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विरोधियों के साथ

Auther : डॉक्टर मुहम्मद अब्दुर्रहमान अल अरीफी
1726 2013/02/03 2024/05/27

हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-सदा ग़ैर-मुसलिमों के साथ भी इंसाफ करते थे, यहाँ तक कि वह अपने जीवन को भी जोखम में डालते थे और इस्लाम धर्म का न्यूता उनके कानों तक पहुंचाते थे और उनको सुधारने का अथक प्रयास करते थे, उनकी अन्यायों को सहते थे, उनकी बुराइयों को अन्देखी करते थे, ऐसा क्यों न हो जबकि उनके पलान्हार ने उनके विषय में साफ और स्पष्ट कहा है:"वास्तव में हम आपको सारे संसारों के लिए बस सवर्था दयालुता बनाकर भेजा" किसके लिए दयालुता बना कर भेजा? केवल माननेवालों के लिए ? नहीं बल्कि (सारे संसारों केलिए बस सवर्था दयालुता)l   
यहूदियों को ही देख ले लीजिए वे कैसे उनसे दुश्मनी में पहल करते थे और उनका अपमान करते थे लेकिन फिर भी वह उनके साथ नरमी का ही बर्ताव करते थे l
हज़रत आइशा–अल्लाह उनसे प्रसन्न रहे- ने कहा कि :कुछ यहूदी लोग हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के घर के पास से गुज़रे और कहा:(अस्सामु अलैकुम) जिसका अर्थ है (मृत्यु हो तुम पर) तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने जवाब दिया (वालेकुम) "और तुम पर भी''!
हज़रत आइशा जब यहूदियों का शब्द सुनीं तो उन से रहा नहीं गया इसलिए उन्होंने जवाब दिया, और कहा:(मौत हो तुम पर और अल्लाह का अभिशाप और उसका क्रोध हो तुम पर)
हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- ने कहा थोड़ा संभलके हे आइशा! नरमी से चलो, गालीगलौज और कठोरता से बचो l
तो उन्होंने कहा: क्या आपने सुना कि उन लोगों ने क्या कहा था?
तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने कहा: क्या तुमने सुना कि मैंने  क्या उत्तर दिया था ? मैं ने उनकी बात उनपर फैर दी, और याद रखो उनके ख़िलाफ मेरी प्रार्थना तो स्वीकार होती है लेकिन मेरे ख़िलाफ उनकी प्रार्थना स्वीकार नहीं होती है l
जी हाँ, अपमान का जवाब अपमान से देने की ज़रूरत नहीं है l
क्योंकि अल्लाह –सर्वशक्तिमान- ने उनको आदेश दिया:"और मूर्खों से मुंह मत लगाईये"
एक दिन हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-अपने साथियों के साथ एक युद्ध पर बाहर निकले, जब वे वापस लौट रहेथे तो वे एक घने गाछ-बिरिछ  वाली घाटी में उतरे, उनके सहयोगी पेड़ों के नीचे तितरबितर हो गए और सो गए l हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- भी एक पेड़ के नीचे आए और अपनी तलवार उस पेड़ की एक डाली में लटका दिए और अपनी चादर बिछा कर आराम करने लगे l इस बीच, मुसलमानों का पीछा करने वाले लोगों में से एक अधर्मी हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- के पास पहुँच गया, और जब उनको अकेला देखा तो दबे पैर चलता हुआ उनके नज़दीक आगया और डाली पर से तलवार को अपने हाथ में ले लिया और ज़ोर ज़ोर से चिल्लाया हे मुहम्मद! अब तुमको मुझ से कौन रक्षा करेगा? 
हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- उठ खड़े हुए, अचानक देखा कि वह दुश्मन सिर पर खड़ा है और नंगी तलवार उसके हाथ में है, मौत सर पर मंडला रही है, हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-अकेले हैं उनके शारीर पर केवल एक ही परिधान तहबंद है l उनके साथी इधर-उधर बिखरे हैं और सो रहे हैं l वह आदमी अपनी शक्ति और जीत के नशे में धुत्त था, और कहने लगा अब तुमको मुझ से कौन रक्षा करेगा? अब तुमको मुझ से कौन बचाएगा?   
पूर्ण विश्वास के साथ हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने पुरे भरोसे से  कहा:अल्लाह l

