हज़रत सफिय्या बिनते हुयेय-अल्लाह उनसे प्र

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हज़रत सफिय्या बिनते हुयेय-अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे-

उनका वंश
उनका पूरा नाम सफिय्या बिनते हुयेय बिन अख्तब था, वह अपने वंश के ऊपर में पैगंबर हज़रत हारून-उनपर सलाम हो- से मिलती हैंl
हज़रत सफिय्या कहती हैं: "मैं अपने पिता के बच्चों में उनको सबसे अधिक प्यारी हूँ और मैं अपने चचा अबू-यासिर को उनके अपने बच्चों से भी अधिक प्रिय थी, जब भी मैं उनसे उनके दोनों बच्चों के साथ मिली तो उन दोनों से पहले उन्होंने मुझे गोद में लियाlजब हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- मदीना को आए तो मेरे पिता और मेरे चाचा रात की अंधेरी में उनके पास गए और फिर सूरज डूबने के समय वापिस आए और जब वापिस आए तो बिल्कुल निढाल थे और आहिस्ता आहिस्ता चल रहे थे, तो मैं दौड़ कर उन दोनों के पास गई लेकिन उदासी के कारण उन दोनों में से किसी ने भी मेरी तरफ ध्यान नहीं दिया lमैंने मेरे चाचा को सुना कि मेरे पिता को कह रहे हैं: क्या वह वही है? तो मेरे पिता ने उनको कहा: हाँ अल्लाह की क़सम lमेरे चाचा ने कहा: क्या तुमको पता है और पूरा पूरा विश्वास है? तो उन्होंने कहा: हाँ तो मेरे चाचा ने कहा: तो फिर तुम्हारे दिल में उनके विषय में क्या है? इस पर मेरे पिता ने उत्तर दिया: अल्लाह की क़सम जब तक जियूंगा उनसे दुशमनी रखूँगा l

उनका जन्म और पालनपोषण का स्थान
हज़रत सफिय्या के जन्म की सही तारीख का तो पता नहीं है, लेकिन वह खज़रज जनजाति में पलीं बढ़ीं, और जाहिलियत के समय में भी सम्मानवाली महिला थीं, वह पहले यहूदी धर्म पर थीं और मदीना की रहनेवाली थीं उनकी मां का नाम बर्रह बिनते समौअल था l

उनकी विशेषताएँ
हज़रत सफिय्या के विषय में यह बात मशहूर है कि वह बहुत ज़बरदस्तव्यक्तित्व और विशेष चरित्र की मालिक थीं, इसी तरह सहनशील, सुंदर और बहुत बुलंद दर्जा रखती थींl

इस्लाम से पहले उनकी ज़िन्दगी

वह अपने परिवार के पास उच्च सम्मानवाली थीं lकहा जाता है कि इस्लाम से पहले उनकी दो बार शादियाँ हुई थीं, उनके पहले पति का नाम सलाम इब्ने मश्किम था जो अपनी जाति का सिपहसालार था और एक बड़ा कवि था, लेकिन बाद में उससे जुदा हो गई थीं और फिर किनानह इब्ने रबीअ इब्ने अबू-हकीक़ अन-नसरी(क़मूस के गढ़ का मालिक जो यहुदियों में सबसे मज़बूत गढ़ था और जो खैबर के दिन मारा गया था) के साथ उनकी शादी हुई थीl

हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के विषय में उनको कैसे पता चला?

कहा गया है कि वह हिजरत के सातवें साल मुहर्रम के महीने में पैदा हुईं, जब हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने यहूदियों से लड़ाई का फैसला कर लिया और जब नज़दीक पहुंचे तो यह दुआ पढ़े:अल्लाह बहुत बड़ा है, खैबर तबाह हो गया, निस्संदेह जब हम किसी मैदान में उतरते हैं तो डराए गए लोगों की सुबह खराब हो जाती हैl

जब मुसलमानों और यहूदियों के बीच लड़ाई शुरू हुई तो खैबर के कुछ लोग मारे गए और उनकी महीलाएं क़ैदी बन गईं, उन्हीं में हज़रत सफिय्या भी शामिल थीं, उनके गढ़ मुसलमानों के हाथ में आगए, जिनमें से एक गढ़ इब्ने अबू-हकीक़ का भी था l

