विवाह में खेल कूद के बारे में कुछ चेतावनी

Auther : अबू मरयम मजदी फ़तह़ी अल सैयद
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विवाह के दिन जिस बात की चेतावनी की आवश्यकता है वह यह कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम की वसियत में जो विवाह के दिन खेल कूद करने के अनुमति व इजाज़त दी गई है उसका यह मतलब नहीं है कि विवाह में ह़राम काम किए जाएं, आज के समय में विवाह में जो ह़राम कार्य होते हैं उन्हीं में से एक यह भी है कि लोग ढोल और बैंड बाजे बजाते हैं, और औरतों और उनकी सुंदरता और उनके प्यार की कहानियों के गाने गाते हैं जिससे अल्लाह नाराज़ होता है, यह सब चीज़ें मना हैं, निम्नलिखित ह़दीस़ शरीफ में इसकी मनाही व रोक साफ़ जा़हिर है, अबु मालिक अशअ़री से उल्लेख है वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने फरमाया :

 " आने वाले समय में मेरी उम्मत में कुछ ऐसे लोग होंगे जोव्यभिचार (ज़िना), रेशम पहनने, शराब पीने और ढोल बाजों को अपने लिए जायज़ कर लेंगे। "([1])

ह़दीस़ शरीफ शब्द "ह़िर " आया है, इसका अर्थ : योनि है, इसका मतलब यह है कि वे लोग ज़िना को जायज़ व ह़लाल समझेगें।

और शब्द "मआ़ज़िफ" आया है, इसका मतलब खेल तमाशा करने या बजाने के साधन हैं, और हमें अल्लाह पाक का यह फरमान नही भूलना चाहिए, अल्लाह फरमाता है :

 وَمِنَ النَّاسِ مَن يَشْتَرِي لَهْوَ الْحَدِيثِ لِيُضِلَّ عَن سَبِيلِ اللَّهِ بِغَيْرِ عِلْمٍ وَيَتَّخِذَهَا هُزُوًا ۚ أُولَٰئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ مُّهِينٌ ([2])

( अर्थ: और कुछ लोग खेल की बातें खरीदते हैं ताकि (लोगों को ) अल्लाह के रास्ते से भटका दें बिना समझे, और उसे हंसी (मज़ाक) बना लें, उनके लिए ज़िल्लत (अपमानकारी) का अ़ज़ाब (यातना) है।)

ह़ज़रत इब्ने मसऊ़द - अल्लाह उनसे प्रसन्न हो - से इस आयत के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा : " इसका मतलब गाना और उसे सुनना है। " ([3])

और ह़ज़रत अ़ब्दुर्रह़मान बिन औ़फ - अल्लाह उनसे प्रसन्न हो - से उल्लेख है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने फरमाया : मुझे दो मूर्ख और अनैतिक (पापी) आवाज़ों से मना किया गया है : एक खुशी के समय बांसुरी (व म्यूज़िक ) की आवाज़ से, और दूसरी दुखी व मुसीबत के समय रोने (नौह़ा करने यानी चीखने चिल्लाने) की आवाज़ से। " ([4])

तो एक ज्ञानी उस चीज़ को कैसे जायज़ समझ सकता है जिसे अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने मना किया और उसे मूर्ख और अनैतिक (पापी) आवाज़ कहा, और उसे और नौह़ा (यानी मृतक व मुर्दे पर चीखने चिल्लाने और कपड़े आदि फाड़ कर रोने) जिसके करने वाले पर लानत हुई है, को एक जैसा बताया, और दोनों को एक तरह से मना किया और दोनों को मूर्ख और अनैतिक (पापी) बताया।([5])

और नबी सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने जब यह फरमाया: " व्यक्ति जिस चीज़ से भी खेलता है वह गलत है, सिवाय घोड़े को प्रशिक्षित करने, धनुर्विद्या (धनुष के द्वारा तीर चलाना) और अपनी पत्नी के साथ खेलने के।"([6]) तो साफ़ तौर पर यह बता दिया कि म्यूज़िक (व ढोल बाजों) के द्वारा गाना जायज़ खेलों में से नहीं है, और दूसरी ह़दीस़ शरीफ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने फरमाया : हर वह चीज़ जो अल्लाह के ज़िक्र से नहीं है वह खेल कुद और लापरवाही है, सिवाय चार चीज़ों के : व्यक्ति का दो लक्ष्यों के बीच दौड़ना,  अपने घोड़े को प्रशिक्षित करना, अपनी पत्नी के साथ खेलना और तैरना सीखना। " ([7])

ह़दीस़ शरीफ में " व्यक्ति का दो लक्ष्यों के बीच दौड़ना " का मतलब तीर फेंकने का लक्ष्य है, और इसका मतलब लक्ष्य के लिए फेंके हुए तीरों को इकट्ठा करने के लिए चलना है, या युद्ध के लिए दौड़ लगाना है।

घोड़े को प्रशिक्षित करने का मतलब उस पर युद्ध के लक्ष्य से उसे भागना और दौड़ना सिखाना है।

अपनी पत्नी के साथ खेलने का मतलब उसके साथ जायज़ हंसी मज़ाक करना।

अत: हर एक मुसलमान के लिए अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम के जीवन में बेहतरीन आदर्श है, इसी तरह नबी सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम महिलाओं के साथ व्याहार के लिए पुरुषों के लिए बेहतरीन उदाहरण और उत्तम आदर्श हैं, अत: आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम महिलाओं के प्रति सबसे ज़्यादा कोमल और उन पर सबसे अधिक दयालु थे, आप उन्हें प्रसन्न करते और उनका ख्याल रखते थे। इसलिए मुसलमान (बल्कि हर एक) पती का अपनी पत्नी का दिल बहलाना, उसके साथ खेलना, उससे जायज़ हंसी मजाक करना, उसका दिल खुश करना और उसे प्रसन्नता देना, यह सब जायज़ है ताकि परिवार में सदैव सुखी व खुशी रहे।

 



([1])  यह ह़दीस़ सही़ह़ है, इसे ईमाम बुख़ारी (5590) अबू दाऊद (4039) और अल-तबरानी ने अल मुअ़जम अल कबीर में (3417) और बइहक़ी ने सुनने कुब्रा में (10/221) रिवायत किया है।

([2]) (सूरह :लुक़मान, आयत:6)

([3]) यह सही़ह़ ख़बर है, इसे ईमाम हा़किम ने (2/411)रिवायत किया है, इसे ईमाम ज़हबी ने सही़ह़ किया और साबित किया है और ईमाम त़बरी ने अपनी तफ़सीर में भी (21/39)।

([4]) यह ह़दीस़ ह़सन है, इसे ईमाम तिरमिज़ी ने (1011) और बइहक़ी ने अपनी सुनने कुब्रा में (4/69) उल्लेख किया है, और इस पर शवाहिद (सुबूत ) भी हैं।

([5]) इब्ने क़य्यिम की किताब "इग़सातुल्लुहफ़ान" (1/273)

([6]) यह ह़दीस़ सही़ह़ है, अबू दाउद (2496), निसई (6 /222), तिरमिज़ी (1688), इब्न माजह (2811), ईमाम अह़मद (4/146, 148) सुनने दारमी (2/205)

([7]) यह ह़दीस़ सही़ह़ है, इसे निसई ने महिलाओं के व्यवहार के बारे में (52) (53), और तबरानी ने "अल मुअ़जम अल कबीर " और "अल मुअ़जम अल सगीर " (1785) में उल्लेख किया है जैसा कि "अल मजमअ़" (6/269) में है।

 

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