आदमी थरथरा गया और तलवार उसके हाथ से गिर गई, तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-उठे और तलवार को अपने हाथ में थाम लिए और कहा अब तुमको मुझ से कौन बचाएगा?
आदमी का रंग बदल गया और सहम गया,  हाथ जोड़कर विनती करने लगा, और हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-से दया की भीख मांगने लगा, कहने लगा आप से अब मुझे कोई नहीं बचा सकेगा, कृपया! आप अच्छा और बेहतर तलवार पकड़ने वाला बन जाइए l हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने कहा: क्या तुम इस्लाम धर्म को स्वीकार करोगे? उसने कहा नहीं लेकिन उन लोगों का साथ नहीं दुंगा जो आपके ख़िलाफ युद्ध लड़रहे हैं l  
तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने उसे माफ कर दिया और उसके साथ अच्छा बर्ताव किया l
उल्लेखनीय है कि वह आदमी अपने लोगों के बीच एक नेता और मुख्य मनुष्य था, जब वापस गया तो उन सब को इस्लाम धर्म का न्योता दिया तो वे सब के सब इस धर्म को स्वीकार कर लिए l

जी हाँ, लोगों के साथ अच्छा बर्ताव कीजिए तो आप उनका दिल जीत लेंगे l
यही नहीं बल्कि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-तो कट्टर से कट्टर दुश्मनों के साथ भी बहुत अच्छा बर्ताव करते थे जिसके द्वारा वह उनके दिलों को भी जीत लेते थे, और उनके दिलों को चमका दिया करते थे बल्कि उनके दिलों से बेईमानी को निकाल कर साफसुथरा कर देते थे l
जब हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-अपने सन्देश का लोगों में परचार करना शुरू किया तो क़ुरैश ने हर तरह से उनका विरोध किया, उन्हों ने तो उनके सन्देश को रोकने के लिए क़ुरैश के मुख्य और पर्धनों के साथ बैठक किया, इस के बावजूद भी लोग उनको मानने के लिए टूट पड़े, तो उन लोगों ने सब को यह कहकर बहकाना चाहा: ज़रा देखो, और हम लोगों के बीच किसी व्यक्ति को खोज कर निकालो जो जादू टोना और कविता में विशेष कौशल रखता हो और फिर उस आदमी को मुक़ाबला की चुनौति देंगे, इसने तो हमारे समूह को तितरबितर करके रख दिया है और हमारी स्तिथियों को बिखेर दिया है और हमारे धर्म का अपमान किया है l
उन लोगों ने कहा इस कम के लिए उत्बह बिन रबीअह को छोड़ कर  कोई भी आदमी उचित नहीं है, उन्होंने उत्बह को कहा: हे अबुल-वलीद !आप ही इस काम को अच्छी तरह कर सकते हैं, और उत्बह एक समझदार और मुख्य व्यक्ति थे l उसने कहा: हे क़ुरैश के लोगो! क्या तुम सब इस बात पर सहमत हो कि मैं उनसे इस विषय पर बातचीत करूँ? मैं उसके सामने एक से अधिक बातें रखूँगा होसकता है कुछ न कुछ तो ज़रूर स्वीकार करेगा l सभों ने कहा: हाँ l हाँ l ठीक है l
उत्बह खड़ा हुआ और उठकर हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के पास आया हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-आराम से बैठे थे, उत्बह उनके सामने ठेहरा और कहा:हे मुहम्मद!आप ज़रा इस प्रश्न का उत्तर दीजिए क्या आपके पिता अब्दुल्लाह की तुलना में आप अधिक अच्छे हैं?    
हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-अपने पिता के सम्मान में चुप रहे और कुछ नहीं बोले l
उसने फिर कहा: कौन अधिक बेहतर हैं आप या आपके दादा अब्दुल्मुत्तालिब?
वह अपने दादा को ख्याल करके चुपचाप रहे l उत्बह ने कहा यदि आपको लगता है कि वे आप से बेहतर थे  तो फिर आप कैसे उन देवताओं का अपमान करते हो जिनको उन्होंने ने पूजा, और यदि आपको लगता है कि आप उन से बेहतर हैं, तो आप बात तो करें ताकि आपकी बात हम सुनें l
हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-अभी उत्तर देने के लिए मुंह भी नहीं खोले थे कि उत्बह जमकर अपना क्रोध दिखलाया और कहा:अल्लाह की क़सम हम ने तो और कोई बकरा देखा ही नहीं जो अपनी जाति पर तुम से अधिक अशुभ हो, तुम ने तो हमारी एकता को तितरबितर कर दिया है, हमारी स्तिथि को बिखेर कर रख दिया है, हमारे धर्म का अपमान किया है, और अरबों के सामने हमको नंगा करके रख  दिया है, आप को याद रहे कि लोगों में यह अफ़वाह फैल गई है कि क़ुरैश के बीच एक जादूगर है, क़ुरैश के बीच एक पुरोहित है, अल्लाह की क़सम हमें तो केवल एक गर्भवती के चिल्लाने की तरह एक चिल्लाहट की प्रतीक्षा है, फिर तो हम अपनी अपनी तलवारों को लेकर खड़े हो जाएंगे और आपस में लड़-कट कर मिट जाएँगे l उत्बह बहुत ग़ुस्से में था उसका रंग बदला बदला था और हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-चुपचाप सम्मान के साथ सुन रहे थे l अब उत्बह ने उनको लालच देना आरंभ किया ताकि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-अपने सन्देश के परचार को छोङकर कर बैठ जाएँ, उसने कहा: हे मनुष्य! यदि तुमने यह जो लेकर आया है इसलिए लाया है कि धनदौलत बटोरे तो हम तुम्हारे लिए इतना धन एकठ्ठा करदेंगे कि क़ुरैश के बीच तुम सबसे अधिक धनी बन जाओगे, और यदि यह सब  कुछ चौधराहट के लिए है तो हम सब अपना अपना झंडा तुम्हारे हाथ में देते हैं और तुम जीवित रहने तक हमारे प्रमुख रहो गे, और यदि तुमको महिलाओं की इच्छा हो और उनकी चाहत तुमको तड़पाती हो तो क़ुरैश  की जिन महिलाओं के बीच चुनवा करना चाहते हो कर लो हम तुम्हारी  दसियों से विवाह करा देंगे, और यदि यह भूतप्रेत के कारण आता है और तुम उनको नहीं भगा पाते हो तो हम तुम्हारे लिए बैद बुला लेंगे और हम अपना धन लुटाकर तुम्हेँ ठीक करेंगे, होसकता है कि उसका साया पड़ गया हो और दवा करना आवश्यक हो l  
उत्बह हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के साथ इसी बेढंगी से बात करता जा रहा था और विभिन्न प्रकार का लालच और लोभ देता जारहा था l   
हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-चुप रहे और शांत बने रहे और उसकी बातों को सुनते रहे l उसके लोभ और फुसलाव की बातें अंतिम को पहुंची:राज्य, धन, महिलाएं और भूतप्रेत को भगाने के बैद और हकीम, उत्बह चुप हुआ और उसका ग़ुस्सा ज़रा थमा, और फिर हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की ओर से उत्तर का इंतज़ार करने लगा l हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने अपनी आंखों को उसकी ओर उठाया और शांतिपूर्ण रूप से कहा: 
अबुल-वलीद! क्या तुमने अपनी बात समाप्त कर ली है?
उत्बह को सच्चे और ईमानदार हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के इस शिष्टाचार और ऊँचे सम्मान पर बिल्कुल आश्चर्य नहीं हुआ l  और संक्षिप्त रूप में उत्तर दिया :जी हाँ l
हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- ने कहा: अब मेरी बात सुनो l
उत्बह ने कहा: ठीक है सुनाइये! तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने यह पढ़कर सुनाया:

: بسم الله الرحمن الرحيم " حم * تَنزِيلٌ مِّنَ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ * كِتَابٌ فُصِّلَتْ آيَاتُهُ قُرْآنًا عَرَبِيًّا لِّقَوْمٍ يَعْلَمُونَ * بَشِيرًا وَنَذِيرًا فَأَعْرَضَ أَكْثَرُهُمْ فَهُمْ لَا يَسْمَعُونَ)

"अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपाशील, अत्यन्त दयावान है l हा मीम l

यह अवतरण है कृपाशील, अत्यन्त दयावान की ओर से l एक किताब, जिसकी आयतें खोल-खोलकर बयान हुई हैं;अरबी क़ुरआन  के रूप में, उन लोगों के लिए जो जानना चाहें l शुभ सूचक एवं शचेतकर्त्ता किन्तु उनमें से अधिकतर कतरा गए तो वे सुनते ही नहीं l(हा मीम lअस सजदा : १/२/३) 

हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-इसी तरह आयतों को पढ़ते गए और उत्बह सुनता रहा, इतने में उत्बह धरती पर बैठ गया, उसका शारीर थरथरा गया, और अपने दोनों हाथों को पीठ के पीछे रखकर उस पर टेका लेकर बैठा रहा, और एक एक आयत को सुनता गया और हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-पढ़ते गए, यहाँ तक कि इस आयत तक पहुँच गए l

" فَإِنْ أَعْرَضُوا فَقُلْ أَنذَرْتُكُمْ صَاعِقَةً مِّثْلَ صَاعِقَةِ  عَادٍ وَثَمُودَ"

"अब यदि वे लोग ध्यान में न लाएं तो कह दीजिए "में तुम्हें उसी तरह के कड़का से डराता हूँ जैसा कड़का "आद" और "समुद" पर हुआ था l" (हा मीम अस-सजदा:१३)

उत्बह ने जब सज़ा की चेतावनी सुनी तो घबरा गया और कूद कर हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के मुंह पर अपने दोनों हाथों को रख दिया और उनकी पढ़ाई को रोकना चाहा, परन्तु वह क़ुरआन की आयतों को पढ़ते गए यहाँतक कि वह उस आयत तक पहुंचे जिसमें सजदा करने के बारे में कहा गया है, तो वह सजदा में गिर गए फिर सजदे से सिर उठाए और उत्बह की ओर देखे, और पूछे: हे अबुल-वलीद क्या तुम ने सुन लिया? उसने हाँ में उत्तर दिया, तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने कहा अब तुम्हारी मरज़ी l
उत्बह उठा और अपने साथियों की ओर चल दिया, वे बेचैनी से
उस की प्रतीक्षा कर रहे थे l जब वह उनके पास पहुंचा तो वे आपस में एक दूसरे से बोलने लगे, अल्लाह की क़सम अबुल-वलीद अब वैसा नहीं है जैसा जाने के समय था l
जब वह उनके साथ बैठा तो सभों ने कहा: क्या हुआ अबुल-वलीद! क्या बात है?
उन्होंने कहा: बात यह है कि मैंने उनसे ऐसा ऐसा शब्द सुना है जो मैंने आज तक पहले कभी नहीं सुना था l अल्लाह की क़सम वे शब्द न  
कविता हैं, न जादू हैं और न ही वे पुरोहितों के शबद हैं l हे क़ुरैश जाति के लोगो! तुम मेरी सलाह ध्यान से सुनो और मेरी बात मानो, इस आदमी को अपनी स्तिथि में मगन रहने दो, अल्लाह की क़सम उसकी बात जो में ने सुनी है भविष्य में उसकी एक बहुत बड़ी ख़बर होगी, और वह बात हो कर रहे गी, हे मेरी जनता! मुहम्मद ने मुझे यह पढ़कर सुनाया:

 

: بسم الله الرحمن الرحيم " حم * تَنزِيلٌ مِّنَ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ *)

 

"अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपाशील, अत्यन्त दयावान है l हा मीम l

यह अवतरण है कृपाशील, अत्यन्त दयावान की ओर से l(हा मीम अस-सजदा:१/२/३)

यहाँतक कि वह इस आयत तक पहुँचा l

 

" فَإِنْ أَعْرَضُوا فَقُلْ أَنذَرْتُكُمْ صَاعِقَةً مِّثْلَ صَاعِقَةِ  عَادٍ وَثَمُودَ"