जब हज़रत बिलाल क़ैदियों को लेकर जंग में मारे गए लोगों के पास से गुज़रे तो लाशों को देख कर हज़रत सफिय्या की एक चचेरी बहन चीखने चिल्लाने लगी और अपने चेहरे पर मिटटी और धूल डालने लगी lयह देख कर हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ज़रा दुखी हुए और उसको अपने सामने से दूर ले जाने का आदेश दिया, लेकिन हज़रत सफिय्या को अपने पीछे खड़े होने के लिए कहा, और अपने कपड़े से उनकी आँखों को ढांप दिया ताकिमृतकों पर उनकी नज़र न पड़े l

इसी कारण कहा गया कि उन्होंने उनको अपने लिए चुन लिया थाl
उल्लेख किया गया है कि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने खैबर पर चढ़ाई की तो हम लोग फज्र की नमाज़ अँधेरी में पढ़ ली थीं उसके बाद हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-सवारी पर सवार हुए, और हज़रत अबू-तल्हा भी सवार हुए, इस हदीस के कथावाचक कहते हैं और मैं अबू-तल्हा के पीछे सवारी पर बैठा था, तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने अपनी सवारी को खैबर की गलियोँ में दौड़ाया, और मेरे पैर हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के पैरों को लग रहे थे उसके बाद हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के पैरों से कपड़ा हट गया यहाँ तक कि मुझे हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के पैरों की सफेदी दिखाई दे रही थी lजब वह गाँव में दाखिल हुए तो उन्होंने यह दुआ पढ़ी: अल्लाह बहुत बड़ा है, खैबर तबाह हो गया, निस्संदेह जब हम किसी मैदान में उतरते हैं तो डराए गए लोगों की सुबह खराब हो जाती हैl

उन्होंने इस दुआ को तीन बार दुहराया lऔर उस समय वहाँ के लोग जब अपने अपने कामों के लिए निकले तो वे चीख चीख कर कहने लगे: मुहम्मद, मुहम्मद, इस हदीस में “अल-खमीस”का एक शब्द आया है जिसके बारे में कुछ विद्वानों का कहना है कि उसका मतलब फौज हैlइस हदीस के कथावाचक कहते हैं कि हम मुश्किल से जंग को जीत सके, और फिर लोग क़ैदी बने, इसके बाद दिह्या आए और बोले: हे अल्लाह के पैगंबर! हमको इन क़ैदियों में से एक लौंडी दीजिए तो उन्होंने फरमाया: जाओ एक बांदी लेलो, तो वह सफिय्या बिनते हुयेय् को ले लिए इस पर एक आदमी हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के पास आया, और कहा: हे अल्लाह के पैगंबर! आपने दिह्या को सफिय्या बिनते हुयेय् दे दिया, जो कुरैज़ा और नदीर जातियों की सरदारनी है, वह तो आपको छोड़ कर और किसी के लिए उचीत ही नहीं है lतो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने कहा उसे बुलाओ, तो वह उनको साथ लेकर आए जब हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने उसको देखा तोदिह्या को आदेश दिए कि इसको छोड़ कर किसी और क़ैदी को ले लो l

कहा जाता है कि इसके बाद उन्होंने उसे आज़ाद कर दिया और फिर उनसे शादी कर लीlतो साबित ने उनसे पूछा : ऐ अबू-हम्ज़ा उन्होंने उन्हें महर के तुह्फे में किया दिया था? इस पर उन्होंने उत्तर दिया: खुद उनको ही उनके महर में दिया था lक्योंकि उन्होंने तो उनको आज़ाद किया था, फिर उनसे शादी की lऔर जब रास्ते में ही थे तो हज़रत उम्मे-सुलैम ने उनको तैयार करके रात में उनकी खिदमत में पेश कर दिया lइस तरह हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-सुबह को दूल्हा बने थे lउसके बाद हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने कहा: जिसके पास जो भी हो वह उसे लाकर यहाँ रख दे और एक चमड़े को बिछा दिया गया, और फिर कोई खजूर लाकर रखने लगा तो कोई घी लाकर रखने लगा lइस हदीस के कथावाचक कहते हैं कि मेरे ख़याल में उन्होंने सत्तू को भी उल्लेख किया था, उसके बाद सबको मिला दिया गया, और इसी से हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की शादी का भोज हुआl

