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---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? ---उस पर व्यभिचार का आरोप लगाया गया जबकि वह बेगुनाह है, और उसके पास अपनी बेगुनाही का कोई सबूत व प्रमाण नहीं है। तो वह क्या करे? ---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? ---क्या वह अपनी बच्ची के रोने के कारण जमाअत की नमाज़ तोड़ सकती है? --- नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का वुज़ू नींद से नहीं टूटता है। ---उस पर व्यभिचार का आरोप लगाया गया जबकि वह बेगुनाह है, और उसके पास अपनी बेगुनाही का कोई सबूत व प्रमाण नहीं है। तो वह क्या करे? ---वादा-ख़िलाफ़ी सख़्ती से मना ---दुश्मन की लाशें उसके हवाले करना ---दुश्मन की लाशों पर गु़स्सा न निकाला जाए ---दुश्मन की लाशों पर गु़स्सा न निकाला जाए

Under category हज़रत पैगंबर की पवित्र पत्नियां
Creation date 2007-11-02 14:17:34
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हज़रत मैमूना बिनते-हारिस-अल्लाह उनसे खुश रहे-

हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की पत्नियों में सब से अंतिम पत्नी-अल्लाह उनसे खुश रहे-
उनका नाम और उनका खानदान
उनका पूरा नाम मैमूना बिनते हारिस बिन हज़न बिन जुबैर बिन अल्हज़म बिन रूबिया बिन अब्दुल्लाह बिन हिलाल बिन आमिर बिन सअसआ अल-हिलालिया था, और उनकी माँ को हिन्द बिनते औफ बिन जुहैर बिन हारिस कहा जाता था, उनकी बहनों में नीचे दिए गए नाम शामिल हैं: उम्मुल-फज़ल(लुबाबा अल-कुबरा) हज़रत अब्बास-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे- की पत्नी,और लुबबा अस-सुगरा, वलीद बिन मुगीरा अल-मख्जूमी की पत्नी यानी खालिद बिन वलीद की माँ और अस्मा बिनते-हारिस, उबै बिन खलफ की पत्नी, और गुर्राह बिनते हारिस ज़ियाद बिन अब्दुल्लाह बिन मालिक हिलाली की पत्नीlयह सब के सब उनकी अपनी बहनें थीं मतलब यह सब एक माँ बाप से थीं lऔर उनकी सौतेली बहनों में नीचे उल्लेख किए गए नाम शामिल हैं: अस्मा बिनते अमीस हज़रत जअफर-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे- की पत्नी, जब हज़रत जअफर का निधन हो गया था तो हज़रत अबू-बक्र -अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे-ने उनके साथ शादी कर लीlऔर जब उनका भी निधन हो गया तो हज़रत अली–अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे-ने उनसे विवाह कियाlऔर सलमा बिनते अमीस हज़रत हम्ज़ा बिन अब्दुल-मुत्तलिब-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे- की पत्नी,  और जब हज़रत हम्ज़ा का निधन हुआ तो शद्दाद बिन उसामा बिन अल-हाद ने उनके साथ विवाह किया lऔर सुलामा बिनते अमीस अब्दुल्लाह बिन कअब बिन अनबा अल-खसअमी l
इसलिए, उनकी माँ हिन्द बिनते औफ पूरे देश में सबसे सम्माननीय औरत समझी जाती थीं जिनके दामादों में बड़े बड़े लोग शामिल थे lक्योंकि उनके दामादों में मानवता में सब से सम्माननीय मनुष्य हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-शामिल थे इसी तरह उनके जिगरी दोस्त हज़रत अबू-बक्र का नाम भी उनके दामादों में आता है, जबकि उनके दो चचा हज़रत हम्ज़ा और हज़रत अब्बास भी हज़रत हिन्द के दामादों में शामिल थे lहज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के दो चचेरे भाई अली बिन अबू-तालिब और जअफर बिन अबू-तालिब हिन्द बिनते औफ के दामाद थे, और शद्दाद बिन अल-हाद भी उनके दामाद हुए थे-अल्लाह उन सब से खुश रहे-l 