 

"अब यदि वे लोग ध्यान में न लाएं तो कह दीजिए "में तुम्हें उसी तरह के कड़का से डराता हूँ जैसा कड़का "आद" और "समुद" पर हुआ था l" (हा मीम अस-सजदा:१३)

तो मैंने उसके मुंह को बंद कर दिया, और मैंने उसे रिश्तेदारी की दुहाई दी, और पढ़ना बंद करने की विनती की: आप जानते हैं कि मुहम्मद जब कुछ कहता है तो वह झूठ नहीं कहता है l मुझे डर लगा  कि कहीं अल्लाह की मार तुम पर न उतर जाए l
अबुल-वलीद थोड़ी देर के लिए चुप रहा और गहरे सोंच में डूब गया, जबकि उनकी जनता दुखी नजरों से उसका मुंह ताक रही थी l
उसने कहा:अल्लाह की क़सम उसकी बात में एक मिठास है, और उसकी बात में सुंदरता है l उसका उपर फलदार है और उसकी जड़ें शक्तिशाली से भरपूर हैं, वह सब पर भारी है, उसके ऊपर किसी की नहीं चलेगी l वह तो सबको चूर चूर कर के रख देगा, वह किसी मनुष्य की बात नहीं है l वह किसी मनुष्य की बात नहीं है l
सभा के लोगों ने कहा वह तो कविता है, हे अबुल-वलीद! कविता ही है l तो उसने कहा: अल्लाह की क़सम मुझसे अधिक तो कविता के विषय में कोई ज्ञान नहीं रखता है l  यहाँ के लोगों के बीच तो विभिन्न प्रकार की और भूतप्रेत की कविताओं के बारे में मुझ से अधिक कोई जानकारी नहीं रखता है l
लेकिन अल्लाह की क़सम  वह जो कहते हैं किसी भी कविता की तरह नहीं है!
उत्बह अपनी जनता के साथ हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- के विषय पर देर तक बहस करता रहा l
यह बात ठीक है कि उत्बह ने  इस्लाम धर्म को स्वीकार नहीं किया था, पर इसमें कोई संदेह नहीं है कि उसके हृदय में धर्म के लिए एक स्थान बन गया l

विचार कीजिए कि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-अपने महान शिष्टाचार और उत्बह की बात को ध्यान से सुनने के गुण के द्वारा किस तरह उनको प्रभावित कर लिया था, हालांकि वह कट्टर दुश्मन था l
एक अन्य अवसर पर क़ुरैश  जाति ने एक बैठक की ,और हुसैन-बिन मुनज़िर खुज़ाई को हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- के साथ बातचीत करने और उनके संदेश के अपमान केलिए चुनाव किया, याद रहे कि यह इमरान-बिन हुसैन हज़रत पैगंबर के एक महान साथी के पिता थे l
अबू-इमरान हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- के पास आए  उस समय वह अपने साथियों के साथ बैठे थे, उसने आकर वही दुहराया जो क़ुरैश सदा से ही रटते थे: तुम ने हमारे बीच फुट डाल दिया है, हमको तितरबितर कर दिया है, हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-शांति से सुनते रहे जब तक वह अपनी बात समाप्त कर लिया l
इसके बाद उन्हों ने पूछा: हे अबु-इमरान!: क्या आप ने अपनी बात समाप्त कर ली है? उसने हाँ कहा l
उन्हों ने कहा तो फिर अब ज़रा मेरे प्रश्नों का उत्तर देना l
उसने कहा :ठीक है अब  मैं सुन रहा हूँ, आप कहते जाइए, तो उन्होंने कहा:आज तुम कितने देवता को पूजते हो?
उसने कहा : सात, छह धरती पर के और एक आकाश का l
उन्हों ने पूछा यह बताओ प्यार और डर केलिए किसको पूजते हो?
उसने कहा: आकाश वाले को l
हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- ने नरमी से कहा: यदि तुम इस्लाम धर्म को स्वीकार करते तो मैं तुम्हें दो शब्द सिखा देता जिन से तुम को बहुत लाभ होता l
इतना कहना था कि हुसैन उसी स्थल पर इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लिया l  
फिर उसने कहा: हे अल्लाह के पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- अब मुझे वे दो शब्द सिखा दीजिए जिन के सिखाने का आपने मुझ को वचन दिया है l अल्लाह के पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- ने कहा यह पढ़ो:

