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क्या सूद पर कर्ज़ उठाने वाले पति के साथ जीवन यापन करना जायज़ है ?

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1844 2013/08/27 2024/07/14
क्या पत्नी गुनहगार समझी जायेगी यदि वह अपने पति के साथ रहती है जो कि एक नयी परियोजना शुरू करने के लिए व्याज पर ऋण लेता है ? क्या यह तलाक़ माँगने के लिए एक कारण समझा जायेगा ?
मैं आपका आभारी हूँगी यदि आप मुझे ऐसे तरीक़े की ओर रहनुमाई करें जिसके द्वारा मैं उसे संतुष्ट कर सकूँ कि वह जो कुछ कर रहा है, ग़लत है।



हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

यदि वह ऋण जिसे वह लेता है एक हलाल (वैध) कर्ज़ है अर्थात सूदी नहीं है, और वह इस बात की नीयत रखता है कि ऋण वाले के हक़ का भुगतान कर देगा, तो इसमें कोई हरज (गुनाह) की बात नहीं है, और इस क़र्ज की वजह से वह पापी नहीं समझा जायेगा।

लेकिन यदि यह क़र्ज़ व्याज़ पर आधारित है तो वह हराम है, उसे लेना जायज़ नहीं है। तथा उसके लिए जायज़ नहीं है कि वह अपनी इस परियोजना को इस हराम धन के द्वारा शुरू करे।

﴿ ومن يتق الله يجعل له مخرجا ويرزقه من حيث لا يحتسب﴾

''और जो व्यक्ति अल्लाह से डरेगा, अल्लाह उसके लिए रास्ता पैदा कर देगा और उसे ऐसी जगह से रोज़ी प्रदान करेगा जिसका उसे गुमान भी नहीं होगा।''

तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्ला का फरमान हैः

''जिसने अल्लाह के लिए किसी चीज़ को त्याग कर दिया, अल्लाह तआला उसे उससे बेहतर बदला प्रदान करेगा।''  

तथा अगर आप उसे नसीहत करना चाहती हैं तो प्रश्न संख्या (9054) में इस विषय से संबंधित कुछ बातें आप को मिल जायेंगी। अतः उसे यह बातें पहुँचा दें, आशा है कि अल्लाह तआला उसे इसके द्वारा लाभ पहुँचाये, और आप लोगों से हराम को दूर करदे।

जहाँ तक उसके सूद (व्याज) खाने का संबंध है तो यह आपके लिए उससे तलाक़ मांगने या ख़ुलअ़् तलब करने को वैध कर देता है, किंतु आपके ऊपर ऐसा करना अनिर्वा नहीं है, बल्कि आपका उसके साथ जीवन यापन करना और उसके साथ निवास करना सही है, जबकि आप उसे निरंतर अच्छे ढंग से नसीहत करती रहें विशेषकर यदि उसके सुधार कि आशा हो।

जहाँ तक उसके माल से खाने का संबंध है, तो यदि उसके पास इस स्रोत के अलावा कोई अन्य वैध स्रोत है, तो आपके ऊपर और आपके बेटों पर उसके माल से खाने में कोई पाप नहीं है। लेकिन यदि उसकी पूरी कमाई हराम की है, और आप लागों को इस माल के अलावा कोई खर्चा नहीं मिल पाता है, और न तो आप लोगों के पास कोई अन्य वैध स्रोत ही है, तो आप लोगों के लिए आवश्यकता भर बिना विस्तार के उससे लेना जायाज़ है क्योंकि अल्लाह तआला का फरामन है:

﴿ فاتقوا الله ما استطعتم﴾

''अपनी शक्ति भर अल्लाह से डरते रहो।''

तथा अल्लाह का फरमान है:

﴿لا يكلّف الله نفسا إلا وسعها﴾

''अल्लाह तआला किसी प्राणी पर उसकी शक्ति से बढ़कर बोझ नहीं डालता।''

तथा इस स्थिति में आप लोगों का उसके माल से लेना, वास्तव में उसके ऊपर आपके अनिवार्य खर्च का लेना है।

इसके साथ साथ, आप बराबर उसे हराम कर्ज़ से रूक जाने और कोई ऐसा वैध तरीक़ा तलाश करने की नसीहत करती रहें जिसमें वह काम करे और उससे अपनी रोज़ी कमाये।

और अल्लाह तआला ही तौफीक़ प्रदान करने वाला है।

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