वाह क्या सम्मान है हिन्द बिनते औफ का! अब आप ही बताइए क्या इस से भी बड़ा महान और उच्च स्थिति किसी महिला की हो सकती है?
हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-से पहले के उनके  पति
इस्लाम से पहले हज़रत मैमूना पहली शादी मसऊद बिन अम्र अस-सक्फी से हुई थी, लेकिन उसने उन्हें तलाक़ दे दिया तो फिर उनकी शादी अबू-रहम बिन अब्दुल-उज्ज़ा के साथ हुई, लेकिन उसका भी निधन हो गया और वह अभी जवान ही थीं, और ईमान के प्रकाश ने उनके दिल के अंधेरों को रौशन कर दिया था, और उनकी आत्मा में इस्लाम का प्यार समा गया था lइसलिए वह इस्लाम धर्म का शब्द पढ़ लीं और इस्लाम को गले लगा लीं lइस तरह पहले पहल ईमान लाने वालों के रजिस्टर में उनका नाम दर्ज हो गया lऔर अल्लाह सर्वशक्तिमान ने अपने कृपा से उनको हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की पवित्र पत्नियों में शामिल होने के सम्मान से भी सम्मनित किया, और हिजरत के सातवें साल में जब हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-उमरा कर रहे थे हज़रत मैमूना के साथ शादी हुईl 

उनकी इच्छा और उनका सपना
हिजरत के सातवें वर्ष में, हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-औरउनके साथी पवित्र मक्का में प्रवेश किए और उमरा कर रहे थे, जब हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- काबा का तवाफ(चक्कर) कर रहे थे तो हज़रत मैमूना हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-को देखीं, और भर नज़र देखीं, उसी समय से उनके साथ शादी के सम्मान से सम्मानित होने का ख्याल उनके दिमाग में घूमता रहा, उनकी यह गहरे दिल से इच्छा थी कि मोमिनों की माताओं में शामिल हो जाएँ, आखिर इस सपना के पूरा होने के बीच किया चीज़ रुकावट बन सकती थी? जबकि वह तो पहले पहले ईमान लाने वालों में शामिल रहींlजो भी हो, यह ख्याल उनको सोते जागते हर समय सताने लगा, वह अपने दिल की बात हज़रत उम्मे-फजल को बोलने में सफल हो गईं, और साफ़ साफ़ उनको बता दीं कि वह हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के साथ शादी के बंधन में जुड़ना चाहती है, और मोमिनों की माताओं में शामिल होने और हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की पत्नी होने का सम्मान लेना चाहती हैl

उम्मुल-फज़ल इस बात को नहीं छिपाई और अपने पति हज़रत अब्बास को बता दीं, और ऐसा लगता है कि हज़रत अब्बास ने भी इस बात को अपने भतीजे हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-से नहीं छिपाया, जब बात हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-तक पहुँच गई, तो उन्होंने अपने चचेरे भाई जअफर बिन अबू-तालिब को हज़रत मैमूना से मंगनी करने के लिए रवाना किया, और जैसे ही हज़रत जअफर हज़रत मैमूना को ख़बर दे कर वहाँ से निकले हज़रत मैमूना अपने ऊंट पर सवार हुई और हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की ओर निकल पडीं, जब वह हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-को देखी तो बोल पडीं: ऊंट और ऊंट पर जो कुछ भी है वे सब अल्लाह और उसके पैगंबर के लिए हैl

हज़रत मैमूना शुभ क़ुरआन में
इस प्रकार, हज़रत मैमूना ने अपने आपको खुद हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के हवाले कर दिया और उन्हीं के संबंध में शुभ क़ुरआनकी यह आयत उतरीl

وامرأة مؤمنة إن وهبت نفسها للنبي إن أراد النبي أن يستنكحها خالصة لك من دون المؤمنين(سورة الأحزاب:50)


“और वह ईमानवाली स्त्री जो अपने आपको नबी के लिए दे दे, यदि नबी उससे विवाह करना चाहेlईमानवालों से हटकर यह केवल तुम्हारे ही लिए हैl”(सूरा अल-अहज़ाब:५०) 
हज़रत मैमूना ने अपनी शादी की जिम्मेदारी हज़रत अब्बास के हाथ में दे दी, तो उन्होंने उनकी शादी हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-से करा दीl

इस कहानी में यह भी कथित है कि हज़रत अब्बास ने ही हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-को बताया कि मैमूना बिनते हारिस अबू-रिहम बिन अब्दुल-उज्ज़ा के मरने के बाद विधवा रह गईं हैं, तो क्या आप उनके साथ विवाह करेंगे? तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने उनके साथ शादी कर लीl

