1. सामग्री
  2. संदेह और उनके उत्तर
  3. मुस्लिम महिला का गैर मुस्लिम पुरुष से विवाह करने कि मनादी व रुकावट पर संदेह व ऐतराज़ और उसका रद्द

मुस्लिम महिला का गैर मुस्लिम पुरुष से विवाह करने कि मनादी व रुकावट पर संदेह व ऐतराज़ और उसका रद्द

12 2020/06/28 2020/07/12
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इस्लाम मुसलमान पुरुष को किताबिया (यानी ईसाई या यहूदी) महिला से विवाह करने की इजाजत देता है जबकि मुस्लिम महिला को ऐसा करने (यानी ईसाई या यहूदी पुरुष से शादी करने) से मना करता है ऐसा क्यों है?

यह एक अच्छा सवाल है लेकिन इसका जवाब देने से पहले हम इस बात पर जोर देना चाहेंगे कि इस्लाम ने मुस्लिम महिला को गैर-मुस्लिम पुरुष से विवाह करने से मना किया है। अल्लाह तआ़ला क़ुरआन ए पाक में इरशाद फरमाता है।:

अनुवाद: और ऐ मुसलमानों! अपनी महिलाओं को मुशरिकों (यानी गैर मुस्लिमों) के विवाह में ना दो जब तक कि वे ईमान ना लाएं। और बेशक मुस्लिम गुलाम मुशरिक (गैर-मुस्लिम) से अच्छा है भले ही वह तुम्हें भाता हो। (अनुवाद कंज़ुल ईमान)

(सूरह: अल-बक़रह, आयत संख्या: 221)

     गैर-मुस्लिम पुरुष से मुसलमान महिला की शादी की मनादी और रुकावट वास्तव में इस हक़ीक़त पर आधारित है कि आमतौर पर महिला अपने पति का पालन करती है। इसी तरह आमतौर पर पति का अपनी पत्नी पर उससे कई गुना ज़्यादा असर पड़ता है जितना कि एक पत्नी का उसके पति पर पड़ता है। और वास्तव में इस्लाम एक ऐसा धर्म है जिसके बहुत से मकसद हैं जिनमें से दो निम्नलिखित मकसद है भी हैं।

पहला मकसद: यह है कि लोग स्पष्ट तौर पर इस इस्लाम धर्म को जान लें जिससे उन्हें यह यकीन हो जाए कि वही एक सच्चा धर्म है। यही कारण है कि उसने मुस्लिम पुरुष को गैर-मुसलिम महिला से विवाह करने की इजाजत दी है इस शर्त के साथ कि वह किताब वालों में से हो यानी यहूदी या इसाई हो। क्योंकि वह (यानी यहूदी और ईसाई महिला) कम से कम अल्लाह और वह़ी (अल्लाह की तरफ से पैगंबर को संदेश) पर तो ईमान रखती है भले ही वह गलत तरीके से विश्वास रखती है। इसीलिए वह दूसरों की तुलना में इस्लाम को आसानी से समझ सकती है। विशेष रूप से जब उसकी शादी एक ऐसे सच्चे पक्के मुसलमान से हो जाए जो अपने कहने और करने में इस्लामी शिक्षाओं का पाबंद हो। क्योंकि जब वह उसके अच्छे इस्लामी अखलाकक़ व आदाब और अपने साथ उसके अच्छे व्यवहार को देखेगी तो यह उसके इस्लाम में प्रवेश का कारण भी हो सकता है। लेकिन अगर वह अपने धर्म पर भी रहना चाहे तो उसे उसका पूरा अधिकार है। और किसी को भी यह अधिकार नहीं कि वह उसे धर्म बदलने के लिए मजबूर करे। अल्लाह तआ़ला इरशाद फरमाता है।:

अनुवाद: धर्म में कोई जबरदस्ती नहीं।

(सूरह: अल- बक़रह, आयत संख्या: 256)

     दूसरा मकसद: यह है कि इस्लाम अपने अनुयायियों यानी मानने वालों को अपने से जोड़े रखना चाहता है। यही कारण है कि वह उन्हें ऐसी चीज से हमेशा दूर रखता है जो भी उनके ईमान पर गलत असर डाले। इस तरह की चीज़ों को धर्म में फ़ितना (यानी आज़माइश) कहा जाता है। अल्लाह तआ़ला इरशाद फरमाता है।:

अनुवाद: और फितना (और फसाद) क़त्ल (हत्या) से (भी) बढ़कर है।

(सूरह: अल-बक़रह, आयत संख्या:217)

वास्तव में इस तरह के फ़ितने कई प्रकार के हो सकते हैं। उदाहरण के तौर पर किसी मुस्लिम को उसका अ़की़दा यानी विश्वास बदलने के लिए तकलीफ दिया जाना और हमारी वाली भी सूरत हो सकती है यानी मुसलमान महिला की ग़ैर-मुस्लिम पुरुष से शादी करवा देना। अब सवाल यह है कि ग़ैर-मुस्लिम पुरुष से मुसलमान महिला की शादी क्यों मना है? तो उसका जवाब वही है जो ऊपर बयान हो चुका है कि आमतौर पर पति का असर उसकी पत्नी पर ज्यादा पड़ता है और बहुत संभव है की इस ग़ैर-मुस्लिम पति का उसकी मुसलमान पत्नी पर गलत असर पड़ जाए जिसके कारण उसकी पत्नी अपना इस्लाम धर्म छोड़ दे या कम से कम वह इस्लामी शिक्षाओं की पाबंदी न कर सके। और ऐसा सब कुछ इस्लाम अपने अनुयायियों और मानने वालों के लिए कभी गवारा नहीं करता। बल्कि इस्लाम तो उन्हें हमेशा एक ऐसा उचित और मुनासिब माहौल देने की कोशिश करता है जिसमें वे उसकी शिक्षाओं पर अमल कर सकें। इसीलिए इस्लाम ने मुसलमान महिला को मुसलमान पुरुष के साथ साथ एक अच्छा व्यक्ति चुनने पर भी जोर दिया है। और इस बात पर भी जोर दिया है की वह ऐसे व्यक्ति को चुने जो शरीअ़त का पाबंद हो और ऐसे व्यक्ति को कुबूल व स्वीकार ना करे जो इस्लामी शिक्षाओं में सुस्ती करता हो। यह सब इस वजह से है ताकि मुस्लिम महिला अपने धर्म और उसकी शिक्षाओं को मजबूती से पकड़ी रहे और हर गलत असर से दूर रहे।

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