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  3. महिला की आवाज सत्र होने के संबंधित ऐतराज़ का जवाब और उसके टेढ़ी पसली से पैदा होने का मतलब

महिला की आवाज सत्र होने के संबंधित ऐतराज़ का जवाब और उसके टेढ़ी पसली से पैदा होने का मतलब

10 2020/06/28 2020/07/12
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हकी़क़त के रूप में लोगों के बीच फैलने वाली अफवाहों में से एक अफवाह यह भी है कि इस्लाम महिला की आवाज को सत्र (यानी छुपाने की चीज) समझता है जिसका छुपाना जरूरी है। हम इस संदेह पर ज़्यादा देर बातचीत नहीं करेंगे क्योंकि इसकी कोई भी दलील नहीं है बल्कि इस अफवाह के रद्द में बहुत सी दलीलें मौजूद हैं। उदाहरण के लिए क़ुरआन पाक हमसे ह़ज़रत शुऐ़ब अ़लैहिस्सलाम की बेटियों की ह़ज़रत मूसा अ़लैहिस्सलाम से बातचीत के बारे में बयान फरमाता है।

अनुवाद: और जब मदयन के पास आया वहाँ लोगों के एक समूह को देखा कि वे अपने जानवरों को पानी पिला रहे हैं और उनसे उस तरफ दो औरतें देखीं कि अपने जानवरों को रोक रही जानवरों को रोक रही हैं। मूसा ने उनसे पूछा कि तुम दोनों का क्या मामला है? वे बोलीं हम तब तक पानी नहीं पिलाते जब तक की सभी चरवाहे अपने अपने जानवरों को पानी पिला कर वापस ना ले जाएं और हमारे पिता बहुत बूढ़े हैं।

(सूरह: अल क़सस, 23)

और उनमें से एक ने जो ह़ज़रत मूसा अ़लैहिस्सलाम से जो कहा उसको पवित्र कु़रआन यूँ बयान करता है।

मेरे पिता आपको बुला रहे हैं ताकि आपको उस काम की मज़दूरी दें जो आपने हमारे जानवरों को पानी पिलाया है।

(सूरह: अल क़सस, 25)

महिला की आवाज़ अगर सत्र है तो ह़ज़रत शुऐ़ब अ़लैहिस्सलाम की बेटियों ने ह़ज़रत मूसा अ़लैहिस्सलाम से क्यों बात की? तथा महिला को बोलने और बातचीत करने से कैसे रोका जा सकता है जबकि इस्लाम ने उसे बेचने और खरीदने और भलाई का आदेश देने और बुराई से रोकने की इजाज़त दी है जैसा कि इस आयत में है।

अनुवाद: और मोमिन पुरुष और मोमिन महिलाएं एक दूसरे के दोस्त हैं भलाई का आदेश देते हैं और बुराई से रोकते हैं।

(सूरह:तौबा, आयत संख्या: 71)

तथा उल्लेख है की अमीरुल मोमिनीन ह़ज़रत उ़मर रद़ियल्लाहु अ़न्हु ने जब महर को सीमित करना चाहा तो बीच मस्जिद में से एक महिला खड़ी हुई और उन्हें पवित्र कुरान की आयत का पालन करने को कहा और बोली आप कैसे महर को सीमित करना चाहते हैं जबकि अल्लाह तआ़ला फ़रमाता है।

अनुवाद: (और अगर तुम एक पत्नी को दूसरी पत्नी से बदलना चाहते हो और) तुम उन में से एक को (महर मैं) ढेरों माल दे चुके तो उसमें से कुछ भी (वापस) ना लो। तो हजरत उ़मर रद़ियल्लाहु अ़न्हु ने अपना प्रसिद्ध कथन कहा: महिला ने सही कहा और उ़मर से गलती हुई।

(सूरह: अल-निसा, आयत संख्या: 20)

