेरा मानना है कि इस्लामी शरीयत पर कोई हुक्म लगाना ऐसे ही है जैसे किसी किसी धर्म की योग्यता के विषय में फैसला सुनानाlउदाहरण, यदि हम किसी आपराधिक और हत्यारा ईसाई को देखें तो क्या यह फैसला करने का हमें अधिकार है कि ईसाई धर्म हत्या और अपराध का धर्म है?जी नहीं, क्योंकि हमको ईसाईयत (जो एक धर्म है) में और एक ईसाई में जो इसे लागू करनेवाला है अंतर करना होगाlक्योंकि बहुत ऐसा होता है कि उनमें से कुछ अपनी शिक्षाओं को लागू करते हैं, जबकि उन में से कुछ लोग उन्हें लागू नहीं करते lऔर यही बात इस्लाम के विषय में भी कह सकते हैं, इसलिए यदि हम किसी धर्म पर यह फैसला करना चाहते हैं तो हमें उस धर्म के सिद्धांतों को देखना चाहिए और फिर उनमें सोंचना चाहिए उनके माननेवालों के व्यवहार के माध्यम से हुक्म नहीं लगाना चाहिए, इस से हमारा निर्णय सही होगा और हम इंसाफ के साथ उद्देश्य तक पहुँच सकेंगे l

 


याद रहे कि हम, मुसलमान, तीन बातों में विश्वास रखते हैं, जिन्हें हम यहाँ उल्लेख कर रहे हैं और जो बहुत काम की बातें हैं :
* हज़रत मुहम्मद -उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- सबसे आख़री ईशदूत हैं lशुभ क़ुरआन में आया है :

 )ما كان محمد أبا أحد من رجالكم ولكن رسول الله وخاتم النبيين )الأحزاب: 40(

 

 

(मुहम्मद तुम्हारे पुरूषों में से किसी के बाप नहीं है, बल्कि वह अल्लाह के रसूल और ईशदूतों के समापक हैं (अर्थात अंतिम ईशदूत हैं उनके बाद अब कोई ईशदूत नहीं आएगा l)(अल-अहज़ाब:४०)

इसलिए, हम मानते हैं कि इस्लाम सब से आख़रीआसमानी संदेश हैl
* हज़रत मुहम्मद -उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- सभी मानव जाति के लिए भेजे गए, जबकि उनसे पहले के रसूल केवल अपने ही लोगों के लिए भेजे जाते थे lइस विषय में  हज़रत मुहम्मद -उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- ने फ़रमाया :“

 

 

"أعطيت خمسا لم يعطهن نبي قبلي, وذكر منهم وكان النبي يبعث في قومه خاصة, وبعثت للناس كافة"

(मुझे पांच बातें दी गईं जो मेरे पहले किसी ईशदूत को नहीं दी गई उन पांच बातों में यह भी उल्लेख किया कि ईशदूत अपनी अपनी जनजातियों के लिए ही भेजे जाते थे लेकिन मैं सारे लोगों के लिए भेजा गया हूँ l)  
यह बात समझ में आनेवाली है कि  हज़रत मुहम्मद -उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- सारे लोगों की ओर भेजे गए, और पहले के ईशदूतों को यह पता भी होता था कि उनके बाद एक ईशदूत आनेवाले हैं इसलिए प्रत्येक ईशदूत अपनी ही जनजातियों की ओर भेजे जाते थे क्योंकि दूसरी जनजातियों की ओर तो दूसरे ईशदूत आनेवाले होते थेlबल्कि कभी कभीतोएक ही समय में एक से अधिक ईशदूतभेजे जाते थे, एक ईशदूत एक जनजाति के लिए और दूसरे दूसरी जनजाति के लिए जैसा कि हज़रत इबराहीम और हज़रत लूत-दोनों पर सलाम हो-के साथ हुआ था l
और जब हज़रत मुहम्मद -उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के बाद कोई ईशदूत नहीं आ सकता है तो सपष्ट है कि वह सारे लोगों की ओर भेजे गएlऔर यह बात भी समझ में आती है कि उनका संदेश उनके बाद के सारे युगों और सारे लोगों के लिए उचित है l   

 


अंत में, हम साबित कर देना चाहते हैं कि इस्लामी शरीयत सारे युगों और सारे स्थानों पर चलने के योग्य है और इसके लिए हम इतिहास के कुछ उदाहरण पेश करते हैं जो इस बयान की पुष्टि के लिए काफी है :
पहला: अरब इस्लाम से पहले और इस्लाम के बाद

 

 