"اللهم ألهمني رشدي وأعذني من شر نفسي"

 

(हे अल्लाह! ठीक ठीक सलाह मेरे हृदय में डालिए, और मुझे और मेरे आत्मा के दुष्ट से मुझे बचाइए l)
वाह वाह! कितना सुंदर और ऊँचा बर्ताव है!  
और लोगों के साथ मैलजोल की कितनी अनूठी चरित्र है!
इस प्रकार का इस्लामी रवैया ग़ैर-मुस्लिमों पर कितना अच्छा प्रभाव डालता है! बल्कि ग़ैर-मुसलमानों को इस्लाम के नज़दीक करने में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है l

एक बार एक युवा अध्ययन के लिए जर्मनी की यात्रा पर गया l
और वहाँ एक फ्लैट में रहने लगा l उस फ्लैट के सामने एक जर्मन युवा रहता था l उन दोनों के बीच कोई संबंध नहीं था सिवाय इसके कि वे दोनों  एक दूसरे के पड़ोसी थे l

 एक बार, जर्मन पड़ोसी को अचानक यत्रा करना पड़ा l
समाचारपत्र बाटने वाला प्रत्येक दिन समाचारपत्र उसके दरवाज़े पर छोड़ देता था l
उस युवा ने समाचार पत्रों को इधर-उधर पड़ा देखा, अन्य पड़ोसियों से उसके विषय में पूछा तो पता चला कि वह एक यात्रा पर है, उन्हों ने उन समाचार पत्रों को जमा करके एक सुरक्षित जगह पर रख दिया l
वह प्रत्येक दिन के समाचार पत्र को उठा उठा कर जमा कर रखने लगा l जब वह पड़ोसी दो तिन महीनों के बाद वापस लौट आया  तो उस युवा ने उसे सुरक्षित रूप से वापसी पर पहले बधाई दी, और सारे के सारे समाचार पत्र उसको सोंप दिया l और कहा: मैं ने सोचा कि शायद आप समाचार पत्र की किसी कहानी को लगातार पढ़ते होंगे, या किसी प्रतियोगिता में भाग ले रहे होंगे तो कहीं वह आप से छुट न जाए l
पड़ोसी इस रखरखाव पर आश्चर्य हो गया और कहा:क्या आप
अपनी इस सेवा पर मेरी ओर से कुछ इनाम या कोई मज़दूरी स्वीकार करेंगे?
तो उन्होंने कहा:नहीं l बल्कि यह तो  हमारे धर्म का आदेश है, हमारा धर्म हमें पड़ोसियों के साथ अच्छा बर्ताव सिखाता है l
और आप तो मेरे पड़ोसी हैं  इसलिए आप के साथ अच्छा बर्ताव उचित है l फिर वह व्यक्ति अपने पड़ोसी के साथ अपना अनुग्रह जारी रखा अंत में वह इस्लाम धर्म को अपने गले से लगा लिया l
अल्लाह की क़सम यही जीवन की असली ख़ुशी और मज़ा है, आप सदा यह महसूस करें कि यह आपकी ज़िम्मेदारी है, आप प्रत्येक बात के द्वारा अल्लाह की पूजा करते हैं l
ग़ैर-मुस्लिमों की एक बड़ी संख्या है जो मुसलमानों ही के एक ग्रुप के बुरे बर्ताव के कारण इस्लाम धर्म को स्वीकार करने से झिझक जाते हैं, कर्मचारी हैं तो कठोरता का बर्ताव करते हैं, और कारोबारी हैं तो अपने ग्राहक को धोखा देते हैं l और किसी के पड़ोसी हैं तो अपने पड़ोसीयों को सताते हैं l
तो आइए अब नए रूप से जीवन को आरंभ करते हैं l
प्रकाश:
सबसे अच्छा उपदेशक वे हैं जो अपने शब्दों से पहले अपने कार्यों के द्वारा उपदेश देत हैं l

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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