इस्लाम में महिला के स्थान के बारे में यहाँ एक बहुत ही प्यारी ह़दीस़ ए पाक सुना कर हम अपनी बात खत्म करते हैं और वह यह है कि हज़रत ए उम्मे सलमा बिंते अबी उमय्यह रद़ियल्लाहु अ़न्हा से उल्लेख है कि जब अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहू अ़लैहि वसल्लम हिजरत के लिए निकले तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम की बेटी ह़ज़रत ज़ैनब रद़ियल्लाहु अ़न्हा ने अपने पति अबु अल-आ़स बिन अल-रबीअ जो अभी तक गैर मुस्लिम थे से इजाज़त व अनुमति माँगी के वह भी अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम के साथ जाएंगी। अबु अल-आ़स ने उन्हें इजाज़त देदी। वह आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम के पास आ गईं। फिर जब अबु अल-आ़स मदीने आए तो ह़ज़रत ज़ैनब को संदेश भेजा कि वह अपने पिता से मेरे लिए अमान माँगें। वह बाहर निकलीं और कमरे के दरवाजे से सर निकाल कर बोलीं जबकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम लोगों को सुबह की नमाज़ पढ़ा रहे थे कहने लगीं: ऐ लोगों! में जै़नब अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम बेटी हूँ। मैंने अबु अल-आस को पनाह व शरण दी है। जब अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम नमाज़ से फारिग हुए तो आपने फरमाया: ऐ लोगों! जब तक तुमने यह आवाज़ नहीं सुनी थी मुझे (भी) अबु अल-आ़स के बारे में पता नहीं था। और मुसलमानों का आम आदमी भी पनाह दे सकता है।

इस्लाम ने महिला को जो बुलंद स्थान और सम्मान दिया है उसे कौन नहीं जानता सिवाय उन कुछ जाहिल लोगों के जो इस्लाम पर आरोप लगाते हुए यह अफवाह फैलाते हैं कि इस्लाम महिलाओं की तोहीन करता है और उन्हें सम्मान नहीं देता। ऐसे लोगों को तो महिलाओं के बारे में अपने शर्मनाक विचारों से शर्मिंदा होकर जमीन में दफन हो जाना चाहिए जिन्होंने महिला की सम्मान को छीन लिया है और उसको बेचा और खरीदा जाने वाला तिजारत का एक सामान बनाकर रख दिया है। अगर हम पश्चिम में महिला की स्थिति पर गौर करें तो हमें उसकी स्थिति पर बहुत तरस आता है क्योंकि हवस के पुजारियों ने उसे केवल अपनी हवस पूरी करने का एक ज़रिया बना रखा है। आजादी के बहाने उसे नंगापन और कला के बहाने उसे अपने इज़्ज़त को बेचने की तरफ ढकेल दिया है। तो इसमें महिला की क्या इज़्ज़त है? यह कैसा सम्मान है?

महिला के बारे में यहाँ पर एक और मनगढ़ंत संदेह व एतराज़ है जो सभी संदेहों व एतराज़ो की तरह सत्य के बयान के बाद भंग हो जाता है। वह मनगढ़त संदेह यह है कि इस्लाम समझता है कि महिला टेढ़ी पतली से पैदा की गई है।

आइए इसकी हक़ीक़त को जानने के लिए एक हदीस ए पाक सुनते हैं। ह़ज़रत इमाम बुखारी उल्लेख करते हैं कि नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया:

अनुवाद: जो व्यक्ति अल्लाह और आखिरत के दिन ईमान रखता हो वह अपने पड़ोसी को तकलीफ ना पहुंचाए। और महिलाओं के साथ अच्छा व्यवहार करो क्योंकि उन्हें पसली से पैदा किया गया है। और पसली में सबसे टेढ़ा भाग सबसे ऊपर वाला भाग होता है। अगर तुम उसे सीधा करने की कोशिश करोगे तो तुम उसे तोड़ दोगे और अगर उसे उसके हाल पर छोड़ दोगे तो वह टेढ़ी हि रहेगी। लिहाज़ा उनके साथ अच्छा व्यवहार करो।

हम इस ह़दीस़ शरीफ से क्या सीखते हैं

पहली चीज़: पैगंबर सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने यह नहीं कहा कि महिला को टेढ़ी पसली से पैदा किया गया है जैसा कि कुछ लोग सोचते हैं। बल्कि यह बताया है कि वह पसली से पैदा हुई है।[1]) और यह एक अनदेखी चीज की खबर है जिसे अल्लाह तआ़ला ने अपने पैगंबर सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम को बताया है जैसा कि इसके अलावा बहुत से दूसरी अनदेखी चीज़ों को बताया है जिन पर हर मोमिन ईमान रखता है। लिहाज़ा इसमें औरत का कोई अपमान नहीं है। उदाहरण के तौर पर जब अल्लाह तआ़ला ने हमें यह बताया कि उसने इंसान को मिट्टी से पैदा किया है तो क्या इसका मतलब यह है कि इस्लाम इंसान का अपमान करता है? बिल्कुल नहीं बल्कि यह केवल एक अनदेखी बात की खबर है जिसे अल्लाह तआ़ला के सिवा कोई नहीं जानता और हमारा काम उस पर विश्वास रखना है। दूसरी चीज़: नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि का इस हक़ीक़त के बारे में बताना कि महिला को हज़रत आदम अ़लैहिस्सलाम की पसली से पैदा किया गया है जैसा कि कुरआन ए पाक में इस बात को स्पष्ट किया गया है। अतः उसमें है:

अनुवाद: ऐ लोगों! अपने रब से डरो जिसने तुम्हें एक जान से पैदा किया और उसी में से उसका जोड़ा बनाया। (अनुवाद कंजु़ल ईमान)

(सूरह: अल- निसा, आयत संख्या:1)

तो इस खबर से हमें पुरुष और महिला के बीच के रिश्ते की हक़ीक़त का ज्ञान होता है और यह पता चलता है कि उनके बीच का यह रिश्ता एक मजबूत रिश्ता है क्योंकि महिला पुरुष से है और पुरुष महिला से है जैसा कि अल्लाह तआ़ला ने इरशाद फरमाया:

अनुवाद: तुम आपस में एक हो। (अनुवाद कंजु़ल ईमान)

(सूरह: आले इ़मरान, आयत संख्या: 195)

तथा यह ह़दीस़ ए पाक पुरुषों को महिलाओं के साथ अच्छा व्यवहार करने, उनके साथ भलाई से पेश आने और उनके साथ सब्र से काम लेने की वसियत के बारे में आई है। क्योंकि महिला फितरती तौर पर जज़्बाती होती है।

अत: हम यहाँ आयत ए करीमा:

की तफ़सीर में ह़ज़रत शैख शअ़रावी रह़मतुल्लाहि अ़लैहि की बहुत ही प्यारी बात बयान करना चाहते हैं, वह कहते हैं:

अल्लाह तआ़ला ने इरशाद फ़रमाया: (और उसने उससे बनाया) तो अगर महिला पसली से पैदा हुई हो तो फिर शब्द "मिन" तबईज़िया यानी "कुछ हिस्से के बयान के लिए" है और अगर वह ह़ज़रत आदम अ़लैहिस्सलाम की तरह पैदा हुई हो तो शब्द "मिन" बयान के लिए है। यानी उसी की जिन्स से है और उसी तरह उसे बनाया जैसा उसे बनाया। तो यह ऐसे ही होगा जैसा कि अल्लाह तआ़ला ने इस आयत ए करीमा में इरशाद फरमाया:﴿ ﴾ (वही है जिसने अनपढ़ों में उन्हीं में से एक रसूल भेजा)