इतिहास से यह तथ्य स्पष्ट हैकि अरब में पहले किसी प्रकार की संस्कृति नहीं उभरी थी बल्कि उनके विषय में तो दुनिया को इस्लाम के बाद ही पता मिला lलेकिन याद रहे कि वही लोग पैगंबर हज़रत मुहम्मद-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- के निधन के चालीस वर्ष के भीतर ही दुनिया पर राज करने लगे lऔर यह शानदार कारनामा इस्लामी शरीयत को लागू करने से ही संभव हो सकाlयह हैरतअंगेज़ राज्य इस्लामी संस्कृति और इस्लामी शरीअत से ही उत्पन्न हुआ था जो अपने दामन में व्यापकता, न्याय, दया,संतुलन और क्रमिकता जैसी विशेषताएं रखती है यहां तक ​​कि एक साधारण आदमी खलीफा को भो टोक सकता था और उनके खिलाफ मुकदमा चलाकर अपना अधिकार हासिल करता था lबल्कि मामला इस से भी आगे पहुंचा था, जैसा कि उल्लेखित है कि एक बार, मिस्र के एक कॉप्टिक आदमी ने मुसलमानों के खलीफा हज़रत उमर के पास शिकायत की और कहा कि उनके गवर्नर हज़रत अम्र बिन आस के बेटे ने उसके साथ अन्याय किया तो खलीफा हज़रत उमर ने अपने गवर्नर और उनके बेटे को बुलाया और कॉप्टिक आदमी को उन दोनों से बदला लेने के लिए कहा और उस मिस्री आदमी को हज़रत उमर के पास से इन्साफ मिला lजी हाँ, यह शानदार उदाहरण इस्लामी शरीयत के छाया में ही स्थापित हुआ lइसी कारण हज़रत उमर –अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे- ने अपना वह प्रसिद्ध शब्द कहा :“

(لقد كنا أذل أمة, فأعزنا الله بالإسلام, فمهما نبتغي العزة في غيره أذلنا الله)

 

 

 

 

(हम एक निम्नतम राष्ट्र थे, लेकिन अल्लाह सर्वशक्तिमान ने हमें इस्लाम के द्वारा मज़बूत किया इसलिए, यदि हम इस्लाम को छोड़ कर किसी और चीज़ के माध्यम से शक्ति का खोज करेंगे तो अल्लाह हमको रुसवा कर देगा l).
* दूसरा : छह सदियों तक पूरे विश्व में इस्लामी शरीयत के तहत इस्लाम का राज्य चला
बनू-उमय्या ने ६६१ ई. से ७५० ई. तक राज्य किया और उनका राज्य पश्चिम में स्पेन से लेकर पूर्व में चीन तक फैला हुआ था lऔर बनू-अब्बास ने ७५० ई. से १२५८ ई. तक राज्य किया और वे भी इस्लामी शरीयत के साथ ही शासन किए और पूरी दुनिया में इंसाफ और बराबरी और शांति का वातावरण स्थापित था lइसका मतलब क्या है? यही न कि इस्लामी शरीयत में सभी स्थानों में और सभी पीढ़ियों में चलने की योग्यता और क्षमता उपस्थित है lक्योंकि वही इस्लाम है जिसने अलग अलग जनजातियों और क़ौमों पर जीवन के सभी क्षेत्रों में इतने लंबे समय तक सफलता के साथ शासन किया और सबको मिलाजुला कर शांति और चैन में रखाl 

 


तीसरा: इस्लामी शरीयत के तहत आर्थिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक प्रगति
मुसलमानों के पूरे इतिहास में इस्लामी शरीयत के तहत जीवन के सारे क्षेत्रों में जो प्रगति प्राप्त हुई वह इस्लामी शरीअत से हट कर कभी नहीं हो पाई lअल्लाह सर्वशक्तिमान ने सच फरमाया :

"فمن اتبع هداي فلا يضل ولا يشقى" (طه:123)

(तो जिस किसी ने मेरे मार्गदर्शन का अनुपालन किया, वह न तो पथभ्रष्ट होगा और न तकलीफ में पड़ेगाl)(सूरा ता॰ हा॰:१२३)  

 

 उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ के शासनकाल मेंआर्थिक प्रगति इतनी अधिक हुई थी कि देखनेवाला हैरान रह जाता है उनके समय का विकास देखने के क़ाबिल था lजो शादी के ख़र्चों को नहीं उठा सकता था उनकी शादी कराई जाति थी और जो अपने क़र्ज़ का भुगतान नहीं कर सकते थे उनके क़र्ज़ का भुगतान किया जाता था lऔर प्रत्येक नए पैदा हुए शिशु के लिए मुसलमानों के ख़ज़ाने से वेतन जारी होता था lएक बार, हज़रत उमर बिन अल-ख़त्ताब –अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे- एक बूढे आदमी को भीख मांगते देखा तो उससे पूछा कि तुम्हारी समस्या क्या है?उस आदमी ने कहा: मैं जिज़ियावालों में से एक आदमी हूँ और मैं जिज़िया का भुगतान नहीं कर सका और उसके भुगतान के लिए भीख माँग रहा हूँlहज़रत उमर-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे- ने कहा : अल्लाह की क़सम यदि हमने तुम्हारी जवानी को खा लिया और तुम्हारे बुढापे को बर्बाद कर दिया तो हमने तुम्हारे साथ इन्साफ नहीं किया lऔर उसके लिए बैतुलमाल (हुकूमत के ख़ज़ाने) से वेतन जारी कर देने का हुक्म दे दिया l 
 
 
 

याद रहे कि इस्लामी शरीयत के लागू किए जाने के ज़माने में ही वैज्ञानिक क्षेत्र में अल-हसन बिन अल-हैसम का सितारा चमका और फराबी, इब्न सीना, अल-बैरूनी ,जाबिर बिन हय्यान, ख़वाररिज़मी और जबरती के सूर्य चमके ​और इन जैसे दूसरे प्रतिभाशाली लोग जन्म लिए जिनसे पश्चिम के लोगों ने लाभ उठाया और उसी पर अपनी संस्कृति का निर्माण कियाlक्या इन में इस बात का सबूत नहीं है कि इस्लामी शरियत अब भी दुनिया को मौजूदा संकट से निकालने की भरपूर क्षमता रखती है ?




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