हज़रत मैमूना और उनकी शुभ शादी

हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-और उनके साथी उमरा के बाद पवित्र मक्का में तीन दिन रुके lजब चौथा दिन हुआ तो कुरैश के अधर्मियों का एक प्रतिनिधि-मण्डल हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के पास आया जिसमें हुवैतिब बिन अब्दुल-उज्ज़ा भी शामिल था जो बाद में इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लिया, वे आ कर हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-को बोले कि अब आप यहाँ से रवाना हो जाइए क्योंकि जो समय आपको दिया गया था वह अब समाप्त हो चुका हैlवास्तव में हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- पिछले साल का छूटा हुआ उमरा अदा कर रहे थे जो हुदैबिया के समय में मक्का के अधर्मियों की ओर से पिछले साल रोक दिया गया था, उन लोगों के कहने पर हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-वहाँ से निकल पड़े और अपने एक नौकर को यह जिम्मेदारी सोंप दिए कि शाम के समय हज़रत मैमून को उनके पास पहुँचा दे, इस तरह जब हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- सर्फ़ नामक स्थान पर पहुँचे तो हज़रत मैमूना भी वहाँ पहुँच गईं, और उसी शुभ स्थान पर हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-का हज़रत मैमूना के साथ मिलन हुआ, और उसी शुभ अवसर पर हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने उनका नाम मैमूना रखा जबकि पहले उनका नाम बररह थाlऔर सर्फ़ में ही हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- का हज़रत मैमूना के साथ विवाह हुआl उस समय वह उमरा का इहराम खोल चुके थेlउसी के बारे में हज़रत मैमूना कहती हैं:हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने मुझ से उस समय शादी की थी जब हम दोनों सर्फ में उमरा का इहराम खोल चुके थेl

यह हदीस हज़रत मैमूना के द्वारा कथित है, और सही है, इसे अल्बानी ने उल्लेख किया है, देखिए सहीह अबू-दावूद, हदीस नंबर:१८४३ l 

 

हज़रत मैमूना और पवित्र मदीना की शुभ यात्रा

जब हज़रत मैमूना-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे-हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के घर में आई तो वह केवल छब्बीस साल की थींlऔर हज़रत मैमूना के लिए यह एक ऐसा महान सम्मान था जिसकी बराबरी दुनिया का कोई सम्मान नहीं कर सकता हैlउन्होंने उस खुशी और आनन्द को अच्छी तरह महसूस किया, क्योंकि वह मोमिनों की पवित्र माताओं के ग्रूप में शामिल हो गईं थींl

जब वह पवित्र मदीना को पहुंचीं तो वहाँ के लोगों की पत्नियों ने उन्हें बधाई दीं और उनका स्वागत किया, और वहाँ की महिलाओं ने अल्लाह की प्रसन्नता को हासिल करने के लिए और अल्लाह के पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की खातिर उनका बहुत सम्मान किया l
हज़रत मैमूना उस कमरे में प्रवेश कीं जो उनके लिए विशेष रूप से तैयार किया गया था, और हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने अपनी सभी पत्नियों को अलग अलग कमरा और घर दे रखा थाl

इस प्रकार, हज़रत मैमूना हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के नज़दीक रहने लगीं और पवित्र क़ुरआन का ज्ञान सीखने लगीं, और हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की हदीसों को उनकी ही पवित्र ज़ुबान से सुनने लगीं, जो जो भी हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- उनको बताते थे उस पर अमल करने लगीं, वह ज़ियादा से ज़ियादा मस्जिदे नबवी में नमाजें पढ़ा करती थीं, क्योंकि वह हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-को फरमाते सुनी थीं:“मेरी इस मस्जिद में एक नमाज़ मस्जिदे हराम को छोड़ कर उसके सिवाय दूसरी मसजिदों की हज़ार नमाज़ से भी अधिक पुण्य का कारण हैl