इस हदीस को अनस बिन मलिक ने कथित किया, और यह हदीस सहीह है, इसे इमाम बुखारी ने उल्लेख किया, देखिए बुखारी शरीफ हदीस नंबर: ३७१l

उनका इस्लाम धर्म स्वीकार करना
हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की सदा की आदत थी कि किसी को इस्लाम धर्म स्वीकार करने पर मजबूर नहीं करते थे, बल्कि इस विषय को सामनेवाले की मर्ज़ी पर छोड़ते थे यदि वह अल्लाह के उतारे हुए क़ुरआन और उनकी सुन्नत पर संतुष्ट है तो इस्लाम स्वीकार करले lइसलिए उन्होंने हज़रत सफिय्या को आज़ादी दी कि यदि चाहें तो अपने यहूदी धर्म पर बाक़ी रहें या फिर इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लें lयदि वह यहूदी धर्म को अपनाती हैं तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-उनको आज़ाद कर देंगे और यदि इस्लाम कोस्वीकार करती हैं तो वह उनको अपने निकाह में रख लेंगे इस पर वह साफ़ दिली से इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लीं और हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के तरीके को अपना लीं l
खैबर से वापसी पर वह हारिसा बिन नुअमान के घर में ठहरीं और जब वहाँ की महीलाएं उनकी सुंदरता के बारे में सुनीं तो उनको देखने के लिए आने लगीं, उन देखने वालियों में हज़रत आइशा भी शामिल थीं l

कहा गया है कि वह चेहरे पर निक़ाब भी पहनती थीं, जब हज़रत आइशा उनको देख कर बाहर निकलीं तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने उनसे सफिय्या के बारे में पूछा तो वह उत्तर दीं: हाँ हाँ मैंने यहूदन को देख ली, इस पर हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने कहा: वह तो इस्लाम ले आईं और अच्छी तरह इस्लाम लाईं l

हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के साथ उनकी सुहागरात

अल्लाह के पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-उन्हें खैबर में एक घर में लाए और उनके सामने शादी का प्रस्ताव रखा तो वह इनकार कर दी , फिर वे सहबा नामक स्थान को पहुंचे जहां उम्मे-सुलैम बिनते मल्हान ने सफिय्या को कंघी कर के और खुशबू लगा कर सिंगार कराके उनको तैयार कर दिया यहाँ तक कि वह बिल्कुल दुल्हन बन गईlवास्तव में, वह खुश थीं और वह दुख को भी भूल गई थी जो खैबरवालों की घटना के कारण हुआ था, और फिर उनके लिए शादी का भोज भी रखा गया था, और उनको महर के तुह्फे में एक नौकरानी दी गई थी जिसका नाम रज़ीना था जब हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-हज़रत सफिय्या के पास आए तो उन्होंने उनको सुनाई कि जब किनाना के साथ उनकी सुहाग रात थी तो वह सपना में देखि थी कि एक चाँद उनकी गोद में उतर रहा है, तो वह अपने पति को यह सपना सुनाईं उह सुन कर उसने गुस्से में कहा: ऐसा लगता है कि तुम हिजाज़ के राजा मुहम्मद की इच्छा रखती हो और उसने गुस्से में एक तमाचा इनको माराl

फिर हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने उनसे पूछा कि जब खैबर में थी तो शादी की अस्वीकृति का कारण क्या था? तो वह बताई कि उन्हें डर था कि कहीं यहूदी उनके नज़दीक न पहुँच जाएँ l

उमय्या बिनते अबू-कैस कहती हैं: कि जब हज़रत सफिय्या हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की शादी के बंधन में बंधीं तो उनकी उम्र १७ साल भी नहीं थी l


हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की पवित्र पत्नियों और उनके बीच के रिश्ते
हज़रत सफिय्या को जब यह बात पहुंची कि हज़रत हफ्सह ने उनको “यहूदी की लड़की”कह कर संबोधित किया तो वह रो रही थी इतने में हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-उनके पास आए और पूछे क्या बात है क्यों रो रही हो? तो उन्होंने कहा कि हफ्सा ने उन्हें यहूदी की बेटी कह कर संबोधित किया तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने कहा :निस्संदेह तुम तो एक पैगंबर की बेटी हो और तुम्हारे चाचा भी एक पैगंबर थे और अब तुम एक पैगंबर के पास होतो वह तुम पर क्या बड़ाई कर सकती है? फिर उन्होंने हफ्सा को कहा: ऐ हफ्सा अल्लाह से डरो l

यह हदीस हज़रत अनस बिन मालिक से कथित है और सही है इसे अल्बानी ने उल्लेख किया है lदेखिए “मिश्कातुल मसाबीह”हदीस नंबर ६१४३l

हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-अपनी पवित्र पत्नियों के साथ हज को गए जब कुछ रास्ता तय कर लिए तो एक आदमी उतरा और सवारियों को तेज़ तेज़ हांकने लगा यह देख कर हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने उनको कहा: क्या ऊंट पर बैठी कांचों(महिलाओं) को इसी तरह हांका जाता है? अभी रास्ते में ही थे कि हज़रत सफिय्या बिनते हुयेय् की सवारी बैठ गई जबकि उनकी सवारी बहुत मज़बूत थी, इस पर वह रोने लगीं तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-उनके पास आए और उनके आंसूओं को अपने हाथों से पोछने लगे लेकिन उनका रोना और बढ़ता ही गया जबकि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-उनको तसल्ली दे रहे थे लेकिन वह और भी ज़ियादा रो रही थी तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने उनको झिड़क दिया और डांट दिया और लोगों को भी वहीं पड़ाव डालने का आदेश दे दिया तो लोग वहीं पड़ाव डाल दिए जबकि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-वहाँ उतरना नहीं चाहते थेlहज़रत सफिय्यह आगे कहती हैं: और उस दिन मेरी बारी थी, जब लोग अपनी अपनी सवारियों से उतर गए तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के लिए भी एक तंबू लगा दिया गया तो वह उसमें उतरे, मुझे तो पता ही नहीं चल रहा था कि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के साथ मैं क्या करूँ क्योंकि मुझे डर था कि शायद वह मुझ से नाराज़ हैं तो मैं हज़रत आइशा के पास गई और उनको बोली कि आप तो जानती ही हो कि मैं हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के साथ मेरी बारी को कभी छोड़ नहीं सकती लेकिन फिर भी मैं अपनी बारी आपको दे रही हूँ लेकिन इस शर्त पर कि आप हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-को मुझ से मना दें, तो हज़रत आइशा बोलीं ठीक है, उसके बाद हज़रत आइशा ज़ाफ़रान के पानी में धोए हुए घूंघट को ओढ़ी और उसकी खुशबू को तेज़ करने के लिए उसपर थोड़ा सा पानी छिड़क लीं फिर अपने कपड़े पहनीं और हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की ओर निकल पड़ीं और उनके तंबू के एक किनारे को उठाईं तो उन्होंने कहा: क्या बात है? आइशा! आज तो तुम्हारी बारी नहीं हैlतो हज़रत आइशा बोलीं: यह तो अल्लाहकाकृपा है जिसे चाहता है देता है, जब दोपहर का समय हुआ तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने ज़ैनब बिनते जहश को आदेश दिया कि तुम अपनी बहन सफिय्या को सवारी के लिए एक ऊंट दे दो याद रहे उनके पास सब से अधिक सवारियां थीं तो उन्होंने उत्तर दिया: मैं आपकी यहूदन को सवारी दूंगी? यह सुन कर हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-उनसे क्रोधित हो गए और उनके साथ बातचीत बंद कर दिए और पवित्र मक्का को आने तक भी उनसे बात नहीं किए और मिना के दिनों में भी बात नहीं किए और पूरी यात्रा के दौरान भी बात नहीं किए यहाँ तक कि पवित्र मदीना को वापिस हो गए और इस तरह मुहर्रम और सफर का महीना गुज़र गया, न उनके पास आए और न उनके लिए बारी रखी यहाँ तक कि वह निराश हो गईं, लेकिन जब रबीउल अव्वल का म

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