1. सामग्री
  2. पैगंबर (सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम) की आज्ञाएं व वसीयतें
  3. जिसे पसंद हो कि उसकी रोजी़ में ज़्यादती हो और उसकी उम्र बढ़ा दी जाए तो वह रिश्तेदारी निभाए।

जिसे पसंद हो कि उसकी रोजी़ में ज़्यादती हो और उसकी उम्र बढ़ा दी जाए तो वह रिश्तेदारी निभाए।

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तर्जुमा: ह़ज़रत अनस बिन मालिक रद़ियल्लाहु अ़न्हु बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम को फरमाते हुए सुना: "जिसे पसंद हो कि उसकी रोजी़ में ज़्यादती हो और उसकी उम्र बढ़ा दी जाए तो वह रिश्तेदारी निभाए।"

यह दुनिया और आखिरत की तमाम तरह की भलाइयों को शामिल वसियतओं में से एक वसीयत है। रिज़्क़ में ज़्यादती का मतलब है उसमें बरकत होना।

जैसा कि हमें यह मालूम है कि हर इंसान का रिज़्क़ पहले ही से तयशुदा है वैसे ही यकीनी तौर पर यह भी मालूम है कि रिज़्क़ में ज़्यादती का मतलब उसमें बरकत होना है इस तौर पर की रिज़्क़ वाला अपने  रिज़्क़ का मजा महसूस करे। साफ तौर पर उसके फायदे देखे। और उसके हासिल होने पर अल्लाह के शुक्र की तोफीक नसीब हो जाए। तो इस तरह से रिज़्क़ में ज़्यादती से उसे दुनिया में सवाब मिलेगा और आखिरत में भी उसका अच्छा अंजाम होगा।

मेरी राय के मुताबिक यही रिज़्क़  में ज़्यादती का मतलब है और अल्लाह ही बेहतर जानता है।

नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम का फरमान: "जिसे पसंद हो की......" रिश्तेदारी निभाने पर उभारने, रिज़्क़ और उम्र में बरकत और आखिरत में अल्लाह के सवाब की खुशखबरी देने के लिए है। और आखिरत का सवाब ही हकी़क़ी भलाई है और हमेशा रहने वाला है।

नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम का फरमान " तो वह रिश्तेदारी निभाए।" एक ऐसा आदेश है जिसमें हर तरह की भलाई और एहसान है। तो जिसने उस तरह से रिश्तेदारी निभाई जैसा कि अल्लाह ने आदेश दिया है तो वह बेहतरीन मोमिनो और उन सम्मान वालों में से है जिन पर पर अल्लाह ने ज्ञान के दरवाजे खोल दिए हैं और जिन्हें उसने हिकमत और अक्लमंदी की दौलत से नवाजा है। वह इसलिए कि रिश्तेदारी निभाने में तजुर्बे, अक्लमंदी, सब्र, बर्दाश्त  और मेहनत की जरूरत होती है। क्योंकि रिश्तेदार अक्सर अच्छाई का बदला बुराई से देते हैं। कितना ही उन्हें दे दिया जाए खुश नहीं होते हैं और कितनी ही उनके साथ भलाई कर ली जाए फिर भी जैसा शुक्र करना चाहिए वह नहीं करते हैं। बहुत कम रिश्तेदार ऐसे होते हैं जिन्हें अल्लाह इस तरह की बुरी आदत से महफूज रखता है।

मुसलमान को चाहिए कि वह रिश्तेदारों के साथ भलाई करे और बदले में उनसे उसी जैसी भलाई की उम्मीद ना करे और ना ही उनसे उस पर शुक्र की उम्मीद रखे। और अपने आपको इसका आदि बनाए कि वह उसके साथ भी भलाई करे जो उसके साथ बुरा करे। तो जो ऐसे व्यक्ति के साथ भलाई करे जिसने उसके साथ बुरा किया हो वह अल्लाह के बेहतरीन और उसके नजदीक बंदों में से है।

बेशक एक सच्चा मुसलमान अपने आप और दूसरे लोगों के साथ हमेशा जिहाद में रहता है। और यह जिहाद की तरह का होता है और इसके कई कारण होते हैं। तो उसे चाहिए कि वह अल्लाह से दुआ करे कि वह उसे सीधे रास्ते की हिदायत दे और लोगों के साथ भलाई से पेश आने में मुश्किलों का सामना करने में उसकी मदद करे। क्योंकि जो अपने अल्लाह से मदद मांगे तो उसकी मदद करेगा, उसे सीधे रास्ते की हिदायत देगा और मरते दम तक उस पर साबित रहने की ताकत आता करेगा।

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