हज़रत मैमूनाहज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के घर में सम्मानजनक स्थिति का आनंद लेने लगीं lयहाँ तक जब हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- गंभीर रूप से बीमार हुए तो पहले उन्हीं के घर में उतरे,लेकिन उसके बाद हज़रत आइशा ने हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की अनुमति से उनसे इजाज़त ले लीं, ताकि उनके अपने घर में उनकी देखरेख हो सकेlऔर हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- भी हज़रत आइशा ही के घर में रहने की इच्छा रखते l
हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की हदीसों को याद रखना

हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के निधन के बाद, हज़रत मैमूना सहाबा और ताबिईन के बीच उनकी हदीसों को फैलती रहीं क्योंकि वह तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-से डारेक्ट हादीस सुनीं थीं और याद रखी थीं, और उनकी शिक्षाओं और जीने के तरीकों को लागू करने में बहुत मजबूत थीं, हज़रत मैमूना हदीसों को बड़े बड़े सहाबा और नामवर ताबिईन तक पहुंचाने में बहुत ध्यान देती थीं, उनकी गिनती ज़ियादा से ज़ियादा हदीस याद करनेवाले कथावाचकों में होती है, उन्होंने हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-से छिहत्तर हदीसें कथित कीं l

हज़रत मैमूना की परहेज़गारी और ईमान पर गवाही
हज़रत मैमूना हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के घर में इबादत और नमाज़ और रोज़ा का बहुत ख्याल रखती थीं, और उनके तरीकों पर चलने का प्रयास करती थीं और उनके बुलंद शिष्टाचार का अनुकरण करने में कोई कमी नहीं होने देती थीं, वह अल्लाह के हुक्म के अनुसार चलने को कभी भी नहीं भूलती थीं, उसके के लिए वह किसी भी चीज़ को ध्यान में नहीं लाती थीं, न रिश्तेदारी और न मेहरबानी और न दया, इन सब से पहले अल्लाह के हुक्म को रखती थीं, इस विषय में कथित है कि हज़रत मैमूना के पास उनका एक रिश्तेदार आया जिसके मुंह से उनको शराब पीने की बदबू आई तो उन्होंने उसे साफ़ साफ़ कह दिया:यदि तुम मुसलमानों के सामने इस स्तिथि में जाओगे तो वे तुम्हें कोड़े मारेंगे और अब से तुम कभी मेरे पास मत आना l

इस कथन से स्पष्ट हो रहा है कि हज़रत मैमूना-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे- किस हद तक अल्लाह के हुक्म को लागू करने के लिए उत्साहित रहती थीं lउनसे यह हरगिज़ नहीं हो सका कि अपने एक रिश्तेदार पर अल्लाह के हुक्म को लागू करने में नरमी बरतें l

हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने खुद हज़रत मैमूना और उनकी बहनों के ईमान और विश्वास पर गवाही दी:हज़रत इब्ने अब्बास-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे-से कथित है कि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने फरमाया: ईमानवालियां बहनें तो मैमूना(हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की पवित्र पत्नी) और उम्मुल-फज़ल(हज़रत अब्बास की पत्नी)और अस्मा बिनते अमीस( हज़रत जअफर की पत्नी) और हज़रत हम्ज़ा की पत्नी (मतलब यह सब ईमानवालियां बहनें हैं) lऔर यह सब के सब हज़रत मैमूना की सौतेली बहनें थीं, मतलब एक माँ की थीं l–अल्लाह उन सब से प्रसन्न रहे-

यह हदीस हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास से कथित है, और सही है, इसे हैस्मी ने उल्लेख किया है, देखिए “मजमअ अज़-ज़वाइद”पेज नंबर:९/२६३ l

 
उनके आखिरी आखिरी के दिन और कीमती यादें
हज़रत मैमूना-अल्लाह उनसे खुश रहे-चारों इस्लामी खिलाफत के युग को देखीं और उनको सभी ख़लीफ़ा और विद्वानों का सम्मान प्राप्त रहाlवास्तव में वह हज़रत अमीर मुआविया के राज्य तक जिंदा रहीं, और हिजरत के इकानवें साल में सर्फ़ नामक स्थान पर उनका निधन हुआ जब वह लगभग ८० साल की थीं lवह उसी स्थान पर दफन हुईं जहां उनकी शादी का मंडप लगाया गया था, इस तरह अल्लाह सर्वशक्तिमान ने उनके क़ब्र को वहीं बनवाया जहां उनकी शादी हुई थीlज़ैद बिन असम्म इस विषय म&




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