यानी उन्हीं की तरह एक मानव रसूल भेजा। और एक दूसरी जगह ह़ज़रत शेख शअराबी ने अपने एक सबक़ के दौरान फरमाया: बेशक अल्लाह तआ़ला हर चीज को बनाने से पहले उसे और उसके ज़रिए किए जाने वाले काम को अच्छी तरह से जानता है। लिहाज़ा अल्लाह तआ़ला हर चीज को ऐसी विशेषतऔं के साथ बनाता है जो उसके मकसद और काम को अंजाम देने में उसकी मदद कर सकें। कभी-कभी कुछ चीज़ों को देखकर आपके दिमाग में यह ख्याल आता होगा कि ये चीज़ें किसी काम की नहीं हैं या यह आता होगा कि अगर इस चीज़ को इस तरीके से बनाया जाता तो अच्छा होता। लेकिन मामला ऐसा नहीं है। उल्लेख किया जाता है कि एक व्यक्ति अल्लाह तआ़ला की बनाई हुई चीज़ों में सोच विचार करने के बाद बोला इससे अच्छे और बेहतर तरीके से कोई पैदा कर ही नहीं सकता। तथा एक लोहार ने लोहे की सीधी छड़ी को लेकर उसे टेढ़ा कर दिया यह देखकर उसके बेटे ने पूछा सीधी छड़ी को मोड़ कर क्यों टेढ़ा कर दिया उसे सीधा क्यों नहीं रहने देते? उसके पिता ने जवाब दिया छड़ी मुड़कर ही अपना काम अंजाम दे सकती है उसके सीधा रहने से उसका काम नहीं हो सकता। उदाहरण के तौर पर हुक, दरांतियां, हंसिये और पेड़ों से फल तोड़ने वाले औज़ार अगर सीधे होते तो वे अपना काम अंजाम नहीं दे सकते थे। अब इस की रोशनी में हम उस हदीस ए पाक को बेहतर तौर पर समझ सकते हैं जिसमें नबी ए करीम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने महिलाओं के बारे में ऐसा फरमाया कि उन्हें पसली से पैदा किया गया है और पसली में सबसे टेढ़ा हिस्सा सबसे ऊपर वाला हिस्सा होता है। अगर तुम उसे सीधा करने की कोशिश करोगे तो तुम उसे तोड़ दोगे और अगर उसे उसके हाल पर रहने दोगे तो वह टेढ़ी ही रहेगी। लिहाज़ा उनके साथ अच्छा व्यवहार करो। अगर आप अपने सीने की पसलियों में गौर करेंगे तो आपको पता चलेगा कि यह पसलियां आपके दिल और फेफड़ों की सुरक्षा करती हैं अगर यह टेढ़ी ना हों तो ये आपके दोनों महत्वपूर्ण अंगों -दिल और फेफड़ों- की सुरक्षा नहीं कर पाएंगी। लिहाज़ा उनका टेढ़ापन हमदर्दी और सुरक्षा के लिए है। और इसी तरह जिंदगी महिला का किरदार है। उदाहरण के तौर पर वह ह़म्ल (गर्भावस्था) के दौरान अपने उस बच्चे के साथ बड़ी नरमी से काम लेती है और उसकी हिफाज़त करती है और जब वह उसे जन्म देती है तो उस पर और भी ज्यादा मेहरबान और रह़म दिल हो जाती है।

लिहाज़ा नबी ए करीम सल्लल्लाहू अ़लैहि वसल्लम का औरतों की यह विशेषता व हकीकत बयान करना उनके के हक़ में कोई गाली नहीं है और ना ही इसमें उनका कोई अपमान है क्योंकि औरत की फितरत में इस तरह का टेड़ापन उसकी जिंदगी के मकसद को पूरा करने के लिए जरूरी चीज़ है। इसीलिए आप देखते हैं कि महिला के अंदर हमदर्दी और रहम दिली का पहलू उसकी अक़्ल और बुद्धि के पहलू से ज़्यादा होता है क्योंकि महिला को उसके जीवन में इसी तरह की फितरत की ज़्यादा आवश्यकता व जरूरत होती है जबकि पुरुषों के अंदर बुद्धि का पहलू दया व रहम दिली के पहलू से ज्यादा रहता है ताकि वे जीवन में अपना मकसद अंजाम दे सकें। क्योंकि उनके कंधों पर जीवन का भोज रहता है। अल्लाह तआ़ला ने हर एक चीज को एक खास काम के लिए बनाया है और हर एक का अपना एक काम है। और जिसको जिस तरह बनाया है वही उसके लिए सबसे ज्यादा बेहतर है भले ही देखने में हमें उसमें कोई कमी दिखाई दे।

 

[1]) ) इस शब्द "टेढ़ी" के साथ भी एक रिवायत मिलती है। त़िबरानी की किताब "अल-मुअ़जम अल-ओसत़" में ह़ज़रत ए अबुहुरैराह रद़ियल्लाहु अ़न्हु से उल्लेख है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया:

अनुवाद: महिला को टेढ़ी पसली से पैदा किया गया है। लिहाज़ा जब तुम उसके साथ रहोगे तो टेढ़ापन देखोगे। तो अगर तुम उसे सीधा करने की कोशिश करोगे तो तोड़ दोगे और उसका तोड़ना तलाक है (अल-मुअ़जम अल-ओसत़, ह़दीस़ संख्या: 283)

लिह़ाज़ा शब्द "टेढ़ी" को इस रिवायत के अनुसार सही़ह़ भी मान लिया जाए तो भी हरगिज़ इसमें महिला का अपमान नहीं है। बल्कि इससे पुरूषों को इस बात की वसीयत करना मकसूद है कि वे महिलाओं के साथ अच्छा व्यवहार करें, और उनके साथ नरमी, रह़म दिली, सब्र और बर्दाश्त से पेश आएं और उनकी थोड़ी सी किसी बात से परेशान होकर उनको तलाक देने में जल्दबाजी़ से काम ना लें।

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